जिस NGO को जंगल बचाना था, उसी ने शिकारियों से मिलकर तेंदुए की खाल बेच दी
MP की STSF ने इसी हफ्ते जिन दो लोगों को जानवरों की तस्करी के आरोप में पकड़ा था, उनसे पूछताछ में पता चला है कि दोनों दिल्ली के एक बड़े वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन NGO के लिए काम करते थे।

सांकेतिक तस्वीर, Photo Credit-ChatGPT
मध्य प्रदेश की स्टेट टाइगर स्ट्राइक फोर्स (STSF) की जांच में एक बड़ा मामला सामने आया है। STSF ने इसी हफ्ते जिन दो लोगों को जानवरों खासतौर से तेंदुए की तस्करी के आरोप में पकड़ा था, उनसे पूछताछ में पता चला है कि दोनों दिल्ली के एक बड़े वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन NGO, 'वाइल्डलाइफ SOS' के लिए काम करते थे। हिरासत में लिए गए दोनों आरोपी, भगवान सिंह उर्फ सलीम और उसके साथी वसीम ने बताया कि वे वाइल्डलाइफ SOS के CEO कार्तिक सत्यनारायण के कहने पर काम कर रहे थे।
इस मामले में अब STSF ने सत्यनारायण को नोटिस भेजकर 17 अगस्त को शिवपुरी में जांच अधिकारी के सामने पेश होने को कहा है। हालांकि, अभी तक सत्यनारायण की तरफ से कोई जवाब नहीं मिला है। इसके अलावा, संस्था की सह-संस्थापक गीता शेषमणि से भी संपर्क नहीं हो सका है।
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शिकार के नाम पर फर्जी कार्रवाई का शक
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, टीम को काफी डिजिटल सबूत मिले हैं, जो उन्हें उस ऑपरेशन से जोड़ते हैं, जिसके बारे में माना जाता है कि वह निजी फायदे के लिए चलाया गया था। ऐसे में इस बात की भी जांच की जा रही है कि क्या सत्यनारायण ने अपनी और NGO की एंटी-पोचिंग (शिकार-विरोधी) छवि बनाने के लिए शिकार कराया और दिखावे के लिए जब्ती की कार्रवाई की, क्या वह वाइल्डलाइफ की तस्करी में भी शामिल थे।
इस मामले में मध्य प्रदेश की चीफ वाइल्डलाइफ वॉर्डन समीता राजौरा ने 'द इंडियन एक्सप्रेस' को बताया, 'जब वाइल्डलाइफ SOS' के लिए काम करने वाले दोनों मुख्य आरोपियों ने कार्तिक सत्यनारायण का नाम लिया, तो उन्हें जांच अधिकारी के सामने पेश होने के लिए कहा गया। हम WCCB यानी वाइल्डलाइफ क्राइम कंट्रोल ब्यूरो) के साथ मिलकर काम कर रहे हैं, हम अपने जंगलों की सुरक्षा के लिए हर ज़रूरी कदम उठाएंगे।'
क्या है पूरा मामला?
दरअसल, यह मामला 23 जुलाई का है, जब ग्वालियर-आगरा हाईवे पर चार शिकारियों को 10 तेंदुओं की खाल के साथ गिरफ्तार किया गया था। उस समय, NGO 'वाइल्डलाइफ SOS' ने इस कार्रवाई का श्रेय अपनी 'फॉरेस्ट वॉच' एंटी-पोचिंग यूनिट की महीनों की निगरानी को दिया था। खालें मध्य प्रदेश से आई थीं, इसलिए STSF ने एक समानांतर जांच शुरू की और इसी जांच ने अब मामले की पूरी कहानी ही बदल दी है।
शिवपुरी और मुरैना के जंगलों में फील्ड जांच के दौरान कई ऐसी जगहें मिलीं जहां तेंदुओं के अवशेष दफनाए गए थे। 23 जुलाई को जब्त की गई खालों से DNA मैचिंग के लिए इन्हें देहरादून में वाइल्डलाइफ इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया भेजा गया है। टीम को 3 लेग-होल्ड ट्रैप यानी जानवरों को पकड़ने वाले फंदे भी मिले, और इसी सुराग से वे भगवान सिंह और उसके जरिए वसीम तक पहुंचे।
इस मामले में मध्य प्रदेश STSF ने 11 अगस्त को भगवान सिंह और 13 अगस्त को वसीम को पकड़ा। मध्य प्रदेश के एक सीनियर फॉरेस्ट ऑफिसर ने कहा, 'हमारी टीमों को तीन लेग-होल्ड ट्रैप भी मिले और कुछ गिरफ्तारियां कीं, जिनसे वे मुख्य आरोपी भगवान सिंह तक पहुंचे। वह लंबे समय से वाइल्डलाइफ का व्यापार कर रहा था और पता चला कि वह कम से कम पांच साल से इस NGO के पेरोल पर था। इसी वजह से वाइल्डलाइफ SOS के एक और कर्मचारी वसीम की गिरफ्तारी हुई।'
दावा है कि भगवान सिंह और उसके साथी वाइल्डलाइफ SOS की ही गाड़ी से शिवपुरी-मुरैना के जंगलों में घूमते थे और हरियाणा से लाए जाल स्थानीय शिकारियों को बांटते थे। भगवान सिंह ने ही चार शिकारियों को 10 तेंदुओं की खाल के साथ ग्वालियर-आगरा हाईवे पर एक नकली खरीदार के पास भेजा था, जहां यूपी पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया।
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डोनर्स और चंदे के लिए रचा गया जाल?
