पश्चिम बंगाल में 'रेड पॉलिटिक्स' को कैसे भुनाती हैं ममता बनर्जी?
ममता बनर्जी, साल 2011 से पश्चिम बंगाल की सियासत में टिकी हुईं हैं। जब केंद्र में मनमोहन सिंह की सरकार थी, तब भी वह CM थीं, 3 बार से नरेंद्र मोदी सरकार के साथ भी उनका टकराव जारी है।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी। Photo Credit: PTI
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) और केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ ईडी की छापेमारी को लेकर मोर्चा खोला है। ED के अधिकारियों ने राजनीतिक रणनीति तैयार करने वाली कंपनी I-PAC के चीफ प्रतीक जैन के घर और दफ्तर पर छापेमारी की तो मुख्यमंत्री ममता बनर्जी नाराज हो गईं। ममता बनर्जी, अधिकारियों को रोकने वहीं पहुंच गईं, उन्होंने अधिकारियों से दस्तावेज वापस ले लिया।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर मनमाने ढंग से जांच एजेंसियों के दुरुपयोग का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा है कि केंद्र सरकार ममता बनर्जी की चुनावी रणनीति चुरानी चाहती है, दस्तावेजों को रखना चाहती है, क्योंकि पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। ममता बनर्जी और केंद्रीय शक्तियों का जब-जब टकराव हुआ है, तृणमूल कांग्रेस को सियासी तौर पर फायदा पहुंचा है।
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आखिर ऐसा क्यों है, आइए समझते हैं-
रेड पॉलिटिक्स को कैसे भुनाती हैं ममता बनर्जी?
विधानसभा चुनाव 2021: केंद्र में नरेंद्र मोदी की दूसरी बार सरकार बनी थी। केंद्र और पश्चिम बंगाल सरकार के बीच केंद्रीय एजेंसियों की बढ़ती दखल को लेकर सियासी रार मची थी। ममता बनर्जी, CBI और ईडी की दखल को केंद्र के बदले की कार्रवाई बताती रहीं। साल 2021 में पश्चिम बंगाल में ED और CBI ने कोयला तस्करी घोटा, चिटफंड और नारदा स्टिंग ऑपरेशन को लेकर छापेमारी की थी। कोयला तस्करी स्कैम में अभिषेक बनर्जी और उनकी पत्नी तक का नाम सामने आया था।
ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड के खदानों से अवैध कोयला चोरी और तस्करी के आरोप में आसनसोल, कोलकाता सहित कई जगहों पर छापेमारी की गई। साल 2014 में नारदा स्टिंग ऑपरेशन घोटाले के स्टिंग में TMC नेताओं को रिश्वत लेते दिखाया गया था। मई 2021 में CBI ने मंत्रियों फिरहाद हकीम, सुब्रत मुखर्जी, विधायक मदन मित्र और सोवन चटर्जी को गिरफ्तार किया। छापेमारियों को ममता बनर्जी भुनाने में सफल रहीं। सहानुभूति की इस राजनीति में उनका चोटिल होना भी कारगर साबित हुआ।
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वह नंदीग्राम दौरे पर थीं। आरोप लगा कि कार के पास खड़ी थीं तभी कुछ लोगों ने उन्हें धक्का मार दिया। ममता बनर्जी गिर पड़ीं। हर चुनावी कैंपेन में वह व्हील चेयर लेकर पहुंचीं। हर जगह बंधे हुए प्लास्टर के साथ वह चुनाव प्रचार के लिए पहुंची। पीएम मोदी से ज्यादा आक्रामक शैली में चुनावी जनसभाओं में हिस्सा लिया।
ममता बनर्जी की 'मां, माटी और मानुष' की राजनीति काम आई। सहानुभूति वोट भी मिले। प्रचंड मोदी लहर के बाद भी ममता बनर्जी ने राज्य में प्रंचड बहुमत हासिल किया। टीएमसी को अपने दम पर स्पष्ट बहुमत मिला, 213 सीटें हासिल हुईं, बीजेपी सिर्फ 77 सीट पर सिमट गई। राज्य में सत्ता विरोधी लहर भी काम नहीं आई। ममता बनर्जी ने खुद को 'बंगाल की अस्मिता की रक्षक' के तौर पर पेश किया। क्षेत्रीय समीकरण हावी हुए, बीजेपी 80 सीटें भी हासिल नहीं कर पाई।
इससे पहले के विधानसभा चुनावों में टीएमसी सबसे मजबूत स्थिति में रही। 2011 में टीएमसी को 184 सीटें मिलीं, लेफ्ट 62 पर सिमटा। 2016 में टीएमसी ने 211 सीटें जीतीं, बीजेपी के खाते में 3 सीटें आईं। लेफ्ट को 32 सीटें मिलीं। 2021 में टीएमसी को 213 सीटें मिलीं, बीजेपी ने 70 से ज्यादा सीटें जीतीं। बीजेपी 2 साल बाद हुए लोकसभा चुनाव में अपनी बढ़त बरकरार नहीं रख पाई। |
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2019 से 2024 तक, कैसे कामयाब होती रहीं ममता?
केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने 11 दिसंबर, 2019 नागरिकता संशोधन अधिनियम पेश किया था। ममता बनर्जी ने इसे अल्पसंख्यकों के खिलाफ बता दिया। केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार थी, कार्रवाई हुई, जांच हुई तो ममता बनर्जी ने इसे साल 2019 में अपने पक्ष में भुना लिया। आरोप लगाया कि MGNREGA, PMAY जैसे योजनाओं के फंड सरकार रोक रही है। 2019 लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल की 42 सीटों पर तृणमूल कांग्रेस को 22 सीटें, बीजेपी को 18 सीटें, कांग्रेस को 2 सीटें मिलीं। टीएमसी ने अपनी मजबूत स्थिति बनाए रखी, लेकिन बीजेपी ने 2014 की 2 सीटों से उछाल मारकर 18 सीटें जीतीं, मोदी लहर का फायदा मिला। दिलचस्प बात यह रही कि इस चुनाव में बीजेपी को त्वरित फायदा दिखा लेकिन विधानसभा चुनावों में ऐसा धमाल नहीं मचा। लोकसभा चुनाव में बड़ी हार की भूमिका भी तैयार हो गई।
2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को झटका
साल 2024 के लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल की 42 सीटों पर तृणमूल कांग्रेस को 29 सीटें मिलीं। भारतीय जनता पार्टी 12 सीटों पर सिमट गई। कांग्रेस को 1 सीट हासिल हुई। टीएमसी 2019 में सिर्फ 22 सीटों पर थी, 2024 में 29 सीटों पर पहुंच गई। भारतीय जनता पार्टी 2019 में 18 सीटों पर थी, 2024 में 12 सीटों पर आ गई। पश्चिम बंगाल में TMC ने अपनी स्थिति मजबूत की, जबकि BJP को नुकसान हुआ। यहां भी ममता बनर्जी 'मां, माटी और मानुष की राजनीति में सफल हुईं थीं।
ममता बनर्जी की पुरानी रणनीति है
ममता बनर्जी की यह पुरानी रणनीति रही है। साल 2006 और 2007 के बीच पश्चिम बंगाल में दो बड़े राजनीतिक आंदोलन हुए। सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलन। दोनों आंदोलनों के दमन में लेफ्ट सरकार ने अहम भूमिका निभाई थी। नंदीग्राम में पुलिस फायरिंग में 14 किसानों की मौत हुई थी। जनता में आक्रोश हुआ था। ममता बनर्जी ने अपने राजनीतिक यात्राओं में कई हमलों का सामना किया। पुलिस और CPI (M) कैडरों से उत्पीड़त होने के उन्होंने आरोप लगाए। उन्होंने 'मां, माटी और मानुष' का नारा देकर लेफ्ट सरकार को उखाड़ फेंका था। ममता बनर्जी के कथित किसान समर्थक रुख ने 2011 के विधानसभा चुनाव में प्रचंड जीत दिलाई।
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क्यों सियासी फायदा होता है?
ममता बनर्जी, पश्चिम बंगाल में 'मां, माटी, मानुष' का नारा देती हैं। ममता बनर्जी की सियासी पिच पर यह नारा फिट बैठता है। सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलनों में उभरकर लेफ्ट को पश्चिम बंगाल से विदा करने वाली ममता बनर्जी, का यह चुनावी नारा साल 2009 और 2011 के चुनावों में सफल रहा है। ममता बनर्जी, अपने ऊपर हुए हर सियासी नारे को इसी अंदाज में पेश करती हैं, जैसे यह नारा, हमला, मां-माटी और मानुष पर हुआ हो। उनका नारा, बंगाल की संस्कृति, लोगों और जमीन के प्रति उनके लगाव को दर्शाता है।
जनता में ममता बनर्जी यह समझाने में सफल हो जाती हैं कि भारतीय जनता पार्टी, बंगाल की संस्कृति पर हमला कर रही है। बीजेपी को वह बाहरी पार्टी भी बता देती हैं। साल 2014 से केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार है। वह पश्चिम बंगाल में केंद्रीय एजेंसियों की हर जांच को राजनीतिक बदले की कार्रवाई बताती हैं। वह आरोप लगाती हैं कि ईडी और CBI पश्चिम बंगाल में बदले की भावना से काम करती है। ममता बनर्जी आरोप लगाती हैं कि बीजेपी सरकार फंड रोकती है, नागरिकता संशोधन अधियिनम जैसे अधिनियम केवल अल्पसंख्यक उत्पीड़न के लिए लाती है। ममता बनर्जी, इन्हें चुनावी मुद्दा बनाती हैं और जनता तक इन मु्द्दों को लेकर जाती हैं।
अब आगे क्या?
पश्चिम बंगाल में एक बार फिर ईडी की रेड हुई है। ममता बनर्जी इसे पश्चिम बंगाल सरकार के खिलाफ बदले की कार्रवाई बता रही है, राजनीतिक प्रतिशोध का मुद्दा बना रही हैं। वह एक बार फिर से बाहरी बनाम बंगाली की राजनीति शुरू हो गई है।
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