कभी योगी तो कभी अखिलेश पर सीधा अटैक, इतनी लाइमलाइट में क्यों रहते हैं OP राजभर?
इन दिनों यूपी में सबसे ज्यादा चर्चा ओम प्रकाश राजभर की हो रही है। वह हर दिन अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी पर हमलावर हैं और अब सपा भी उन्हें खूब जवाब दे रही है।

ओम प्रकाश राजभर, Photo Credit: Social Media
गले में पीला गमछा, पीली जैकेट और एक सांस में दर्जनों जातियों और जिलों का नाम। यह पहचान है उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (SBSP) के मुखिया ओम प्रकाश राजभर की। हर मौके पर बहुजन समाज पार्टी (BSP) की मुखिया मायावती की तारीफ करते हैं, इन दिनों भारतीय जनता पार्टी (BJP) के साथ गठबंधन में हैं और इन दिनों उनके निशाने पर हैं समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव। अपने फेसबुक और ट्विटर प्रोफाइल से लेकर मीडिया में दी जाने वाली बाइट तक में ओम प्रकाश राजभर यानी ओ पी राजभर अखिलेश यादव को ही निशाने पर ले रहे हैं। इसका नतीजा यह हुआ है कि अब समाजवादी पार्टी भी राजभर के खिलाफ उतर आई है और खुद अखिलेश यादव उनको जवाब दे रहे हैं।
इन्हीं ओम प्रकाश राजभर ने समाजवादी पार्टी के संसदीय और विधायक दल में टूट का दावा करके उत्तर प्रदेश की राजनीति में खलबली मचा दी है। वह दावा करते हैं कि ऐसे कई राज हैं जो अखिलेश यादव के करीबियों के अलावा सिर्फ उन्हें पता है। रोचक बात है कि यही ओम प्रकाश राजभर एक बार योगी आदित्यनाथ सरकार से इस्तीफा देकर चले गए थे। 2022 के विधानसभा चुनाव में वह अखिलेश यादव के साथ थे और हर दिन योगी-मोदी की आलोचना करते थे। जब 2022 में समाजवादी पार्टी सत्ता से दूर रह गई तो राजभर ने धीरे-धीरे फिर से बीजेपी से नजदीकियां बढ़ाईं और योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री बन गए। अब वही राजभर इस बार अखिलेश यादव पर हमलावर हैं। आइए समझते हैं कि आखिर उनकी इतनी लाइमलाइट की वजह क्या है...
अखिलेश पर हमलावर हैं राजभर
इन दिनों ओम प्रकाश सबसे ज्यादा हमले अखिलेश यादव पर कर रहे हैं। वह समाजवादी पार्टी के नेताओं, अखिलेश यादव और पार्टी के संगठन से जुड़ी छोटी-छोटी बातें सार्वजनिक तौर पर लिखते हैं जिससे समाजवादी पार्टी तमतमा उठती है। वह समाजवादी पार्टी के अजेंडा को लेकर जमकर आलोचना भी कर रहे हैं। वह नियमित तौर पर हर दिन अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी को साधते हुए पहले तो सोशल मीडिया पोस्ट करते हैं, फिर मीडिया में बाइट देते हैं और शाम तक फिर से पोस्ट का जवाब दे देते हैं। इसका असर यह हुआ है कि समाजवादी पार्टी ही नहीं खुद अखिलेश यादव भी अब उनको जवाब देने लगे हैं।
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कहा जा रहा है कि इसके जरिए ओ पी राजभर पूर्वांचल की लड़ाई SBSP बनाम समाजवादी पार्टी करके अपनी सीटों की संख्या बढ़ाना चाहते हैं। इसकी वजह यह है कि अखिलेश यादव ने तो उऩ्हें 2022 में 17 सीटें दे दी थीं लेकिन बीजेपी के गठबंधन में उन्हें इतनी सीटें मिलना आसान नहीं है। वहीं, ओम प्रकाश राजभर पूर्वांचल की 26 सीटों पर दावा ठोंक रहे हैं। यही वजह है कि वह सीधे अखिलेश यादव को आड़े हाथ लेकर अपना राजनीतिक कद बढ़ाने में लगे हुए हैं।
कभी निशाने पर थे योगी आदित्यनाथ
