2024 के प्रकोप के बाद राजस्थान और गुजरात में चांदीपुरा वायरस ने एक बार फिर लोगों की चिंता बढ़ा दी है। चांदीपुरा वायरस के संक्रमण से अब तक 12 बच्चों की जान जा चुकी है, जिनमें कई संदिग्ध मामले भी शामिल हैं। आमतौर पर यह वायरस 15 साल से कम उम्र के बच्चों में सैंड फ्लाई (रेत मक्खी) के काटने से फैलता है। हालांकि, कई मामलों में बड़े भी इसकी चपेट में आ सकते हैं।
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, इस स्थिति में संक्रमण होने पर बच्चे को तेज बुखार, उल्टी, दस्त, ठंड लगना और शरीर में झटके या ऐंठन की समस्या हो सकती है। इसलिए ऐसे लक्षण दिखते ही बच्चे को तुरंत अस्पताल ले जाने की सलाह दी जाती है, डॉक्टरों का कहना है कि इस स्थिति में इलाज में देरी होने पर उसकी हालत गंभीर हो सकती है।
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क्या है चांदीपुरा वायरस?
डॉ. अर्चना पाटे, कंसल्टेंट, इंटरनल मेडिसिन, फोर्टिस हॉस्पिटल के मुताबिक, 'यह वायरस मुख्य रूप से संक्रमित सैंडफ्लाई (रेतीली मक्खी) के काटने से फैलता है। कुछ मामलों में मच्छर और टिक (किलनी) भी इसके फैलने में भूमिका निभा सकते हैं। शुरुआत में तेज बुखार, उल्टी, सिरदर्द और बहुत ज्यादा कमजोरी जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। यह वायरस दिमाग को तेजी से प्रभावित कर सकता है, जिससे दौरे पड़ना, बेहोशी और दिमाग में सूजन जैसी गंभीर स्थिति हो सकती है। फिलहाल इस वायरस का कोई खास इलाज या वैक्सीन उपलब्ध नहीं है। इसलिए लक्षण दिखते ही तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना बहुत जरूरी है।'
आसान शब्दों में कहें तो चांदीपुरा वायरस यानी सीएचपीवी, रैब्डोविरिडे फैमिली का वायरस है। यह वायरस सैंडफ्लाई (रेतीली मक्खी) के काटने से फैलता है। इस स्थिति में तेज बुखार, सिरदर्द, उल्टी और दौरे जैसे लक्षण दिख सकते हैं। गंभीर स्थिति में मरीज बेहोश हो सकता है और कोमा में भी जा सकता है। इतना ही नहीं यह एक्यूट एन्सेफलाइटिस सिंड्रोम यानी AES का कारण बन सकता है।
समझें क्या है एक्यूट एन्सेफलाइटिस सिंड्रोम यानी AES
डॉ. असमा बीबी, मुख्य प्रयोगशाला प्रमुख, न्यूबर्ग डायग्नोस्टिक्स के मुताबिक, 'एक्यूट एन्सेफेलाइटिस सिंड्रोम (AES) कोई एक बीमारी नहीं है। यह ऐसी कई बीमारियों का समूह है, जिनमें दिमाग में सूजन आ जाती है। चांदीपुरा वायरस और जापानी एन्सेफेलाइटिस जैसी बीमारियों में तेज बुखार, उल्टी, दौरे और बेहोशी जैसे एक जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। लेकिन ये बीमारियां अलग-अलग तरीकों से फैलती हैं, इसलिए इनसे बचाव के उपाय भी अलग होते हैं।'
एक्सपर्ट का कहना है कि इस स्थिति में समय पर और सही लैब जांच बहुत जरूरी है। शुरुआत में इलाज भले ही एक जैसा हो, लेकिन जब यह पता चल जाता है कि बीमारी किस वायरस या कारण से हुई है, तो उसी के हिसाब से मच्छरों पर नियंत्रण, सैंड फ्लाई (रेत मक्खी) पर नियंत्रण या टीकाकरण जैसे सही कदम जल्दी उठाए जा सकते हैं।
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उन्होंने कहा, 'अगर PCR जैसी आधुनिक जांच तकनीकों को देशभर में मजबूत बनाया जाए, तो बीमारी की पहचान जल्दी हो सकेगी, निगरानी बेहतर होगी और समय पर इलाज व बचाव के कदम उठाए जा सकेंगे।' भारत में एन्सेफेलाइटिस जैसी गंभीर बीमारी से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए मजबूत और लैब जांच पर आधारित AES जांच नेटवर्क बनाना समय की सबसे बड़ी जरूरत है।
बचाव का सबसे अच्छा तरीका
एक्सपर्ट के मुताबिक, इस वायरस से बचाव का सबसे अच्छा तरीका है कीड़ों के काटने से बचना। बच्चों को पूरे बाजू के कपड़े पहनाएं, कीट भगाने वाली क्रीम या स्प्रे का इस्तेमाल करें, मच्छरदानी या कीटनाशक लगी जाली के नीचे सुलाएं और घर के आसपास सफाई रखें ताकि कीड़े न पनपें। प्रकोप के समय बच्चों को शाम या रात के समय बाहर खेलने से बचाना भी जरूरी है। यदि किसी बच्चे को अचानक तेज बुखार हो और उसके साथ सुस्ती, बार-बार उल्टी या दौरे पड़ें, तो इसे बिल्कुल नजरअंदाज न करें और तुरंत अस्पताल ले जाएं। सही समय पर इलाज मिलने से जान बचाई जा सकती है। जागरूकता, व्यक्तिगत सुरक्षा और आसपास की साफ-सफाई ही चांदीपुरा वायरस से बचाव के सबसे प्रभावी उपाय हैं।