सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि गाली-गलौज या अभद्र भाषा का इस्तेमाल करना हमेशा अश्लीलता के दायरे में नहीं आता। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच ने कहा कि कोई शब्द तभी अश्लील माना जाएगा, जब वह कामुकता को बढ़ावा देने वाला हो या लोगों को भ्रष्ट करने की प्रवृत्ति रखता हो।
कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि क्रिमिनल लॉ के तहत अश्लीलता के लिए गुस्से में की गई गाली-गलौज से कहीं ज्यादा सजा की जरूरत होती है। कोर्ट ने यह टिप्पणी तमिलनाडु के एक मामले में सुनवाई के दौरान की। आरोपी मणि को जमीन विवाद के दौरान मां की गाली देने के लिए अश्लीलता के आरोप में दोषी ठहराया गया था।
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क्रिमिनल जिम्मेदारी बनती है
बेंच ने कहा कि कानून में असभ्यता और अश्लीलता अलग-अलग अवधारणाएं हैं, क्योंकि उसने यह जांच की कि क्या दो लोगों के बीच तीखी बहस के दौरान इसके इस्तेमाल पर इंडियन पीनल कोड (IPC) के सेक्शन 294(b) के तहत क्रिमिनल जिम्मेदारी बनती है।
जरूरी नहीं कि भाषा क्रिमिनल हो
कोर्ट ने इस मामले का इस्तेमाल अश्लील भाषा, जो सजा के लायक है और अश्लील या गाली-गलौज वाली भाषा, जो आपत्तिजनक हो सकती है लेकिन जरूरी नहीं कि क्रिमिनल हो, के बीच साफ कानूनी फर्क बताने के लिए किया।
मामला क्या है?
अगस्त 2017 में जमीन विवाद को लेकर आरोपी ने शिकायतकर्ता के साथ गाली-गलौज की थी। पीड़ित का आरोप था कि आरोपी ने जातिसूचक शब्दों भी कहे। बाद में घर से हथियार लाकर हमला कर दिया, जिससे उसकी नाक की हड्डी टूट गई थी। लोअर कोर्ट ने उसे अश्लीलता, गंभीर चोट और धमकी के लिए दोषी माना था।
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कोर्ट ने सजा बरकरार रखी
मगर, सुप्रीम कोर्ट ने अश्लीलता और आपराधिक धमकी के आरोपों से आरोपी को बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि गाली देने से किसी को परेशानी हुई, यह साबित नहीं हुआ। हालांकि, शिकायतकर्ता को गंभीर चोट पहुंचाने (IPC की धारा 326) के मामले में उसकी सजा बरकरार रखी गई है।
आरोपी की उम्र करीब 70 साल होने और स्वास्थ्य स्थितियों को देखते हुए कोर्ट ने उसकी सजा को घटाकर कोर्ट उठने तक की कैद कर दिया है। साथ ही, उसे 2 महीने के भीतर 50,000 रुपए का जुर्माना भरने का निर्देश दिया गया है।