हरियाणा भारतीय जनता पार्टी के दिग्गज नेता और कैबिनेट मंत्री अनिल विज एक बार फिर चर्चा में हैं। वह अंबाला कैंट की प्रस्तावित फ्री-होल्ड पॉलिसी को लेकर अपनी ही सरकार से भिड़ने के लिए तैयार हैं। विज का कहना है कि इस पॉलिसी का मौजूदा ड्राफ्ट अगर इसी रूप में लागू हुआ तो अंबाला कैंट के लोगों को बड़ा नुकसान हो सकता है। उन्होंने दावा किया कि 28 जुलाई की कैबिनेट बैठक में इस प्रस्ताव को मंजूरी मिलने से उन्होंने रोक दिया। इसके बाद उन्होंने अपने समर्थकों के साथ बैठक भी की और अनिल विज का यह रुख चर्चा का विषय बना हुआ है।
अनिल विज के मुताबिक, अंबाला कैंट से जुड़ी इस पॉलिसी को तैयार करते समय उनसे एक बार भी सलाह नहीं ली गई, जबकि वह इस विधानसभा क्षेत्र का सात बार प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। उनका सवाल है कि जिस इलाके के लोगों पर पॉलिसी का सीधा असर पड़ेगा, उसके निर्वाचित प्रतिनिधि और स्थानीय लोगों की अपेक्षाओं को समझे बिना नीति कैसे बनाई जा सकती है। यह स्थिति उनकी अपनी ही पार्टी की सरकार में है।
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क्या है फ्री-होल्ड पॉलिसी?
इस पूरे विवाद को समझने के लिए हमें पहले फ्री होल्ड-पॉलिसी को समझना होगा। लीजहोल्ड और फ्री-होल्ड दो अलग-अलग टर्म हैं। लीजहोल्ड संपत्ति में व्यक्ति को जमीन पर उपयोग या कब्जे का अधिकार लीज की शर्तों के तहत मिलता है, जबकि फ्री-होल्ड में जमीन का मालिकाना हक भी व्यक्ति के नाम हो जाता है।
अंबाला कैंट के जिस इलाके की बात हो रही है, वहां लंबे समय से ऐसी संपत्तियां हैं जिनका जमीन संबंधी मालिकाना ढांचा सामान्य प्रॉपर्टी से अलग रहा है। अंबाला के सदर एक्साइज एरिया में पुरानी लीज और ओल्ड ग्रांट प्रॉपर्टी भी रही हैं। 2021 में घोषित एक नीति के तहत 20 साल से अधिक पुरानी दुकानों और मकानों को फ्री-होल्ड करने की बात सामने आई थी। उस समय बताया गया था कि अंबाला कैंट के सदर एक्साइज एरिया में करीब 11 हजार से ज्यादा प्रॉपर्टी इस प्रक्रिया का इंतजार कर रही थीं। अक इसी फ्री होल्ड पॉलिसी के नए प्रस्ताव को लेकर विवाद हो रहा है।
अनिल विज को क्या आपत्ति?
अनिल विज इस बात से नाराज हैं कि उनके इलाके के लिए नीति बनाई जा रही है और उनसे सलाह भी नहीं ली जा रही है। अनिल विज का सबसे बड़ा सवाल जमीन की कीमत और रजिस्ट्रेशन के लिए तय रकम को लेकर है। उनके मुताबिक प्रस्तावित नीति में प्रॉपर्टी को कलेक्टर रेट के आधार पर रजिस्टर्ड कराने की व्यवस्था है। उन्होंने अपने समर्थकों के साथ मीटिंग में इसका उदाहरण देते हुए कहा कि अगर किसी व्यक्ति के पास 1,000 वर्ग गज जमीन है और उस इलाके में कलेक्टर रेट 60 हजार रुपये प्रति वर्ग गज है, तो उसे जमीन रजिस्टर्ड कराने के लिए 6 करोड़ रुपये जमा करने पड़ेंगे। यही प्रावधान विज के विरोध की बड़ी वजह है। उनका कहना है कि इतने बड़े भुगतान की शर्त आम लोगों के लिए भारी पड़ सकती है।
पैसे नहीं दिए तो क्या होगा?
अनिल विज ने प्रस्तावित नीति के एक और प्रावधान पर सवाल उठाया है। उनके मुताबिक यदि संबंधित व्यक्ति निर्धारित रकम जमा नहीं करता है तो सरकार को संपत्ति को सील करने, कब्जे में लेने और उसका निपटारा करने का अधिकार मिल सकता है। यानी विवाद सिर्फ रजिस्ट्री की फीस तक सीमित नहीं है। विज का कहना है कि प्रस्तावित प्रावधानों को लेकर संपत्ति मालिकों के अधिकारों पर भी गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
इसके साथ ही अनिव विज ने संपत्ति के पुराने दस्तावेजों की शर्त को लेकर भी सवाल उठाया है। प्रस्ताव के मुताबिक आवेदकों को जमीन के मूल मालिकाना दस्तावेज जमा करने होंगे। अनिल विज का कहना है कि अंबाला कैंट का इतिहास करीब डेढ़ सौ साल पुराना है। इस दौरान कई पुश्तैनी संपत्तियों का बंटवारा मौखिक रूप से भी हुआ और हर पुराने लेन-देन का लिखित रिकॉर्ड आज उपलब्ध होना मुश्किल है। ऐसे में लोगों से करीब 150 साल पुराने मूल दस्तावेज मांगना व्यावहारिक नहीं है।
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अपनी सरकार के खिलाफ लड़ेंगे विज?
इस मुद्दे पर विज ने अंबाला कैंट के लोगों के साथ खड़े होने की बात कही है। उनका कहना है कि अगर लोगों के जायज अधिकारों के लिए लड़ना पड़ा तो वह उनके साथ रहेंगे। अनिल विज ने इसके लिए तीन संभावनाएं भी बताई हैं। पहली, सरकार और अधिकारियों के साथ अलग बैठक हो और विवादित प्रावधानों को हटाया जाए। दूसरी, अगर समाधान नहीं निकलता तो पॉलिसी को अदालत में चुनौती दी जाए। इसके लिए उन्होंने मजबूत नागरिक समिति बनाने की बात कही। तीसरी और सबसे कठिन स्थिति यह होगी कि लोगों को अपने अधिकारों के लिए सरकार के खिलाफ भी लड़ना पड़े। अनिल विज के इस रुख को लेकर पूरे राज्य में चर्चा हो रही है।