नेशनल हाईवे, पुल और फ्लाईओवर को मजबूत और सुरक्षित बनाने के लिए सरकार करोड़ों रुपये खर्च करती है लेकिन निर्माण में गंभीर खामियों के मामले लगातार सामने आते रहे हैं। संसद में पेश आंकड़ों के मुताबिक, 2014 के बाद ऐसे मामलों में ठेकेदारों और उनसे जुड़ी एजेंसियों पर करीब ₹395 करोड़ का जुर्माना लगाया गया। इतना ही नहीं कुछ मामलों में ठेकेदारों को ब्लैकलिस्ट या बैन भी किया गया। इसके अलावा, कई मामलों में इंजीनियरों और जिम्मेदार अधिकारियों पर भी कार्रवाई हुई। ऐसे में सवाल उठता है कि इतनी बड़ी पेनल्टी के बावजूद हाईवे और पुलों के निर्माण की गुणवत्ता में कमी और खामियां क्यों सामने आ रही हैं?
हाल ही में आया लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे का मामले से भी यही सवाल उठता है। करीब 4,200 करोड़ की लागत से बने 63 किलोमीटर लंबे इस एक्सप्रेसवे का उद्घाटन 13 जुलाई 2026 को हुआ था लेकिन उद्घाटन के कुछ ही दिनों के अंदर ही उन्नाव के पास इसका करीब 300 मीटर का हिस्सा धंस गया। कई अन्य जगहों पर भी बड़े-बड़े गड्ढे हो गए। सड़क बनाने वाली कंपनी पीएनसी इंफ्राटेक लिमिटेड को नॉन-परफॉर्मर बताते हुए इसके खिलाफ कार्रवाई की भी की गई है। इसके पहले 2024 में भी मध्य प्रदेश के छतरपुर में भी इसी कंपनी का नाम एनएचएआई (NHAI) के अधिकारियों को रिश्वत देने के मामले में सामने आया था।
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395 करोड़ का जुर्माना फिर भी बेअसर
सरकार ने संसद में जो आंकड़े पेश किए हैं उसके मुताबिक, साल 2014 से अब तक सड़क धंसने, बड़ी खराबी या गंभीर नुकसान के अलग-अलग राज्यों से 55 मामले सामने आए हैं, जिनके लिए कॉन्ट्रैक्टरों और जिम्मेदार इंजीनियरों पर कुल 394.83 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया गया। इसमें सबसे बड़ी पेनल्टी अकेले तेलंगाना में लगी, केवल 1 प्रोजेक्ट पर 134.78 करोड़ रुपये की जुर्माना लगाया गया। यह मामला 2022 में सामने आया था। इसके बाद मध्य प्रदेश में 2025 में महज दो प्रोजेक्ट पर ही 119 करोड़ को जुर्माना लगा। यानी अकेले इन दो राज्यों से ही देशभर के कुल जुर्माने का करीब 64 फीसदी हिस्सा आया
इसके बाद महाराष्ट्र में 46.34 करोड़ रुपये 8 प्रोजेक्ट पर, केरल में 32.495 करोड़ रुपये 9 प्रोजेक्ट पर और बिहार में 25 करोड़ रुपये 6 प्रोजेक्ट पर लगा। इसके अलावा, आंध्र प्रदेश, हरियाणा, गुजरात, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और मेघालय में जुर्माना 10 करोड़ से कम था। हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, उत्तराखंड और दिल्ली में कोई जुर्माना दर्ज नहीं है। इन राज्यों में खराबी को ठेकेदार के अपने खर्च पर ठीक कराने की बात कही गई है। इसके अलावा अरुणाचल प्रदेश में कॉन्ट्रैक्टर पर कॉन्ट्रैक्ट की कुल रकम का 5% और जम्मू-कश्मीर में 1% जुर्माना लगाया गया है।
ब्लैकलिस्ट और सस्पेंशन भी हुए
हाईवे और पुलों में गंभीर खामियां मिलने पर सिर्फ जुर्माना ही नहीं लगाया गया, बल्कि कई मामलों में कॉन्ट्रैक्टरों को ब्लैकलिस्ट और बैन भी किया गया। इसके अलावा कुछ मामलों में कॉन्ट्रैक्टर के प्रमुख कर्मचारियों, इंजीनियरों और अन्य जिम्मेदार अधिकारियों को सस्पेंड किया गया। कई प्रोजेक्ट में जिम्मेदार अधिकारियों को पद से हटाने और कुछ मामलों में ठेकेदार के अपने खर्च पर सड़क या निर्माण की मरम्मत कराने के निर्देश भी दिए गए।
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कम नहीं हुईं हाईवे-पुल निर्माण में खामियां
आंकड़े भले ही बड़े जुर्माने की बात करते हों लेकिन आखिर में यही सवाल फिर उठता है कि क्या सिर्फ जुर्माना लगा देने से हाईवे और पुलों की क्वालिटी सुधर जाएगी? पीएनसी इंफ्राटेक का मामला भी यही दिखाता है कि जिस कंपनी पर पहले ही कार्रवाई हुई है वह फिर से गलती करती पाई गई। इसके अलावा, डेटा यह भी बताता है कि कई मामलों में सिर्फ इतना किया गया कि कॉन्ट्रैक्टर ने अपने ही खर्च पर सुधार कर दिया, उनपर न तो कोई जुर्माना लगाया गया, न ही कोई और सजा हई।
दूसरी तरफ कई मामलों में कॉन्ट्रैक्टर पर लगाया गया प्रतिबंध (डिबारमेंट) बहुत कम समय के लिए रहा। कहीं सिर्फ 1 महीना, कहीं 3 महीने, कहीं 2 साल। ऐसे में सवाल यह भी है कि जो ठेकेदार बार-बार लापरवाही करते हैं, क्या उन पर लंबे समय के लिए या हमेशा के लिए बैन लगना चाहिए, ताकि वे दोबारा सरकारी ठेका न ले सकें?