ईरान के साथ अमेरिका का समझौता इजरायल को फूटी आंख भी पसंद नहीं आ रहा है। नेतन्याहू ने चुप्पी साध रखी है, लेकिन उनके मंत्री समझौते के खिलाफ मुखर हैं। शर्तों के मुताबिक लेबनान में युद्धविराम भी समझौते का हिस्सा है। गुरुवार की रात लेबनान पर भीषण बमबारी करके नेतन्याहू ने ट्रंप को साफ-साफ बता दिया  है कि उनका आखिरी इरादा क्या है? 

 

इजरायल किसी भी हाल में लेबनान से पीछे नहीं हटेगा, यह वहां बेंजामिन नेतन्याहू, सेना और मंत्री सब बता चुके हैं। इसके बदले भले ही उसे अमेरिका की नाराजगी झेलनी पड़े। टाइम्स ऑफ इजरायल की रिपोर्ट के मुताबिक लेबनान मुद्दे पर इजरायल अमेरिका के साथ कड़ी बातचीत कर रहा है।

 

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इस बीच इजरायल की सेना ने बताया कि दक्षिण लेबनान में उसके जवान सीमा से 10 किमी से अधिक गहराई तक घुस चुके हैं। लिटानी नदी के अधिकांश दक्षिणी हिस्से पर उसका कब्जा है। इजरायल किसी भी हाल में यहां अपना कब्जा खत्म नहीं करना चाहता है। उसका तर्क है कि इसी जमीन से हिजबुल्लाह उस पर ड्रोन और मिसाइल दागता है। अब वह यह जमीन किसी भी हाल में हिजबुल्लाह को नहीं सौंपेगा।

अमेरिका क्या चाहता है?

इजरायल ने अमेरिका को स्पष्ट बता दिया है कि उसका लेबनान से पीछे हटने का कोई इरादा नहीं है। हालांकि अमेरिका चाहता है कि इजरायल दक्षिणी लेबनान के कुछ हिस्सों से अपनी सेना को वापस बुला ले, क्योंकि अमेरिका नहीं चाहता है कि लेबनान मुद्दे की वजह से अस्थायी युद्धविराम खटाई में पड़े।

 

मगर इजरायल में धारणा अलग है। वहां अधिकांश लोगों का मानना है कि ईरान के खिलाफ उन उद्देश्यों को नहीं हासिल किया गया, जिनकी घोषणा जंग की शुरुआत में की गई थी। ट्रंप का यह समझौता इजरायल के अस्तित्व को खतरा पैदा करने वाला है। 

क्या वार्ता को बेपटरी कर देगा इजरायल?

समझौते के बाद इजरायल ने लेबनान में गुरुवार की रात भीषण बमबारी की। हिजबुल्लाह के 150 से अधिक ठिकानों को निशाना बनाया। 47 लोगों की जान ली। इजरायल के इन हमलों ने ट्रंप को नाराज कर दिया। एक वक्त ऐसा था जब ट्रंप नेतन्याहू की कसीदे पढ़ते थे। अब ट्रंप ने बेरूत पर इजरायली हमले को क्रूर और इजरायल की अति कहा। यह भी कहा कि नेतन्याहू को अधिक जिम्मेदार बनना होगा। 

 

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इजरायली विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका का समझौता ईरान को काबू में नहीं रखता है। यह समझौता तेहरान के सामने इनाम की तरह है। इससे उसकी न केवल ताकत बढ़ी है, बल्कि अमेरिका ने वैश्विक मंच पर ईरान को एक क्षेत्रीय शक्ति के तौर पर मान्यता भी दे दी है। 

 

इजरायल के मंत्री भी ट्रंप के समझौते से नाखुश हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतामार बेन-ग्वीर ने कहा, 'ट्रंप का समझौता हमें बाध्य नहीं करता। वहीं  वित्त मंत्री बेजलेल स्मोट्रिच ने समझौते को न केवल इजरायल बल्कि पूरी स्वतंत्र दुनिया के लिए बुरा बताया। हालांकि प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने चुप्पी साध रखी है। 

क्या इजरायल और अमेरिका में पड़ रही दरार?

जंग के बाद पहली बार इजरायल और अमेरिका के संबंधों में फूट पड़ती दिख रही है। कम से कम ट्रंप के बयान से यही साबित होता है। कुछ दिनों पहले तक ट्रंप इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को साझेदार मानते हैं। अब नेतन्याहू समस्या के रूप में उभरे हैं।

 

अमेरिका अब चाहता है कि नेतन्याहू ने पूरे मध्य पूर्व में जो रायता फैलाया है, उसको समेटन का समय आ गया है। यही वजह है कि ट्रंप सार्वजनिक मंचों से नेतन्याहू की आलोचना करने लगे हैं।

ट्रंप गिनाने लगे अहसान

डोनाल्ड ट्रंप दुनिया को यह बताने में जुटे हैं कि अगर वह नहीं होते तो इजरायल का अस्तित्व नहीं बचता। अहसान भी जता रहे हैं कि जो हमने कर दिया है, वह कोई और राष्ट्रपति करने को तैयार नहीं था।

 

सीबीएस न्यूज के मुताबिक ट्रंप ने कहा, 'अमेरिका के बिना इजराइल का अस्तित्व नहीं होता। मेरे बिना भी इजराइल का अस्तित्व नहीं होता, क्योंकि कोई भी अन्य राष्ट्रपति वह करने को तैयार नहीं था, जो मैंने किया।'

 

एक अन्य बयान में ट्रंप ने कहा, 'अगर ईरान के पास परमाणु हथियार होता तो इजरायल दो घंटे भी अस्तित्व में नहीं रहता। ईरान समझौते के लिए इजरायली नेता को आभारी होना चाहिए।'

क्या लेबनान बनेगा संघर्ष का नया केंद्र?

ईरान के विदेश मंत्रालय ने समझौता करने के तुरंत बंद एक चेतावनी दी। इसमें कहा कि अगर इजरायल की सेना दक्षिणी लेबनान में बनी रहती है तो अमेरिका के साथ उसका समझौता रद्द माना जाएगा। ईरान ने यह भी स्पष्ट किया है कि लेबनान पर इजरायल के हमले को समझौते का उल्लंघन करार दिया जाएगा। 

 

लेबनान में अपने भाइयों को छोड़ना हमें मंजूर नहीं है। लेबनान के कुछ हिस्से जब तक जायोनी शासन के कब्जे में है तब तक युद्ध खत्म करने की बात नहीं की जा सकती है। जब तक कब्जा रहेगा तब तक यह कहा जा सकता है कि युद्ध अभी जारी है। - ईरानी विदेश मंत्रालय 

 

किस मांग पर अड़ा ईरान?

लेबनान से इजरायली सैनिकों की वापसी पर ईरान अड़ चुका है। उसका कहना है कि 60 दिनों के समझौते के बाद अंतिम समझौते पर बातचीत तभी होगी जब इजरायल अपने कदम पीछे खींचेगा। यही वजह है कि शुक्रवार को स्विट्जरलैंड में होने वाली बैठक अचानक रद्द कर दी गई। ईरान ने कहा, 'अंतिम समझौते तक पहुंचने के लिए हमारी बातचीत का दूसरा चरण तभी शुरू होगा जब समझौता ज्ञापन को पूरी तरह से लागू किया जाएगा। मेरे हिसाब से मतलब यह है कि हमलों और कब्जे को पूरी तरह से खत्म करना होगा।'