2017 से 2019 तक योगी आदित्यनाथ की ही सरकार में मंत्री रहे ओम प्रकाश राजभर ने जब इस्तीफा दिया था तब वह ठीक इसी तरह योगी आदित्यनाथ पर हमले बोलते थे, जैसे कि वह अभी अखिलेश यादव को निशाना बना रहे हैं। एक समय पर तो ओम प्रकाश राजभर ने यह तक कह दिया था कि योगी आदित्यनाथ उनकी हत्या कराना चाहते हैं। एनडीए में रहते हुए उन्होंने यह भी कहा था कि अगर बीजेपी 2022 में भी योगी आदित्यनाथ की अगुवाई में चुनाव लड़ेगी तो वह गठबंधन में नहीं रहेंगे। बाद में राजभर ने यही किया लेकिन जब बीजेपी जीत भी गई तो फिर से उसी के साथ लौट आए और उन्हीं योगी आदित्यनाथ की सरकार में मंत्री बन गए।
2021 में शिक्षक भर्ती को लेकर अभ्यर्थियों ने प्रदर्शन किया था तब भी राजभर ने योगी सरकार को आड़े हाथ लिया था। उनका कहना था कि योगी आदित्यनाथ डराकर युवाओं की आवाज दबाना चाहते हैं। यही राजभर केशव प्रसाद मौर्य को उकसाते थे और कहते थे कि योगी आदित्यनाथ तो केशव प्रसाद मौर्य को स्टूल पर बैठाते हैं क्योंकि वह पिछड़ी जाति के हैं।
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2022 में जब योगी आदित्यनाथ दूसरी बार मुख्यमंत्री बने तो ओम प्रकाश राजभर ने उन्हें बधाई देते हुए पांच वादे याद दिलाए थे। इसमें आवारा जानवरों से निजात दिलाने, युवाओं को नौकरी देने, स्कूलों की फीस कम करने, दवाई और टेस्ट सस्ता करने और सभी वर्गों के साथ न्याय करने जैसे वादे शामिल थे। तब भी चर्चा होने लगी थी कि राजभर बीजेपी के साथ जाएंगे लेकिन वह बार-बार कह रहे थे कि वह सपा के ही साथ बने रहेंगे।
मुंहफट, बेबाक और सटीक हमले
ओम प्रकाश राजभर के चर्चा में रहने की वजह है कि वह एकदम बेबाक और मुंहफट हैं। वह बहुत सहजता से कह देते हैं कि वह जिधर रहते हैं, उधर की गाते हैं। वह ना सिर्फ ऐसा कहते हैं बल्कि ऐसा ही करते भी हैं। एनडीए में ही अनुप्रिया पटेल और संजय निषाद भी हैं लेकिन ये नेता विपक्षियों पर उस तरह से हमलावर नहीं हैं जिस तरह से ओम प्रकाश राजभर हैं। इन दिनों जितने तीखे हमले ओम प्रकाश राजभर समाजवादी पार्टी पर कर रहे हैं, उतना तो बीजेपी भी नहीं कर रही है।
राजभर के बारे में एक और बात है कि वह एकदम बेबाक होकर बोलते हैं। वह ना सिर्फ मुखरता से बोलते हैं बल्कि ऐसे अंदाज में बोलते हैं कि आम जनता को उनकी बातें पसंद भी आते हैं। बड़े मंचों से भी वह भोजपुरी में बोलने लगते हैं, स्थानीय मुहावरे उछाल देते हैं और हंसते हुए कई ऐसी बातें बोल जाते हैं जो लोगों को पसंद आती हैं। यही वजह है कि वह हमेशा चर्चा में रहते हैं और मीडिया भी उन्हें भरपूर फुटेज देता है।
कहां से आती है यह ताकत?
दरअसल, राजभर लगातार दावा करते रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में राजभर मतदाताओं की संख्या 12 पर्सेंट है। उनका कहना है कि पूर्वांचल में राजभर वोटर 12 से 22 पर्सेंट है। इसी के दम पर वह एक सांस में उन जिलों का नाम गिनवाते हैं जहां राजभर वोटर हैं। वह राजभरों के अलावा कई पिछड़ी जातियों का नाम भी गिनाते हैं और कहते हैं कि इन सबके लिए वह लड़ते हैं।
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2017 में 4 और 2022 में 6 सीटों पर SBSP की जीत यह दिखाती है कि राजभर ना सिर्फ राजभर बल्कि कई अन्य पिछड़ी जातियों को वोटरों को साधने में कामयाब रहे हैं। लंबे समय से इन जातियों के लोग बसपा के साथ रहे हैं, ऐसे में उनको बसपा से तोड़कर एनडीए के साथ लाने में भी राजभर की भूमिका अहम रही है। इसके लिए राजभर ने लंबे समय से यह भी मांग उठाई है कि राजभरों को अनुसूचित जाति में शामिल किया जाए और आरक्षण दिया जाए। उनका तर्क है कि ओबीसी में रहने के बावजूद तमाम जातियों को आरक्षण का लाभ नहीं मिल पाता है।
कैसा रहा है राजनीतिक करियर?
