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बंगाल में दुर्गा पूजा में खास है महालया, चक्षु दान और पाड़ साड़ी, परंपरा समझिए

शारदीय नवरात्र का त्योहार पश्चिम बंगाल में बेहद खास तरीके से मनाया जाता है। इस दौरान न सिर्फ पंडाल सजाए जाते हैं, बल्कि त्योहार शुरू होने से पहले महालया की परंपरा भी निभाई जाती है। इसके बाद दुर्गा पूजा के दौरान चक्षु दान जैसी परंपरा निभाई जाती है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर, Photo Credit- AI Generated

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इस साल 11 अक्टूबर से शारदीय नवरात्र के त्योहार की शुरुआत होगी। इस दौरान भक्त व्रत रखकर देवी मां की उपासना करेंगे। शारदीय नवरात्र की सबसे खास बात यह है कि इसे अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग तरीके से मनाया जाता है। खासतौर पर पश्चिम बंगाल में यह त्योहार विशेष तरीके से मनाया जाता है, जहां शारदीय नवरात्र शुरू होने से पहले महालया की रस्म निभाई जाती है। इसके बाद दुर्गा पूजा के दौरान चक्षु दान की परंपरा निभाई जाती है। साथ ही, कई महिलाएं लाल बॉर्डर वाली सफेद साड़ी पहनती हैं। इस साड़ी को पहनने के पीछे भी एक गहरी परंपरा जुड़ी हुई है।

 

पश्चिम बंगाल में शारदीय नवरात्र और दुर्गा पूजा के दौरान बड़े-बड़े पंडाल लगाए जाते हैं, जहां मिट्टी से बनी मां दुर्गा की प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं। इन प्रतिमाओं में देवी मां की आंखों को बेहद सुंदर तरीके से बनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा की शुरुआत महालया की रस्म से जुड़ी हुई है। अब सवाल उठता है कि महालया से लेकर चक्षु दान की परंपरा तक का क्या अर्थ है?

 

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क्या है महालया की परंपरा?

पश्चिम बंगाल में महालया की परंपरा बेहद खास मानी जाती है। यह परंपरा सर्वपितृ अमावस्या के दिन निभाई जाती है। इस साल 10 अक्टूबर को यह परंपरा निभाई जाएगी। पितृपक्ष के आखिरी दिन सुबह के समय लोग पिंडदान, श्राद्ध और तर्पण करते हैं। इसके बाद मां दुर्गा के आगमन की तैयारियां शुरू हो जाती हैं।

 

बंगाल की मान्यताओं में मां दुर्गा को अपनी पुत्री के रूप में देखा जाता है, जिनका मायके में स्वागत किया जाता है। इसी भाव के साथ मां दुर्गा के आगमन का उत्सव मनाया जाता है। महालया को मां दुर्गा के आगमन और दुर्गा पूजा की शुरुआत से भी जोड़कर देखा जाता है।

 

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चक्षु दान की खास परंपरा भी दुर्गा प्रतिमा के निर्माण से जुड़ी हुई है। इस परंपरा में मां दुर्गा की प्रतिमा की आंखें बनाई जाती हैं। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, मां दुर्गा की मिट्टी की प्रतिमा बनाते समय आंखें बनाने का काम सबसे आखिर में किया जाता है। इसे चक्षु दान कहा जाता है। इसके बाद दुर्गा पूजा के दौरान पंडालों में भक्त एकत्र होकर मां दुर्गा की पूजा-अर्चना करते हैं।

पाड़ साड़ी का क्या है महत्व?

पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा के दौरान कई महिलाएं सफेद रंग की साड़ी पहनती हैं, जिसके किनारे पर लाल रंग का बॉर्डर होता है। इसे बंगाल में पाड़ साड़ी कहा जाता है। यह साड़ी जितनी खूबसूरत होती है, उतनी ही पारंपरिक और शुभ भी मानी जाती है।

 

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यह साड़ी बंगाल की पारंपरिक संस्कृति से जुड़ी हुई है। इसे अक्सर महिलाएं शुभ अवसरों और धार्मिक उत्सवों के दौरान पहनती हैं। लाल और सफेद रंग की यह साड़ी बंगाल की सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा है। इसी वजह से दुर्गा पूजा के दौरान भी महिलाएं इस पारंपरिक साड़ी को पहनना पसंद करती हैं।

 

नोट: यह लेख धार्मिक मान्यताओं और धर्म ग्रंथों में वर्णित बातों पर आधारित है। इसकी पुष्टि हम नहीं करते हैं।

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