पूजा-पाठ हो, सेहत हो या सौंदर्य हो, नारियल आम भारतीयों के घरों में नारियल, नमक की तरह घुला-मिला है। फिटनेस पसंद करने वाले लोग नारियल पानी पीते हैं, पूजा-पाठ करने वाले लोग नारियल चढ़ाते हैं, सौंदर्य पसंद करने वाले लोग नारियल शरीर में लगाते हैं। नारियल एक है, इस्तेमाल अनेक है। वैदिक धर्म में नारियल को शुभता और समृद्धि का प्रतीक मानते हैं, नारियल, अर्थव्यवस्था के नजरिए से भी भारत के लिए बहुत शुभ है।

साल 2000 के दशक तक नारियल का विदेशी निर्यात (Export) उतना ही था, जिससे ज्यादा अक्षय कुमार , अजय देवगन , सलमान और शाहरुख खान जैसे सितारे फीस ले लेते हैं। 2002 से 2003 के बीच भारत ने नारियल बेचकर करीब 25 करोड़ रुपये ही कमाए थे। 

अब भारत हर साल नारियल बेचकर इतनी तगड़ी कमाई करता है कि जितनी कमाई कई सितारे मिलकर उम्रभर नहीं करा पाए, न ही उनकी नेटवर्थ ही वहां तक पहुंच पाई। तस्वीर साफ है कि भारत का नारियल क्षेत्र अब सिर्फ पारंपरिक खेती तक सीमित नहीं रह गया है। यह क्षेत्र ग्रामीण आजीविका, कृषि विकास और सांस्कृतिक परंपराओं को मजबूती दे रहा है। 

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कितने लोगों को रोजगार दे रहा नारियल?

नारियल विकास बोर्ड और कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय की रिपोर्ट बताती है कि लगभग 3 करोड़ लोग नारियल की खेती, उससे जुड़े उद्योगों पर निर्भर है। इनमें करीब 1 करोड़ किसान शामिल हैं। भारत दुनिया में नारियल उत्पादन में पहले स्थान पर है। क्षेत्रफल में केरल सबसे आगे है, उत्पादन में तमिलनाडु और उत्पादकता में आंध्र प्रदेश सबसे आगे है। 

नारियल किस काम में आता है?

नारियल से तेल बनता है, फल के तौर पर भी लोग खाते हैं, पेय पदार्थ भी है, दवाई भी बनती है, इसके रेशे से रस्सियां बनती हैं, कपड़ों में इस्तेमाल किया जाता है, लकड़ी और ईंधन के लिए भी इस्तेमाल होता है। नारियल कच्चे माल का बेहतरीन साधन है। 

भारत सूखे नारियल का भी निर्यातक है। Photo Credit: PTI

कितनी पुरानी है भारत में नारियल की खेती?

पौराणिक कहानियों में नारियल का जिक्र मिलता है। नारियल को संस्कृत में श्रीफल भी कहते हैं। इसकी खेती करीब 3 हजार साल पुरानी है। अब ज्यादातर छोटे और सीमांत किसान इसे उगाते हैं। छत्तीसगढ़ जैसे नए राज्यों में भी किसान अब नारियल की खेती को आजीविका का विकल्प मानने लगे हैं। 

नारियल उत्पादन में भारत कहां खड़ा है?

वैश्विक स्तर पर भारत नारियल उत्पादन में पहले और क्षेत्रफल में तीसरे स्थान पर है। विश्व उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी 31.24 प्रतिशत और क्षेत्रफल में 17.90 प्रतिशत है। 2024-25 में भारत ने 2.19 लाख हेक्टेयर क्षेत्र से 20,301.22 करोड़ नारियल का उत्पादन किया। औसत उत्पादकता 9,249 नट प्रति हेक्टेयर रही। वर्ल्ड पॉपुलेशन रिव्यू के आंकड़े बताते हैं कि भारत टॉप 3 देशों में शुमार है, जहां नारियल उत्पादन सबसे ज्यादा है। 

  • इंडोनेशिया: 1,71,90,328 टन
  • फिलीपींस: 1,49,31,158 टन
  • भारत: 1,33,17,000 टन
  • ब्राजील: 27,44,418 टन
  • श्रीलंका: 22,04,150 टन
  • वियतनाम: 19,30,182 टन

कौन से राज्य नारियल उत्पादन में बेहतर कर रहे हैं?

