लाल सागर में यमन के हूती विद्रोहियों की मजबूत होती पकड़ से सऊदी अरब की शासन व्यवस्था में अफरा-तफरी का माहौल है। सऊदी अरब के क्राऊन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) ने गुरुवार को दो बार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से फोन पर बात की। बाब-अल-मंडेब की तरफ बढ़ते हूती विद्रोहियों पर हमला करने का आग्रह किया है। हालांकि ट्रंप ने दखल देने से मना कर दिया। न्यूज वेबसाइट एक्सियोस ने दो अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से अपनी रिपोर्ट में यह खुलासा किया।
एक्सियोस की रिपोर्ट के मुताबिक एमबीएस ने ट्रंप को पहला फोन उस वक्त मिलाया जब हूती विद्रोही मोखा की तरफ बढ़े थे। उन्होंने यमन में बिगड़ते हालात की जानकारी दी। कुछ ही घंटों बाद एमबीएस को दोबारा फोन मिलाना पड़ गया। अबकी बार एमबीएस ने ट्रंप से हूती विद्रोहियों के खिलाफ सीधे सैन्य मदद मांगी। रिपोर्ट में बताया गया कि ट्रंप ने सीधे सैन्य हस्तक्षेप से इनकार कर दिया।
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अमेरिका ने अप्रत्यक्ष सहयोग बढ़ाया
अमेरिका अप्रत्यक्ष तौर पर सऊदी अरब को अपना समर्थन देने पर सहमत हुआ। गुरुवार को ही अमेरिकी सेंट्रल कमांड के कमांडर एडमिरल ब्रैड कूपर सऊदी अरब पहुंचे। यहां समन्वय बैठक में हिस्सा लिया। अमेरिका अधिकारियों ने बताया कि अमेरिका हूती विद्रोहियों के खिलाफ खुफिया और लक्ष्यों की जानकारी से जुड़ा डेटा रियाद के साथ शेयर करता रहेगा। 200 अमेरिकी सैन्यकर्मी पहले से ही वहां मौजूद हैं।
हूतियों से क्यों बच रहा अमेरिका?
अमेरिका हूती विद्रोहियों से सीधे भिड़ने के मूड में नहीं है। रिपोर्ट में कहा गया कि अमेरिकी अधिकारियों ने हाल ही में सऊदी अरब को बता दिया कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और ईरान पर अपना फोकस रखना चाहते हैं। वे नहीं चाहते हैं कि युद्ध का एक और मोर्चा खोला जाए।
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सऊदी को क्यों मांगनी पड़ी सैन्य सहायता?
जुलाई में अमेरिका ने सऊदी अरब को हूती विद्रोहियों के खिलाफ सैन्य मदद की पेशकश की थी। लेकिन उस वक्त रियाद ने यह कहते हुए मना कर दिया था कि वह हूती विद्रोहियों से खुद निपट सकता है। अब लाल सागर से सटे यमन के पूरे तट और बाब अल-मंडेब के अहम द्वीपों पर कब्जे के बाद से सऊदी अरब में पैनिक है। आनन-फानन एबीएस को अमेरिका से सैन्य सहायता मांगनी पड़ी।
