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बंगाल से दिल्ली तक SIR बना सिरदर्द, लाखों केस पेंडिंग, इंतजार में 'वोटर'

पश्चिम बंगाल से लेकर दिल्ली तक SIR एक अजीब समस्या बन गया है। छोटी-मोटी कमियों के चलते भी लोगों को अब दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं।

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प्रतीकात्मक तस्वीर, File Photo Credit: PTI

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देशभर में हो रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन ( SIR ) को लेकर अब दिल्ली में हंगामा मचा हुआ है। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, पूर्व सीएम अरविंद केजरीवाल , लालकृष्ण आडवाणी और संवैधानिक पदों पर रहे कई अन्य लोगों को नोटिस भेजे जाने के बाद खलबली मची हुई है। इसी बीच पश्चिम बंगाल में हुए SIR को लेकर चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में एक एफिडेविट दायर करके जो बताया है उसने और चिंताएं बढ़ा दी हैं। चुनाव आयोग के जवाब के मुताबिक, ट्राइब्यूनल के पास शिकायत करने वाले लोगों की 3 प्रतिशत शिकायतों का ही निपटारा हो पाया है। ऐसे में अब दिल्ली में भी लाखों लोगों को नोटिस देने और लाखों लोगों का नाम SIR के ड्राफ्ट से बाहर होने पर सवाल उठ रहे हैं। पूछा जा रहा है कि आखिर इस तरह से कैसे हर व्यक्ति को वोट देने का अधिकार मिल पाएगा?

 

दिल्ली में SIR का ड्राफ्ट आने के साथ ही 47.6 लाख वोटरों के नाम बाहर हो गए। अब जिनके नाम लिस्ट में शामिल हैं, उनमें 31.6 लाख लोगों को नोटिस भेजा गया है। इन सभी को दस्तावेज देकर अपना दावा साबित करना होगा। इसके लिए चुनाव आयोग ने कैंप लगाने का भी एलान किया है।

 

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इस मामले पर 'द रिपोर्टर्स कलेक्टिव' की एक रिपोर्ट बताती है कि जिन इलाकों में छुग्गियों या अवैध निर्माणों को तोड़ा गया उनके नाम लिस्ट से बाहर हो गए हैं। इसी रिपोर्ट के मुताबिक, जो लोग नई जगह पर शिफ्ट हो गए हैं उनके नाम भी लिस्ट में शामिल नहीं किए जा रहे हैं जबकि चुनाव आयोग के नियम ही कहते हैं कि जिनके घर ना हों वे भी वोट देने का अधिकार रखते हैं।   

बंगाल की स्थिति ने बढ़ाई चिंता

जिस पैमाने पर दिल्ली में लोगों के नाम कटे हैं, ठीक इसी तरह पश्चिम बंगाल में भी लोगों के नाम कटे हैं। नाम कटने के खिलाफ कुल 38,31,429 अपील दायर की गईं। ट्राइब्यूनल में दायर हुईं इन अपीलों में से अभी तक सिर्फ 1,26,194 का ही निपटारा हुआ है और 37,05,235 याचिकाएं पेंडिंग हैं।  अगर इस रफ्तार से अपीलों का निपटारा होता है तो यह काम पूरा होने में ही 12 साल लग जाएंगे और इस बीच कम से 2 और विधानसभा चुनाव और इतने ही लोकसभा चुनाव भी हो जाएंगे। इनमें से 22,21,118 याचिकाएं उन लोगों की हैं जिनके नाम लिस्ट से बाहर किए गए हैं।

 

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खुद चुनाव आयोग ने भी माना है कि इन केस को निपटाने के लिए ट्राइब्यूनलकी ङमता कम है। उसने यह भी कहा है कि ट्राइब्यूनल की संख्या 24 से बढ़ाकर 42 की जाए और न्यायिक अधिकारियों को घर से भी काम करने दिया जाए। इसका असर यह हुआ है कि लाखों लोग अभी भी अधर में हैं और इससे उनके वोट देने का अधिकार प्रभावित हो रहा है। साथ ही साथ, वे अन्य योजनाओं के लाभ लेने के मामले में भी प्रभावित हो रहे हैं।

दिल्ली में क्या हो रहा है?

दिल्ली में SIR के बाद जब ड्राफ्ट पब्लिश किया गया तो उस लिस्ट में कुल 47.7 लाख लोगों के नाम कट चुके थे। इन लोगों के पास 30 सितंबर तक मौका है कि वे आपत्ति दर्ज करवाकर अपना नाम दर्ज करवा सकते हैं। आखिरी लिस्ट 4 नवंबर को आनी है। इन आपत्तियों की जांच नोटिस का काम और सुनवाई 29 अक्तूबर तक चलेगी।

 

बता दें कि दिल्ली में कुल 31.6 लाख लोगों को नोटिस भेजे गए हैं। इनको 'नौ मैपिंग' और 'लॉजिक डिस्क्रेपेंसी' के तहत नोटिस भेजे गए हैं। इसमें से अभी तक सिर्फ 23000 लोग यानी 0.7 प्रतिशत ही ऐसे हैं जिनकी सुनवाई हो चुकी है और उनके नाम लिस्ट में शामिल किए जाने को मंजूरी मिल चुकी है।

 

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अभी कैंप लगाकर लोगों की शिकायतों और आपत्तियों की सुनवाई करने की बात भी कही गई हैं। हालांकि,  द रिपोर्टर्स कलेक्टिव की रिपोर्ट कहती है कि शिकायतों का निपटारा करवाने में मजदूर वर्ग और कमजोर वर्ग के लोगों को पहले भी समस्याएं होती रही हैं। ऐसे में यह देखना होगा कि इस तरह आपत्तियां दर्ज कराकर कितने लोग अपना नाम लिस्ट में वापस शामिल करवा पाते हैं। 


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