वन विभाग के एक सूत्र ने कहा कि यह गिरोह पिछले साल से शिवपुरी में तेंदुओं का शिकार कर रहा था। सवाल यह है कि अगर यह शिकारियों को पकड़ने का ऑपरेशन था, तो 10 तेंदुए मरने तक इसे क्यों चलने दिया गया, और चीतों वाले इलाके में जाल क्यों बांटे गए। भोपाल सूत्रों के मुताबिक इस जाल में बाघ भी फंसे हो सकते हैं। एक रिटायर्ड वन अधिकारी ने इसे तस्करों का पुराना तरीका बताया, महंगा माल बेचो, और प्रतिद्वंद्वियों को सस्ते माल के साथ पकड़वाकर डोनर्स से चंदा जुटाओ। उन्होंने भोपाल के वन विहार चिड़ियाघर में भालू के बच्चों के नाम पर हो रही फंडरेजिंग का भी जिक्र किया, जिसका राज्य से करार अगले महीने खत्म हो रहा है।
भगवान सिंह की गिरफ्तारी ने 2023 का एक पुराना मामला भी खोल दिया। दिल्ली पुलिस से बर्खास्त भगवान सिंह और वसीम उस साल तमिलनाडु के सत्यमंगलम जंगल में मौजूद थे, जब वहां बाघ की खाल, तेंदुए की खाल और बाघ का कंकाल बरामद हुआ था। तब भी वाइल्डलाइफ SOS ने इसका श्रेय लिया था।
वाइल्डलाइफ SOS ने आरोपों को नकारा
वाइल्डलाइफ SOS ने अपने खिलाफ लगे आरोपों को झूठा और बदनीयती से भरा बताकर खारिज कर दिया है। संस्था ने 32 साल में 19 राज्यों में वन विभाग और एजेंसियों के साथ मिलकर 5,31,000 से ज्यादा जानवर बचाए हैं और भालुओं को नचाने की प्रथा बंद कराने में मदद की है। सीईओ कार्तिक सत्यनारायण ने कहा कि ऐसे आरोपों से मुखबिरों और मददगारों का हौसला टूटेगा, क्योंकि जो लोग एजेंसियों की मदद करते हैं वही शक में आ जाएंगे। संस्था के पास अपने काम के पुख्ता सबूत हैं और वह हर जांच में सहयोग को तैयार है।
संस्था के सीईओ और सह-संस्थापक कार्तिक सत्यनारायण ने कहा, 'जो गंभीर आरोप लगाए गए हैं, वे हमारी 32 साल की उस अथक मेहनत को कमजोर करते हैं जिसकी वजह से लाखों जानवर बचाए गए और हजारों जानवरों की देखभाल हुई। हम यह भी आगाह करना चाहते हैं कि हमारी वैध खुफिया जानकारी और वन्यजीव अपराध रोकने में एजेंसियों को दी जाने वाली अहम मदद के साथ इस तरह का बर्ताव, आगे चलकर वन्यजीव सुरक्षा के प्रयासों पर बुरा असर डाल सकता है।'
संस्था हमेशा से ऊंचे कामकाजी और नैतिक मानकों का पालन करती रही है और भारत में वन्यजीव संरक्षण से जुड़े बदलते नियमों और ढांचे के भीतर रहकर काम करती आई है। संस्था का मानना है कि सरकारी एजेंसियों और संरक्षण से जुड़े अन्य पक्षों के साथ उसका लंबा साझेदारी भरा रिकॉर्ड खुद ही उसकी बात साबित करता है। संस्था को यह भी लगता है कि अगर वैध वन्यजीव सुरक्षा और संरक्षण नेटवर्क कमजोर पड़े, तो इससे कई और जानवरों की जान खतरे में पड़ सकती है।
इसके अलावा, संस्था की सह-संस्थापक और सचिव गीता सेशामणि ने कहा, 'वन्यजीव अपराध के खिलाफ लड़ाई न तो आसान है और न ही चुनौतियों से खाली। लेकिन इस तरह की घटनाओं को उन लोगों का हौसला कमजोर नहीं करने देना चाहिए जो वन्यजीव सुरक्षा के लिए काम कर रहे हैं। हम एजेंसियों के साथ सहयोग करते रहेंगे, जानवरों की सुरक्षा में मदद करते रहेंगे और संरक्षण के लिए समर्पित लोगों के साथ खड़े रहेंगे। हमारी प्रतिबद्धता अटल है। हम जंगल की आत्मा को जिंदा रखते रहेंगे।'
32 साल से ज्यादा के अनुभव के साथ वाइल्डलाइफ एसओएस आज भारत के 19 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मौजूद है। वाइल्डलाइफ एसओएस अपने मिशन के प्रति प्रतिबद्ध है।
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