केरल में सबसे ज्यादा 7.54 लाख हेक्टेयर क्षेत्र है और उत्पादन 5,149.87 करोड़ नट है। उत्पादन में तमिलनाडु अव्वल है, जबकि उत्पादकता में आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु आगे हैं। नारियल उत्पादों का निर्यात तेजी से बढ़ रहा है। 

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25 करोड़ रुपये से कैसे 7,038.35 करोड़ रुपये तक का निर्यात

2025-26 में नारियल का निर्यात 7,038.35 करोड़ रुपये (794.70 मिलियन डॉलर) रहा, जो पिछले साल के 4,349.03 करोड़ रुपये से 62 प्रतिशत ज्यादा है। 2001-02 में यह सिर्फ 25.3 करोड़ रुपये था। यह करीब 278 गुना ज्यादा है। 25 साल में भारत में नारियल का कारोबार 278 गुना बढ़ गया है। 

नारियल क्यों मुनाफे का सौदा हुआ?

पहले नारियल का खोल, चारकोल, तेल, साबुत नारियल और डिसिकेटेड नारियल निर्यात किया जाता था। अब वर्जिन कोकोनट ऑयल, नारियल दूध, नारियल पानी और  वैल्यू-एडेड उत्पाद भी निर्यात हो रहे हैं। बाजार मध्य पूर्व से आगे बढ़कर यूरोप, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया तक पहुंच गया है। पिछले पांच सालों में अमेरिका, संयुक्त अरब अमीरात (UAE, श्रीलंका, जर्मनी, रूस, तुर्की, बेल्जियम, ब्रिटेन और नीदरलैंड भारतीय नारियल के प्रमुख खरीदार रहे हैं। भारत का एक्टिवेटेड कार्बन एक्सपोर्ट दुनिया में सबसे ज्यादा है। इसका मतलब है कि नारियल के छिलकों, कोयले और लकड़ी से बने स्पेशल ट्रीटेड कार्बन भी दूसरे देश खरीद रहे हैं। इसका इस्तेमाल पानी साफ करने, हवा साफ करने और मेडिकल उद्योग में होता है। 

नारियल विकास बोर्ड का काम क्या है?

नारियल विकास बोर्ड (CBD) इस क्षेत्र की रीढ़ है। यह 12 जनवरी 1981 को कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय के अधीन गठित हुआ। नारियल बोर्ड का मुख्यालय कोच्चि में है और यह 22 राज्यों-केंद्र शासित प्रदेशों में काम करता है। बोर्ड का काम अच्छी पौध सामग्री तैयार करना, नारियल खेती के दायरे को बढ़ाना, उत्पादकता सुधारना, कीट-रोग प्रबंधन और उत्पादन को बढ़ावा देना है। साल 2025-26 में बोर्ड को 147.21 करोड़ रुपये जारी किए गए। इसका मकसद, नारियल उत्पादन में शोध और गुणवत्ता को बढ़ावा देना था। 

क्यों भारत में बढ़ रहा नारियल की खेती का चलन?

सरकार नारियल के गूदे पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) भी देती है। साल 2026 सीजन के लिए नारियल गूदे का एमएसपी 12,027 रुपये प्रति क्विंटल और सूखे हुए पूरे नारियल की MSP 12,500 रुपये प्रति क्विंटल तय की गई है। भारतीय राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन संघ लिमिटेड (NAFED) और भारतीय राष्ट्रीय सहकारी उपभोक्ता संघ लिमिटेड (NCCF) जैसी केंद्रीय एजेंसियां नारियल की खरीद के लिए केंद्रीय नोडल एजेंसियां हैं। राज्य स्तरीय एजेंसियां ​​भी खरीद कार्यों में सहयोग देती हैं। 

नारियल की बोरी ले जाता मजदूर। Photo Credit: PTI

और भी बेहतर हो सकती है नारियल की खेती

2000 के दशक तक सिर्फ 25 करोड़ के एक्सपोर्ट वाले भारत ने नारियल की खेती को संवारने के लिए स्थानीय स्तर पर कई काम किए। अब अच्छी पौध सामग्री के लिए डेमोंस्ट्रेशन कम सीड प्रोडक्शन फार्म बनाने पर जोर दिया जा रहा है। नए फार्मों को पहले दो साल 30 लाख रुपये और बाद में प्रति हेक्टेयर 1 लाख रुपये सालाना सहायता मिलती है। 2025-26 में 11 फार्मों से 2.41 लाख अच्छी नारियल की पौध तैयार हुई। 

न्यूक्लियस सीड गार्डन के लिए 24 लाख रुपये आवंटित हुए, जिनमें से 20.29 लाख खर्च हुए। 12 नई नर्सरियां स्थापित हुईं, जिनकी सालाना क्षमता 1.06 लाख पौध है। सार्वजनिक क्षेत्र की नर्सरियों को 239.35 लाख रुपये दिए गए, जिससे 11.97 लाख पौध तैयार हुईं। ये पौध 6,850 से 7,500 हेक्टेयर नए रोपण के लिए काफी हैं।

अगर आप नारियल की छूट कैसे लें?