लंबे समय तक बहुजन समाज पार्टी (BSP) में रहे ओम प्रकाश राजभर आज भी मायावती की बहुत तारीफ करते हैं। वह साल 1991 और 1996 में BSP के टिकट पर ही चुनाव लड़े थे लेकिन उन्हें जीत नहीं मिली थी। वह वाराणसी में BSP के जिलाध्यक्ष भी थे। जब मायावती ने भदोही जिले का नाम संत रविदास नगर किया तो वह नाराज हो गए। साल 2002 में वह फिर से टिकट चाहते थे लेकिन उन्हें एहसास हो गया था कि अब उनकी दाल नहीं गलने वाली है। ऐसे में उन्होंने BSP का साथ छोड़ दिया और सोनेलाल पटेल के अपना दल में शामिल हो गए।
अपना दल में भी राजभर टिक नहीं सके और कुछ महीने बाद ही यानी साल 2002 में उन्होंने सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (SBSP) बनाई। इसी के साथ उन्होंने राजभर और तमाम अन्य पिछड़ी जातियों को साधने की कोशिश शुरू की। 2004 के लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी ने यूपी की 14 और बिहार की एक लोकसभा चुनाव में उम्मीदवार उतारे लेकिन कहीं कोई कामयाबी नहीं मिली। 2007 में यूपी के विधानसभा चुनाव में 97 सीटों पर कैंडिडेट उतारे लेकिन फिर कहीं सफलता नहीं मिली।
2012 में उन्होंने मुख्तार अंसारी की पार्टी कौमी एकता दल से गठबंधन किया। तब उनकी पार्टी ने 52 सीटों पर उम्मीदवार उतारे लेकिन एक भी उम्मीदवार को जीत मिली। 2014 के लोकसभा चुनाव में राजभर ने 13 सीटों पर उम्मीदवार उतारे। खुद सलेमपुर से चुनाव लड़े लेकिन फिर सारे उम्मीदवारों की हार हुई। लगातार 2 दशक सक्रिय रहने और चुनाव लड़ने का असर यह हुआ कि उन्हें पूर्वांचल के कई जिलों में लोग पहचानने लगे। उन्होंने राजभर मतदाताओं के बीच अच्छी पहचान बनाई।
अमित शाह ने बदल दी किस्मत!
2017 में यूपी की जिम्मेदारी संभाल रहे अमित शाह की नजर ऐसे दलों, जातियों और नेताओं पर थी जो अपने क्षेत्र में मजबूत हों। इसी को सोशल इंजीनियरिंग का नाम दिया गया। अमित शाह ने राजभर के अलावा अपना दल (सोनेलाल) को भी अपने साथ लिया था। साथ ही, अलग-अलग जातियों के नेताओं को बीजेपी में शामिल करवाया और उनको भी टिकट दिया। इसी सब में ओम प्रकाश राजभर की किस्मत चमक गई। बीजेपी के गठबंधन में SBSP को 8 सीटें मिलीं और 4 पर उसे जीत भी मिल गई। सिर्फ 4 सीटें जीतने के बावजूद ओम प्रकाश राजभर यूपी की योगी आदित्यनाथ सरकार में मंत्री बन गए।
हालांकि, योगी आदित्यनाथ से उनकी तनातनी शुरू हो गई। अधिकारियों के ट्रांसपर, लखनऊ में पार्टी ऑफिस और कई अन्य नेताओं को मंत्री पद दिलाने को लेकर ओ पी राजभर भिड़ने लगे। एक बार तो वह गाजीपुर के डीएम को हटवाने के लिए धरने पर बैठ गए थे। कई बार कोशिश भी लेकिन योगी आदित्यनाथ ने उनसे मुलाकात नहीं की। एक बार तो विधानसभा भवन में राजभर ने कहा था कि वह इस्तीफा लेकर घूम रहे हैं और अगर सीएम योगी मिल गए तो तुरंत दे देंगे।
बीजेपी से दुश्मनी, अखिलेश से दोस्ती
2019 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले ओपी राजभर ने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने कहा कि बीजेपी अपने सिंबल पर उन्हें लोकसभा चुनाव लड़वाना चाहती थी। इसके बाद से वह खुलकर बीजेपी के खिलाफ उतर आए। अब उन्हें नए साथी की तलाश थी और अखिलेश यादव भी बीजेपी गठबंधन को कमजोर करने में लगे थी। इसी क्रम में अक्तूबर 2021 में समाजवादी पार्टी और SBSP का गठबंधन हो गया।
अखिलेश यादव ने राजभर की SBSP को 17 सीटें दी थीं और इसमें से 6 पर उसे जीत भी मिली। हालांकि, सत्ता परिवर्तन नहीं हुआ और राजभर का सपा से मोहभंग होने लगा। चुनाव नतीजों के बाद से ही वह अखिलेश यादव की आलोचना करने लगे और धीरे-धीरे बीजेपी से नजदीकियां बढ़ाने लगे। जुलाई 2023 में ही वह फिर से एनडीए में लौट आए। मार्च 2024 यानी लोकसभा चुनाव से ठीक पहले राजभर फिर से योगी सरकार में मंत्री बन गए और अब बीजेपी के ही साथ हैं।
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