अलग गोरखालैंड, दशकों पुरानी मांग, कैसे TMC के गले की फांस बन गई है?
पश्चिम बंगाल में अलग गोरखालैंड की मांग 100 साल से ज्यादा वक्त से हो रही है। यह, वही मुद्दा है, जहां ममता बनर्जी, हर बार घिर जाती हैं। पढ़ें रिपोर्ट।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी। Photo Credit: PTI
पश्चिम बंगाल में अप्रैल-मई में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। चुनावों से पहले, एक दशकों पुराने मुद्दे को लेकर फिर से सियासत शुरू हो गई है। यह मुद्दा, अलग गोरखालैंड का है। भारतीय जनता पार्टी, गोरखा राजनीतिक दलों के नेताओं से मिलने की कवायद शुरू कर रही है। तृणमूल कांग्रेस, गोरखा नेताओं से मिले, उससे पहले ही भारतीय जनता पार्टी ने रिटार्यड IPS अधिकारी पंकज कुमार सिंह से मुलाकात की है। पंकज कुमार सिंह को केंद्र सरकार ने दार्जिलिंग पहाड़ियों, डुआर्स और तराई के मुद्दों को सुलझाने के लिए वार्ताकार नियुक्त किया है। गोरखा समुदाय का झुकाव, बीजेपी की तरफ हो रहा है।
गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के बिमल गुरुंग और रोशन गिरि, बीजेपी के सांसद राजू बिस्टा और विधायक नीरज जिम्बा ने दार्जिलिंग में पंकज कुमार सिंह से मुलाकात की है। नीरज जिम्बा, भारतीय जनता पार्टी के नेता हैं लेकिन वह गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट के प्रतिनिधि चेहरे हैं। गोरखा नेताओं ने पंकज कुमार सिंह को ज्ञापन सौंपा है।
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रोशन गिरि, महासचिव, गोरखा जनमुक्ति मोर्चा:
हम अलग गोरखालैंड राज्य चाहते हैं। 11 गोरखा समुदायों के लिए अनुसूचित जनजाति का दर्जा चाहते हैं। यह मांग, दशकों पुरानी है, हम इसी पर जोर दे रहे हैं।
कहां-कहां हैं गोरखा?
पश्चिम बंगाल में गोरखा समुदाय तीन हिस्सों में बंटा है। एक हिस्सा हिमालय की पहाड़ियों पर रहता है, एक हिस्सा, हिमालय की तलहटी में और तीसरा हिस्सा डुआर्स है। गोरखा बाहुल 2 जिले हैं। दार्जिलिंग और कालिम्पोंग। पहले यह इलाका भी दार्जिलिंग का हिस्सा था। हिमालय के पास तराई और डुआर्स इलाके में गोरखा, निर्णायक स्थिति में हैं। सिलीगुड़ी सब-डिवीजन के ग्रामीण और शहरी क्षेत्र भी गोरखा बाहुल हैं।
क्या मांग रहे हैं गोरखा?
गोरखा, पहाड़ी, तराई और डुआर्स की भौगोलिक स्थिति और राष्ट्रीय सुरक्षा के मद्देनजर, पुडुचेरी की तरह विधानसभा वाला केंद्र शासित प्रदेश चाहते हैं। उन्हें केंद्र सरकार से उम्मीद है कि यह मांग पूरी जाएगी। गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के महासचिव, रोशन गिरि यही मांग दोहरा रहे हैं। उनका कहना है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 3 के माध्यम से एक अंतिम संवैधानिक समाधान होना चाहिए। एक अलग राज्य या पहाड़ियों के लिए छठी अनुसूची का दर्जा की भी मांग भी पश्चिम बंगाल में जोर पकड़ रही है।
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अनुच्छेद 3 का जिक्र क्यों?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 3 संसद को भारत के भीतर नए राज्यों के निर्माण, मौजूदा राज्यों के क्षेत्र, सीमाओं या नामों में बदलाव करने ताकत देता है। यह संसद को बिना राज्यों की सहमति के, केवल सलाह के आधार पर, राज्य पुनर्गठन का अधिकार देता है।
TMC क्या कर रही है?