अगर आप भी नारियल की खेती करना चाहते हैं तो नई खेती बढ़ाने के लिए प्रति हेक्टेयर 56,000 रुपये की सब्सिडी दो किस्तों में दी जाती है। अधिकतम 2 हेक्टेयर और न्यूनतम 0.08 हेक्टेयर तक। 2024-25 में 2,979 हेक्टेयर नया क्षेत्र जोड़ा गया और 13,068 किसानों को फायदा हुआ। 2025-26 में 2,175 हेक्टेयर नया क्षेत्र केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, गुजरात, असम और अरुणाचल प्रदेश में जोड़ा गया। इसके लिए 632.77 लाख रुपये दिए गए।

कितने किसानों को मिला छूट का लाभ?

उत्पादकता बढ़ाने के लिए कोकोनट-बेस्ड क्रॉपिंग सिस्टम चलाया जा रहा है। प्रति हेक्टेयर 42,000 रुपये की सब्सिडी दो किस्तों में मिलती है। 2025-26 में 18,800 हेक्टेयर कवर हुए, 48,696 किसानों को फायदा पहुंचा और 3,943 लाख रुपये खर्च हुए। राज्य सरकारों के साथ मिलकर अतिरिक्त 5,935 हेक्टेयर कवर हुए। केरल में अकेले 8,089 हेक्टेयर और 33,250 किसानों को लाभ पहुंचा। चालू साल में 22,430 हेक्टेयर पहुंचने का लक्ष्य रखा गया है। प्रति हेक्टेयर 54,000 रुपये तक दो साल में सहायता मिलती है। 2025-26 में 1,672 हेक्टेयर क्षेत्र को रिजूवेनेशन के दायरे में लाया गया।


भारत किस मिशन 2030 पर दे रहा है जोर?

भारत सरकार ने 2030 तक भारत को नारियल निर्यात में वैश्विक लीडर बनाने का लक्ष्य रखा है। फैंड ऑफ कोकोनट ट्री (FOCT) कार्यक्रम के तहत 2024-25 में 378 ताड़ चढ़ने वाले लोगों को ट्रेनिंग दी गई है। कोकोमित्र नाम से प्रशिक्षित चढ़ने वालों के समूह बनाए जा रहे हैं। केरा कौशल केंद्र नारियल शेल, लकड़ी और रेशे से हस्तशिल्प बनाने के लिए 15 सदस्यीय समूह बनाया जा रहा है। हर केंद्र को 2026-27 से 2.67 लाख रुपये की सहायता मिलेगी। नीरा टैपिंग और प्रोसेसिंग के लिए भी सरकार ट्रेनिंग दे रही है। 

दुनिया में क्यों बज रहा नारियल उत्पादन का डंका?

साल 2025-26 तक 8,299 और 31 जुलाई 2026 तक 8,700 नारियल निर्यातों ने रजिस्ट्रेशन कराया है। बीते 5 साल में निर्यात 3,236.83 करोड़ से बढ़कर 7,038.35 करोड़ रुपये हो गया। बोर्ड ने घरेलू और अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेलों में सैकड़ों उद्यमियों को पहुंचाने की कोशिश की। कौशल विकास के तहत 240 लोगों को प्रशिक्षण दिया गया। 15 नारियल काउंटर स्थापित किए गए। यूनियन बजट 2026-27 में नारियल प्रोमोशन स्कीम की घोषणा की गई। यह कीट, रोग और पुराने बागानों की जगह नए पौधा लगाने पर जोर दिया जा रहा है। अच्छी पौध उत्पादन, नए क्षेत्रों में विस्तार, पुराने बागानों का कायाकल्प, फसल स्वास्थ्य प्रबंधन और यूनिफाइड प्रोसेसिंग यूनिट बनाने पर सरकार जोर दे रही है।