देशभर में महिलाओं के बैंक खातों में सीधे पैसे भेजने वाली योजनाएं अब आम हो गई हैं। यह ट्रेंड पिछले तीन-चार साल में पूरे देश में बहुत तेजी से फैला है। आज हालात यह हैं कि हर राज्य चुनाव से पहले महिलाओं को आर्थिक मदद देने का वादा कर रहा है, जिसका सीधा असर राज्यों के बजट और पैसों पर पड़ रहा है। पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च की रिपोर्ट बताती है कि महिलाओं को सीधे पैसे देने वाली इन योजनाओं का काम पिछले कुछ सालों में बहुत बढ़ गया है।
सिर्फ 3 साल पहले यानी साल 2022-23 तक देश के सिर्फ 2 राज्य ऐसी योजनाएं चला रहे थे। अब साल 2025-26 तक यह संख्या बढ़कर 12 राज्यों तक पहुंच गई है। अनुमान है कि साल 2025-26 में ये सभी 12 राज्य मिलकर इन योजनाओं पर करीब 1,68,000 करोड़ रुपये खर्च करेंगे। इस बढ़ोतरी में असम और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों ने पिछले साल के मुकाबले अपने बजट में काफी ज्यादा पैसे बढ़ाए हैं। असम ने अपने बजट में 31 प्रतिशत और पश्चिम बंगाल ने 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी की है।
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किस राज्य में मिल रही है कितनी रकम?
अलग-अलग राज्यों में महिलाओं के लिए चलाई जा रही इन योजनाओं का पूरा हिसाब इस प्रकार है। पश्चिम बंगाल में 'लक्ष्मी भंडार' योजना के तहत महिलाओं को सबसे ज्यादा 3,000 रुपये प्रति महीने मिलते हैं और इसके लिए सालाना बजट 36,000 करोड़ रुपये है। महाराष्ट्र में 'लाडकी बहीण' योजना के तहत हर महीने 1,500 रुपये दिए जाते हैं और इसका साल का बजट 26,000 से 36,000 करोड़ रुपये के बीच है। मध्य प्रदेश की 'लाडली बहना' योजना में 1,250 से 1,500 रुपये महीना मिलता है और इसका सालाना बजट 18,669 से 22,000 करोड़ रुपये है।
दिल्ली की लक्ष्मी योजना में 2,500 रुपये महीना दिया जाता है और इसके लिए 5,110 करोड़ रुपये का बजट रखा गया है। इसके अलावा ओडिशा में 'सुभद्रा' योजना के तहत 10,145 करोड़ रुपये का बड़ा बजट है, जिसमें महिलाओं को 5 साल में कुल 50,000 रुपये यानी साल के 10,000 रुपये 2 किस्तों में मिलते हैं। वहीं पंजाब, तमिलनाडु और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में ऐसी योजनाओं के तहत कम से कम 1,000 रुपये महीना देने का नियम है और इनका बजट हर राज्य का अलग-अलग है।
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राज्यों के बजट
राज्यों के कुल खर्च में इन सीधी योजनाओं का हिस्सा लगातार बढ़ रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक इन 12 राज्यों में से 6 राज्यों को घाटा रहने का अनुमान है। अगर इन योजनाओं का खर्च हटा दिया जाए तो कर्नाटक और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों के वित्तीय आंकड़े और भी अच्छे दिखाई देते हैं। सभी राज्य अपने टैक्स और दूसरे पैसों के जरिए यह इंतजाम करते हैं ताकि समय पर महिलाओं के खातों में पैसे भेजे जा सकें।