भारतीय गोरखा प्रजातांत्रिक मोर्चा (BGPM), पश्चिम बंगाल में टीएमसी की सहयोगी है। इस पार्टी का नेतृत्व अनित थापा करते हैं। दार्जिलिंग में वार्ताकार की यात्रा को बीजेपी के लिए वोट पक्का करने की कोशिश बताई है। अनित थापा, गोरखा लैंड टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन (GTA) के चीफ एग्जीक्यूटिव भी हैं।
अनित थापा, अध्यक्ष, BGPM:-
अब पहाड़ियों में शांति है। इंटरलोक्यूटर को भेजकर माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है। हमें बेवकूफ बनाने की कोशिश की जा रही है, और मैं उनसे मिलकर बेवकूफ नहीं बनना चाहता।
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ममता बनर्जी के लिए गोरखालैंड, गले की फांस क्यों?
22 फरवरी 2023। पश्चिम बंगाल में गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (JGM) और हमरो पार्टी ने बंद बुलाया था। ममता बनर्जी ने साफ कह दिया कि किसी भी हाल में पश्चिम बंगाल का विभाजन नहीं होगा। किसी भी तरह का अलगाव, राज्य सरकार बर्दाश्त नहीं करेगी। ममता बनर्जी ने हमेशा 'अखंड पश्चिम बंगाल' की कवायद की है। वह मां, माटी और मानुष की राजनीति करती हैं। उनकी छवि साफ है कि वह बंगाली अस्मिता के लिए केंद्र सरकारों से टकराती हैं।
अलग गोरखालैंड की मांग का समर्थन करना उनके लिए पश्चिम बंगाल के दूसरे हिस्सों में, राजनीतिक खुदकुशी के तौर पर देखी जाएगी। पश्चिम बंगाल के किसी भी मुख्यमंत्री ने राज्य के बंटवारे का समर्थन नहीं किया है। साल 2017 में पहाड़ियों में हुए 104 दिनों के बंद और हिंसा ने ममता सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी थीं। गोरखा नेताओं के साथ वह वार्ता तो करती हैं लेकिन इस पर बहुत मुखर होकर कुछ नहीं करते हैं।
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केंद्र सरकार, गोरखा मुद्दों को सुलझाने के लिए वार्ताकार नियुक्त करती है। ममता बनर्जी, इस नियुक्ति से हमेशा असहज रहीं हैं। उन्हें लगता है कि यह केंद्र का सीधा हस्तक्षेप है, राज्य को दरकिनार कर, राज्य विरोधी भावना बढ़ाई जा रही है। अ्टूबर से नवंबर 2025 के बीच उन्होंने केंद्र सरकार को वार्ताकार से जुड़े एक मसले पर चिट्ठी भी लिखी थी।
ममता कैसे सुलझाती हैं गोरखा विवाद?
ममता बनर्जी, पहाड़ी इलाकों में अपना आधार बनाने के लिए गोरखा जनजाति मुक्ति मोर्चा और हमरो पार्टी के साथ गठबंधन धर्म निभाती हैं। ये पार्टियां, अलग राज्य की मां पर अड़ी रहती हैं, जिसकी वजह से ममता की परेशानियां कम नहीं होती हैं।
गोरखा समुदाय का सियासी असर किन सीटों पर है?
गोरखा समुदाय का प्रभाव मुख्य रूप से उत्तरी बंगाल के पहाड़ी और तराई इलाकों में हैं। दार्जिलिंग में गोरखा, जीत हार तय करने की स्थिति में हैं। अलीपुरद्वार और जलपाईगुड़ी में भी गोरखा वोटर मजबूत स्थिति में हैं। 12 से 15 विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जहां गोरखा ही तय करते हैं कि कौन विधायक होगा। दार्जिलिंग, कलिम्पोंग और कर्सियांग गोरखा की कोर सीटें कही जाती हैं। माटीगाड़ा-नक्सलबाड़ी, सिलीगुड़ी, फांसिदेवा, नागराकाटा और मदारीहाट जैसी सीटों पर गोरखा मतदाता अहम भूमिका निभाते हैं।
गोरखा समुदाय की मुख्य मांगें क्या हैं?
