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सिविल, क्रिमिनल, लिटिगेशन..., देश की अदालतों पर लंबित फाइलों का बोझ कितना है?

जिला अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक अदालतों पर लंबित मामलों का बोझ बढ़ता जा रहा है। आंकड़े क्या कहते हैं, पढ़ें रिपोर्ट।

Supreme Court

सांकेतिक तस्वीर। AI जनरेटेड इमेज। Photo Credit: ChatGPT

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सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों की संख्या इतनी बढ़ गई है कि देश के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने 4 अलग-अलग बेंच बनाने का फैसला किया है। बेंच का काम 800 से ज्यादा सुप्रीम कोर्ट के सबसे पुराने मामलों को सुलझाना होगा। निचली अदालतें हों, हाई कोर्ट हो या देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट, अदालतों पर लंबित मुकदमों का भारी बोझ है, जो न्यायिक व्यवस्था के लिए चुनौती बन गई है। 

CJI सूर्यकांत ने सुप्रीम कोर्ट के सबसे पुराने 800 सिविल और क्रिमिनल मामलों को जल्दी सुनवाई के लिए चार विशेष डिवीजन बेंच बनाई हैं। 13 जुलाई से बेंच के सामने लंबित मामलों की सुनवाई होगी। इस पहल के तहत दो बेंच पुराने सिविल मामलों की सुनवाई करेंगी। दो बेंच, क्रिलिनल मामलों की। 

जस्टिस पीके मिश्रा, जस्टिस एसवीएन भट्टी, जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस उज्ज्वल भुयान बेंच में शमिल हैं। ये चारों बेंच हर हफ्ते मंगलवार, बुधवार और गुरुवार को सिर्फ इन पुराने मामलों पर ही ध्यान देंगी। सोचिए, अगर सुप्रीम कोर्ट को पुराने मामलों को निपटान के लिए यह फैसला करना पड़ा है तो देश की निचली अदालतों की स्थति क्या होगी।
 

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सुप्रीम कोर्ट में कितने केस लंबित हैं?

नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट में कुल 96,045 मामले लंबित हैं। इनमें 74,244 सिविल मामले और 21,801 क्रिमिनल मामले शामिल हैं।  सबसे अच्छी बात यह है कि इनमें से लगभग 40 प्रतिशत मामले एक साल से भी कम पुराने हैं। सिविल मामलों में 36.93% (27,416 मामले) और क्रिमिनल मामलों में 48.01% (10,467 मामले) एक साल से कम पुराने हैं। यानी आधे से ज्यादा क्रिमिनल मामले और एक तिहाई से ज्यादा सिविल मामले नए हैं। 

पिछले महीने क्या हुआ?

पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट में 4,149 नए मामले दाखिल हुए, जिनमें 2,682 सिविल और 1,467 क्रिमिनल मामले थे। वहीं, कोर्ट ने 1,524 मामलों का निपटारा किया। इसमें 965 सिविल और 559 क्रिमिनल मामले शामिल हैं।

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इस साल अब तक का रिकॉर्ड कैसा है?

साल जनवरी 2026 से अब तक कुल 40,766 नए मामले दाखिल हुए हैं। 26,997 सिविल और 13,769 क्रिमिनल केस। कोर्ट ने इनमें से 36,712 मामलों का निपटारा कर दिया है, जो कुल दाखिल मामलों का करीब 90 फीसदी है।

सिविल मामलों में डिस्पोजल रेट 93.86 फीसदी और क्रिमिनल मामलों में 82.6 फीसदी रहा है। जजों की बेंच के हिसाब से स्थिति  3 जजों की बेंच पर सबसे ज्यादा मामले लंबित हैं।  5 जजों की बेंच पर कम और 7 जजों की बेंच पर बहुत कम मामले हैं।  9 जजों या इससे ज्यादा जजों वाली बेंच पर बहुत कम या शून्य लंबित मामले दिख रहे हैं।

हाई कोर्ट का क्या हाल है?

देश के 25 हाई कोर्ट में कुल लंबित मामलों की संख्या 64,55,602 हैं। इनमें सिविल केस 44,97,696 हैं, जबकि क्रिमिनल केस 19,57,906 हैं। चिंता की बात यह है कि इनमें से 74 प्रतिशत यानी करीब 47,90,000 हजार मुकदमे एक साल से ज्यादा पुराने हैं। सिविल मामलों में तो 75 प्रतिशत से ज्यादा केस एक साल पुराने हैं, जबकि क्रिमिनल मामलों में यह आंकड़ा 72 प्रतिशत है। 

  • 10 साल से ज्यादा पुराने केस: 23 प्रतिशत  
  • 5 से 10 साल पुराने: 21 प्रतिशत  
  • 1 साल से कम पुराने केस: सिर्फ 26 प्रतिशत

हाई कोर्ट में बड़ी संख्या में मुकदमे सालों-साल से अदालतों में पड़े हुए हैं। 

पिछले महीने के आंकड़े क्या बता रहे हैं?

पिछले महीने कुल 1 लाख 68 हजार नए मुकदमे दाखिल हुए, जबकि 1 लाख 38 हजार मुकदमों का निपटारा हुआ। नए केस आने की रफ्तार निपटारे से ज्यादा है। 2026 में अब तक 13,39,000 नए केस दर्ज हुए हैं, जबकि 12,47,000 मुकदमों का फैसला हो सका है।

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निचली अदालतों पर बोझ कितना है आंकड़ों से समझिए 

नेशनल ज्यूडीशियल डेटा ग्रिड के आंकड़े बताते हैं कि भारत की निचली अदालतों, हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में लाखों मामले में लंबित हैं, जिनमें लोग इंसाफ का इंतजार कर रहे हैं। 

देश के अदालतों में कुल 4 करोड़ 97 लाख 58 हज़ार 886 मुकदमे लंबित हैं। इनमें से 65.84 फीसदी यानी 3 करोड़ 27 लाख 61 हजार से ज्यादा मुकदमे एक साल से पुराने हैं।

  • सिविल केस: 1,13,26,199
  • क्रिमिनल केस: 3,84,32,687

मुकदमा शुरू होने से पहले के मामले करीब 12 लाख 98 हजार हैं। इनमें से 61.90 फीसदी मामले, एक साल से पुराने हैं। लंबित केसों में 34 फीसदी केस 1 साल से कम पुराने हैं, जिनमें 24 फीसदी सिविल और 76 फीसदी क्रिमिनल मामले हैं। 24 फीसदी केस 1 से 3 साल पुराने हैं, जिनमें 25 फीसदी सिविल और 75 फीसदी क्रिमिनल हैं। 3 से 5 साल पुराने केस कुल का 14 फीसदी हैं, जिनमें 23 प्रतिशत सिविल और 77 फीसदी क्रिमिनल मामले हैं। 5 से 10 साल पुराने केस 17 प्रतिशत हैं, जिनमें 20 फीसदी सिविल और 80 फीसदी क्रिमिनल हैं। सबसे पुराने, यानी 10 साल से ज्यादा पुराने केस कुल का 10 फीसदी हैं, जिनमें सिर्फ 18 फीसदी सिविल और 82 फीसदी क्रिमिनल मामले हैं।


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