बाजार में जब आप सामान खरीदने जाते हैं तो यह बात आसानी से देखने को मिलती है कि एक ही कंपनी के कई तरह के ऑप्शन सामने होते हैं। जैसे आटा सादा भी मिलता है और मल्टीग्रेन भी। बटर सादा भी आता है और गार्लिक फ्लेवर वाला भी। आधुनिक बिजनेस और मार्केट रिसर्च की दुनिया में इस स्ट्रेटजी को 'प्रोडक्ट लाइन एक्सटेंशन' कहा जाता है।
बड़े-बड़े ब्रांड्स और ई-कॉमर्स कंपनियां इस स्ट्रेटजी का इस्तेमाल ग्राहकों की बदलती पसंद को पूरा करने, बाजार में अपनी पकड़ मजबूत करने और अलग-अलग सेगमेंट के कंज्यूमर को लुभाने के लिए करती हैं। यह कोई इत्तेफाक नहीं होता बल्कि कंपनियों की एक गहरी और सोची-समझी बिजनेस स्ट्रेटजी होती है जिससे उन्हें कई तरह के व्यावसायिक फायदे मिलते हैं।
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कुछ जाने-माने ब्रांड्स
आईटीसी: यह कंपनी आशीर्वाद आटा को सेलेक्ट, शरबती और मल्टीग्रेन जैसे कई रूपों में बेचती है।
मैरिको: यह कंपनी सादा ओट्स के साथ-साथ मसाला ओट्स, मूसली और ग्रेनोला भी बनाती है।
ब्रिटानिया इंडस्ट्रीज: यह कंपनी गुड डे बिस्किट को बटर, काजू, चॉको चिप और फ्रूट एंड नट जैसे कई स्वादों में बेचती है।
अमूल: यह कंपनी सादा बटर के अलावा लाइट बटर, गार्लिक बटर और टेबल बटर भी बेचती है।
पारले प्रोडक्ट्स: इस कंपनी के हाइड एंड सीक बिस्किट के भी बाजार में कई अलग-अलग रूप मौजूद हैं।
कंपनियों को इससे क्या-क्या फायदे होते हैं?
हर बजट के इंसान को अपने साथ जोड़ना: अलग-अलग दाम होने से पचास रुपये खर्च करने वाला ग्राहक भी और दो सौ रुपये खर्च करने वाला ग्राहक भी दोनों कंपनी के पास ही रहते हैं। इस तरह कंपनी किसी भी ग्राहक को अपने हाथ से जाने नहीं देती।
सबकी अलग-अलग जरूरतें पूरी करना: किसी को मल्टीग्रेन चाहिए, किसी को ज्यादा प्रोटीन वाला सामान चाहिए, किसी को शुगर-फ्री चाहिए और किसी को ग्लूटेन-फ्री चाहिए। एक जैसे कई ऑप्शन देकर कंपनी हर तरह के इंसान की जरूरत पूरी कर देती है।
महंगे सामान से ज्यादा कमाई करना: साधारण सामान के मुकाबले महंगे और प्रीमियम सामान की कीमत भी ज्यादा होती है और फायदा भी ज्यादा मिलता है। कंपनी को उसे बनाने में उतना खर्च नहीं आता जितना वे उसकी अच्छी पैकिंग और बड़े नाम के नाम पर वसूल लेते हैं।
बाजार में दूसरों को जगह न देना: दुकान की अलमारी या शेल्फ पर जगह बहुत कम होती है। अगर एक ही कंपनी के चार-पांच अलग-अलग रूप वहां सज जाएं तो बाकी कंपनियों के सामान के लिए जगह ही नहीं बचती। इससे दूसरी कंपनियों के लिए ग्राहकों तक पहुंचना बहुत मुश्किल हो जाता है।
ग्राहक को अपने ही ब्रांड में रोके रखना: अगर किसी ग्राहक की कमाई बढ़ जाए और वह अच्छी चीज लेना चाहे तो वह दूसरे ब्रांड के पास न चला जाए। कंपनियां पहले से ही महंगे और अच्छे ऑप्शन तैयार रखती हैं।
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खरीदारी करते समय ग्राहक क्या समझें?
महंगा सामान कब खरीदना चाहिए: जब उस सामान में सच में कोई नया और अच्छा फायदा जुड़ा हो जैसे कोई बेहतर चीज मिली हो या सेहत के लिए कोई खास फायदा हो जो सादे वाले में न मिलता हो।
सादा सामान कब बेहतर रहता है: जब महंगे सामान में सिर्फ उसका डिब्बा या नाम बदला गया हो और अंदर का सामान बिल्कुल वही पुराना हो तब ज्यादा पैसे खर्च करने का कोई मतलब नहीं होता।
सामान का पीछे का लेबल क्यों पढ़ना चाहिए: हर महंगा सामान सच में अच्छा हो यह जरूरी नहीं है। कई बार सिर्फ बड़े नाम और चमक-धमक से लोगों को लुभाया जाता है। इसलिए खरीदने से पहले पीछे लिखी बातें जरूर पढ़नी चाहिए और खुद देखना चाहिए कि असल में क्या फर्क है।