कोलकाता हाई कोर्ट के एडवोकेट और इतिहास के शोधार्थी अंजन दत्ता ने खबरगांव के साथ बातचीत में कहा, 'गोरखा आंदोलन, पश्चिम बंगाल में पहचान से जुड़ी लड़ाई है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत, गोरखा, अपने लिए एक अलग राज्य चाहते हैं। देश के कई हिस्से ऐसे हैं, जहां गोरखाओं को नेपाली समझा जाता है, अलग राज्य के जरिए, वे अपनी गोरखा पहचान को मजबूत करना चाहते हैं। गोरखा समुदाय में कुल 11 उपजातियां हैं। भुजेल, गुरुंग, मंगर, नेवार और राय जैसे समुदाय प्रभावी हैं। वे अपने लिए अनुसूचित जनजाति का दर्जा चाहती हैं।'
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अंजन दत्ता ने कहा, 'कुछ राजनीतिक दलों का कहना है कि अगर नया राज्य नहीं तो गोरखालैंड टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन (GTA) को और अधिक वित्तीय और प्रशासनिक स्वायत्ता की भी मांग कुछ राजनीतिक दल करते हैं, जिससे उनकी निर्भरता, राज्य सरकार पर कम से कम हो सके। वे अपनी भाषाई सुरक्षा को लेकर भी मुखर हैं, परंपराओं का संरक्षण चाहते हैं।'
गोरखालैंड की मांग कैसे अस्तित्व में आई?
कोलकाता हाई कोर्ट के अधिवक्ता और इतिहास के स्कॉलर, अंजन दत्ता बताते हैं कि दार्जिलिंग जिले का गठन 1866 में हुआ था। भूटान युद्ध के बाद कलिम्पोंग को इसमें शामिल किया गया था। सिक्किम और भूटान के नियंत्रण से यह हिस्सा बाहर गया तो दार्जिलिंग अस्तित्व में आया। पहले यह अनियंत्रित इलाकों में आता था। जब ब्रिटिश काल में चाय बागानों और कृषि विकास के लिए नेपाली प्रवास को प्रोत्साहन दिया गया, तब, लेपचा, भूटिया और दूसरे मूल निवासियों के मुकाबले नेपाली गोरखा बहुसंख्यक बन गए। साल 1901 की जनगणना में नेपाली 61 फीसदी थे। अलग-अलग बोलियों के मिश्रण से खसकुरा, गोरखाली भाषा बनी, जिसने गोरखा पहचान को मजबूत किया।
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कई दशकों से चल रहा आंदोलन, नतीजे क्या रहे?
एडवोकेट अंजन दत्ता बताते हैं कि 1930 के दशक में गोरखा मध्यम वर्ग उभरना शुरू हुआ। सांस्कृतिक नव जागरण हुआ। 1907 में हिलमेन्स एसोसिएशन, 1943 तक ऑल इंडिया गोरखा लीग (AIGL) बनी, जो बंगाल से अलग प्रशासन की मांग करती रही। 1980 के दशक में सुभाष घिसिंग के नेतृत्व में गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट ने हिंसक आंदोलन चलाया, जिसमें 1986-88 में सैकड़ों मौतें हुईं।
साल 1988 में दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल (DGHC) बना, लेकिन असफल रहा। साल 2007 में बिमल गुरुंग ने गोरखा जन मोर्चा (GJM) बनाई, जिसने 2008-2011 में बड़े आंदोलन किए। गोरखा, तराई-डुआर्स को भी शामिल करने की मांग करते हैं। मैदानी इलाकों में असली तनाव की भी यह वजह बना। साल 2011 में त्रिपक्षीय समझौते से गोरखालैंड टैरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन (GTA) बनी, जो अर्ध स्वायत्त परिषद है लेकिन अलग राज्य नहीं है। गोरखा आंदोलन गोरखा पहचान, भाषा, नागरिकता और विकास की मांग पर आधारित रहा, जो आज भी जारी है।
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