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आबादी में नंबर 1 फिर भी जनसंख्या को लेकर किस डर में है सुप्रीम कोर्ट?

भारत की जनसंख्या 1.40 अरब है। इतनी विशाल आबादी वाले देश में प्रजनन दर 1.9 प्रतिशत पर आ गई है। सुप्रीम कोर्ट ने दो बच्चों की कानूनी शर्तों पर अब सवाल उठाया है।

भारत में जनसंख्या नियंत्रण को लेकर नागरिक स्तर पर प्रदर्शन होते रहे हैं। Photo Credit: PTI

भारत में जनसंख्या नियंत्रण को लेकर नागरिक स्तर पर प्रदर्शन होते रहे हैं। Photo Credit: PTI

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सुप्रीम कोर्ट ने मंगला भीमराव इंगल प्रतीक बनाम एडिशनल कमिश्नर, अमरावती और अन्य केस में मंगलवार को कहा कि दो से ज्यादा बच्चे होने पर स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने से रोकने वाले कानून अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक आराधे की बेंच ने 2003 के जावेद बनाम हरियाणा सरकार फैसले पर दोबारा विचार के लिए मामला बड़ी बेंच को भेज दिया। उस फैसले में तीन जजों की बेंच ने हरियाणा पंचायती राज अधिनियम 1994 की दो बच्चों की शर्त को सही ठहराया था।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने नए फैसले की वजह देश की घटती प्रजनन दर को बताया है। सुप्रीम कोर्ट की चिंता है कि कुल प्रजनन दर 2003 में 3 थी और अब 1.9 है। यह 2.1 के रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे है। रिप्लेसमेंट लेवल वह दर है, जिस पर एक पीढ़ी अपनी जगह पूरी तरह दूसरी पीढ़ी को दे पाती है। 

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने यह फैसला महाराष्ट्र के काकोडा ग्राम पंचायत की पूर्व सरपंच मंगला भीमराव के मामले में सुनाया। तीसरे बच्चे के जन्म पर महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम 1959 की धारा 14(1)(j-1) के तहत उन्हें अयोग्य ठहराया गया था। कोर्ट ने यह अयोग्यता रद्द कर दी।

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कोर्ट को किस बात की चिंता है?

जस्टिस नरसिम्हा ने कहा कि ऐसे कानूनों का आधार, सिर्फ आबादी बढ़ने का डर था। पिछले कुछ दशकों के जनसांख्यिकीय बदलावों से आबादी ठहरी है। कोर्ट ने साफ किया कि देश की आबादी अभी घट नहीं रही है। प्रजनन दर, रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे रहने पर आगे चलकर बुजुर्गों की आबादी बढ़ेगी और काम करने वाली उम्र के लोगों का हिस्सा घटेगा। कोर्ट के मुताबिक इन बदलावों को नजरअंदाज करने पर देश को गंभीर नतीजे भुगतने पड़ सकते हैं।

बेंच ने जावेद बनाम हरियाणा सरकार में दिए गए तर्कों पर भी चिंता जताई है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे कानून नागरिकों के एक पूरे वर्ग को राजनीतिक प्रतिनिधित्व से बाहर कर देते हैं, जबकि इसका उनके पद संभालने की क्षमता से कोई खास संबंध नहीं है। कोर्ट का कहना है कि यह लोगों को बच्चे पैदा करने और लोकतांत्रिक भागीदारी में से एक को चुनने के लिए मजबूर करता है। यह अनुच्छेद 21 के तहत प्रजनन संबंधी स्वायत्तता के अधिकार का उल्लंघन है।

क्यों सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाने में समय लिया?

सुप्रीम कोर्ट ने 4 अगस्त को फैसला सुरक्षित रखा था। तब कोर्ट ने एमिकस क्यूरी रुक्मिणी बोबडे और याचिकाकर्ता के वकील प्रतीक बोम्बर्डे से दो से ज्यादा बच्चों पर रोक वाले राज्यों के कानूनों की सूची मांगी थी। रुक्मिणी बोबडे की ओर से सौंपी गई लिस्ट में यह कहा गया था कि7 राज्यों ने यह शर्त हटा दी है और 15 राज्यों में ऐसी कोई नीति नहीं है। 

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किन राज्यों में ऐसी शर्तें लागू हैं?

बढ़ती जनसंख्या पर लगाम लगाने के लिए असम, गोवा, गुजरात, महाराष्ट्र, ओडिशा और उत्तराखंड में यह शर्त अब भी लागू है। सभी राज्यों में एक जैसा तरीका नहीं है। कोर्ट ने द इकोनॉमिस्ट के भारत की घटती प्रजनन दर पर छपे लेख का भी जिक्र किया। मामले की शुरुआत मंगला के खिलाफ अतिरिक्त कलेक्टर के पास हुई शिकायत से हुई थी। इसके बाद उन्हें अयोग्य ठहराया गया। 

अपर आयुक्त ने उनकी अपील खारिज कर दी, तो वह बॉम्बे हाईकोर्ट पहुंचीं। हाईकोर्ट ने 5 अगस्त 2025 के आदेश में अयोग्यता बरकरार रखी। कोर्ट ने कहा कि मंगला ने तीसरे बच्चे के जन्म प्रमाणपत्र से खुद को अलग करने की कोशिश की, लेकिन उसमें दोनों माता-पिता के नाम हैं। इसके खिलाफ वह सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं। सुप्रीम कोर्ट ने ने 4 नवंबर 2025 को हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी थी।

भारत में आबादी को लेकर चिंता क्या है?

भारत 2023 में चीन को पीछे छोड़कर दुनिया का सबसे ज्यादा आबादी वाला देश बना। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्व (NFHS-6) में देश की कुल प्रजनन दर 2.0 दर्ज हुई है। साल 2019 से 2021 के बीच में NFHS-5 में यह दर 2.0 थी। सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम की 2024 की रिपोर्ट में यह दर 1.9 आंकी गई थी।

NFHS-6 के मुताबिक 28 राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों में प्रजनन दर, रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे है। बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान, मेघालय, उत्तर प्रदेश और लक्षद्वीप में यह 2.1 या उससे ज्यादा है। शहरी इलाकों में दर 1.6 और ग्रामीण इलाकों में 2.1 है।

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क्या सच में घट गई है?

प्रजनन दर घटने के बावजूद आबादी तुरंत कम नहीं होगी। प्रजनन की उम्र वाली महिलाओं की संख्या अभी काफी है, जिसे जनसांख्यिकीय गति कहा जाता है। इसे डेमोग्राफिक मोमेंटम या जनसंख्या संवेग भी कहते हैं। यह आबादी में होने वाले इजाफे में करीब 70 प्रतिशत का योगदान देती है। यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इन्फॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन (UDISE+) में भी इसका असर दिखने लगा है। कक्षा 1 से 12 तक का नामांकन 2023-24 के 23.497 करोड़ से घटकर 2024-25 में 23.289 करोड़ रह गया है।

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