उत्तर प्रदेश सरकार डिजिटल बुनियादी ढांचे को नई ऊंचाई देने की तैयारी में है। प्रदेश में देश का पहला डेटा कॉरिडोर विकसित किया जाएगा। इसके पहले चरण में करीब छह लाख करोड़ रुपये के निवेश से छह गीगावाट क्षमता के डेटा क्लस्टर स्थापित किए जाने की योजना है। इस महत्वाकांक्षी परियोजना का विस्तृत रोडमैप तैयार करने की जिम्मेदारी अमेरिकी कंपनी बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप (BCG) को दी गई है। कंपनी छह महीने में अपनी रिपोर्ट देगी।
डेटा कॉरिडोर विकसित करने से पहले प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों में मिट्टी, पानी और बिजली की उपलब्धता का विस्तृत अध्ययन कराया जाएगा। डेटा सेंटर के संचालन के लिए 24 घंटे निर्बाध बिजली जरूरी है। साथ ही पर्याप्त पानी की उपलब्धता भी अहम है। इसलिए उपयुक्त स्थान का चयन परियोजना का सबसे महत्वपूर्ण चरण होगा।
एक गीगावाट क्षमता का डेटा सेंटर स्थापित करने पर करीब एक लाख करोड़ रुपये का निवेश आएगा। दुनिया में इस समय करीब 120 गीगावाट क्षमता के डेटा सेंटर हैं। इनमें अमेरिका की हिस्सेदारी करीब 50 गीगावाट, चीन की 25 गीगावाट और यूरोप की 14 गीगावाट है।भारत में अभी करीब 1.7 गीगावाट क्षमता के डेटा सेंटर संचालित हैं, जबकि 1.8 गीगावाट क्षमता के नए डेटा सेंटर निर्माणाधीन हैं। उत्तर प्रदेश में फिलहाल करीब 350 मेगावाट क्षमता के डेटा सेंटर हैं और चार नए डेटा सेंटर स्थापित किए जा रहे हैं।
जमीन की मजबूती से लेकर भूजल तक की होगी जांच
डेटा सेंटर के लिए जमीन का चयन आसान नहीं होगा। इसके लिए 10 से 15 मीटर गहराई तक मिट्टी के नमूने लिए जाएंगे। इससे यह पता लगाया जाएगा कि जमीन भारी सर्वर, रैक और अन्य उपकरणों का भार सुरक्षित रूप से उठा सकती है या नहीं।इसके साथ ही भूजल स्तर, मिट्टी की गुणवत्ता और बाढ़, आंधी तथा भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं के जोखिम का भी आकलन किया जाएगा। डेटा सेंटर के लिए ऐसी जगह चुनी जाएगी जहां भविष्य में प्राकृतिक आपदा से परियोजना को बड़ा नुकसान न हो।
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एक मेगावाट क्षमता के लिए करीब एक मेगावाट बिजली की जरूरत
डेटा सेंटर में बड़ी संख्या में सर्वर, रैक, कूलिंग सिस्टम और दूसरे उपकरण लगातार चलते हैं। ऐसे में बिजली की खपत भी बहुत अधिक होती है। एक मेगावाट क्षमता के डेटा सेंटर को संचालित करने के लिए करीब एक मेगावाट बिजली की जरूरत होती है। इसलिए प्रस्तावित डेटा कॉरिडोर के लिए 24 घंटे निर्बाध बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करना बड़ी चुनौती होगी।
डेटा सेंटर में सर्वर और दूसरे उपकरण लगातार गर्मी पैदा करते हैं। इन्हें ठंडा रखने के लिए कूलिंग सिस्टम का इस्तेमाल होता है और इसके लिए भारी मात्रा में पानी की जरूरत पड़ती है। इसी वजह से डेटा सेंटर के लिए जगह तय करते समय बिजली और पानी दोनों की पर्याप्त उपलब्धता को प्राथमिकता दी जाएगी।
यूपी को डेटा हब बनाने की तैयारी
प्रदेश में मौजूदा डेटा सेंटर क्षमता के विस्तार के साथ सरकार उत्तर प्रदेश को देश के प्रमुख डेटा हब के रूप में विकसित करना चाहती है। प्रदेश में अभी करीब 350 मेगावाट क्षमता के डेटा सेंटर मौजूद हैं और चार नए डेटा सेंटर भी स्थापित किए जा रहे हैं।प्रस्तावित डेटा कॉरिडोर के जरिए बड़े निवेश के साथ डिजिटल बुनियादी ढांचे का विस्तार होगा। इससे डेटा भंडारण और प्रसंस्करण की क्षमता बढ़ाने में मदद मिलेगी और प्रदेश में डिजिटल क्षेत्र से जुड़ी गतिविधियों को भी गति मिलने की उम्मीद है।
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छह महीने में तैयार होगा पूरा रोडमैप
पूरी परियोजना को लेकर बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप विस्तृत अध्ययन करेगा। कंपनी छह महीने में अपनी रिपोर्ट देगी। इसमें डेटा सेंटर के लिए उपयुक्त स्थान, जमीन की क्षमता, पानी और बिजली की उपलब्धता तथा प्राकृतिक आपदाओं के जोखिम सहित जरूरी बुनियादी ढांचे का आकलन किया जाएगा। सरकार ऐसे स्थानों की पहचान करेगी जहां बड़े डेटा क्लस्टर लंबे समय तक सुरक्षित तरीके से संचालित किए जा सकें और उन्हें 24 घंटे बिजली तथा पर्याप्त पानी उपलब्ध कराया जा सके। इसके बाद डेटा कॉरिडोर को विकसित करने की दिशा में आगे की प्रक्रिया शुरू होगी। इस तरह छह गीगावाट क्षमता के डेटा क्लस्टर और करीब छह लाख करोड़ रुपये के निवेश वाली यह परियोजना उत्तर प्रदेश को देश के बड़े डिजिटल केंद्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में बड़ा कदम मानी जा रही है।