अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एलान किया है कि ईरान के साथ शांति वार्ता अपने अंतिम दौर में है। हैरान करने वाली बात यह है कि शांति की बात कहकर डोनाल्ड ट्रंप ने युद्ध का राग भी छेड़ दिया है। उन्होंने फिर दोहराया है कि अगर ईरान अमेरिका के साथ अंतिम परमाणु समझौता नहीं करेगा तो तेहरान उनके निशाने पर होगा, अमेरिकी सेना शांति वार्ता तोड़ेगी और हमले शुरू हो जाएंगे।
डोनाल्ड ट्रंप ने यह भी कहा है कि हमले के बदले में अमेरिका, मध्य पूर्व का 'गार्जियन' बनेगा और क्षेत्र की 20 फीसदी कमाई, 'डकार' जाएगा। डोनाल्ड ट्रंप हर इंटरव्यू में और सोशल मीडिया पोस्ट में शांति और युद्ध की बात एक साथ कर रहे हैं। ट्रंप को यकीन है कि साल 2026 का यह समझौता, 2015 के उस समझौते से बेहतर है, जिसमें ईरान ने बराक ओबामा से परमाणु हथियार न बनाने का वादा किया है।
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डोनाल्ड ट्रंप किस समझौते पर जोर दे रहे हैं?
- न परमाणु हथियार बनाएगा, न खरीदेगा
- स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर ईरान कोई टैक्स नहीं लेगा
- संवर्धित यूरेनियम अमेरिका को सौंपेगा
अमेरिका-ईरान के पास परमाणु बम, ईरान के पास क्यों नहीं?
अमेरिका के पास घोषित तौर पर परमाणु बम है। इजरायल के पास परमाणु हथियार हैं, इसका न तो खंडन किया गया है, न ही इसे माना गया है। इजरायल को ईरान के परमाणु कार्यक्रम से फिर भी दिक्कत है, जबकि ईरान ने बार-बार कहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम, शांतिपूर्ण इस्तेमाल के लिए है, न ही तबाही के लिए। परमाणु हथियारों के शक में ईरान पर बार-बार हमले करता रहा है। जून 13 जून 2025 को अचानक इजरायल ने ईरान पर हमला बोल दिया। 24 दिनों तक यह जंग चली, इजरायल ने नतान्ज परमाणु साइट पर हमला बोल दिया था।
28 फरवरी 2026 को एक बार फिर अमेरिका और इजरायल ने मिलकर धावा बोल दिया। ईरान का पूरा शीर्ष नेतृत्व खत्म हुआ, आयतुल्ला अली खामेनेई मारे गए, मोजतबा खामेनेई घायल हैं, इस्लामिक रिवल्यूशनरी गॉर्ड्स कॉर्प्स (IRGC) की पूरी टॉप लीडरशिप बदल चुकी है। यह सब सिर्फ इसलिए शुरू हुआ कि ईरान परमाणु हथियार न बना सके।
परमाणु हथियारों को खत्म करने की कवायद क्यों?
हिरोशिमा और नागासाकी, जापान के दो शहरों में अमेरिका ने ऐसा आतंक मचाया था, जिसे दुनिया आजतक नहीं भूल पाई है। परमाणु हथियारों को खत्म करने की कवायद भी यहीं से शुरू हुई। ताकतवर देश चाहते थे कि छोटे राष्ट्र, अपने परमाणु हथियार रद्द करें। 24 जनवरी 1946 को संयुक्त राष्ट्र महासभा का पहला प्रस्ताव अपनाया गया, जिसमें परमाणु हथियारों के पूर्ण उन्मूलन की मांग की गई और एटमिक एनर्जी कमीशन (AEC) का गठन किया गया। उम्मीद थी कि एक ऐसा बंधन हो कि कोई देश, परमाणु हमला न कर सके।
निखिल गुप्ता, इंटरनेशनल लॉ पढ़ाते हैं और वह दीवान लॉ कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। उन्होंने कहा, 'अमेरिका ने साल 1946 में बारूक प्लान के तहत संयुक्त राष्ट्र के सामने प्रस्ताव रखा कि दुनिया के सभी परमाणु हथियार और तकनीक का नियंत्रण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक संस्था के अधीन हो। तब सोवियत संघ (USSR) ने अमेरिका की यह चालाकी भांप ली थी कि यह देश, किसी भी देश को दगा दे सकता है, जापान हमले को अमेरिका ने सबक की तरह लिया। यह योजना, धरी की धरी रह गई क्योंकि दुनिया तब भी अमेरिका के रुख से अनिश्चित ही थी।'
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कैसे परमाणु हथियारों के खिलाफ आम जनता हुई?
साल 1950 के दशक में परमाणु हथियारों के खिलाफ सबसे ज्यादा आक्रोश पैदा हुआ। अमेरका और सोवियत संघ का शीत युद्ध खत्म नहीं हुआ था। दोनों देशों ने चुपके-चुपके हाइड्रोजन बम तैयार कराया। दोनों ने एलान किया। 1955 तक, मशहूर वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन और दार्शनिक बर्ट्रेंड रसेल ने एक घोषणापत्र जारी किया। उन्होंने दुनिया के नेताओं से परमाणु हथियारों को खत्म करने की अपील की। साल 1958 तक यह जन आंदोलन बन गया था।
साल 1960 तक, दुनिया क्यूबा संकट के मुहाने पर खड़ी हो गई। शीतयुद्ध ऐसा था कि क्यूबा में अमेरिकी सीमा से सिर्फ 150 किलोमीटर दूर, रूस ने परमाणु मिसाइलों का जखीरा बिछा दिया था। अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ कैनिडी को भनक तक नहीं लगी। रूस कम्युनिस्ट पार्टी के सुप्रीम लीडर निकिता ख्रुश्चेव और क्यूबा के नेता फिदे कास्त्रो की जोड़ी, अमेरिका को ऐसा जख्म देने वाली थी, जिसे वह कभी भूल नहीं पाते। अंतराष्ट्रीय स्तर पर कवायदें हुईं, किसी तरह संभावित सैन्य टकराव खत्म हुआ। दुनिया एक और परमाणु तबाही देखने से बच गई। रूस ने अपने हथियार तो हटा लिए लेकिन अमेरिका से वादा लिया कि क्यूबा को तबाह नहीं किया जाएगा।
क्यूबा संकट के बाद क्या बदला?
पार्शियल टेस्ट बैन ट्रिटी 1963 अस्तित्व में आई। तय हुआ कि जमीन के ऊपर, अंतरिक्ष में और पानी के भीतर परमाणु परीक्षण नहीं किए जा सकेंगे। साल 1968 तक दुनिया परमाणु अप्रसार संधि (NPT) के बारे में जान गई थी। यह इतिहास की सबसे बड़ी संधि है, जिसका मकसद, परमाणु हथियारों को रोकना और उन्हें पूरी तरह खत्म कर देना है। साल 1980 से 90 के दशक तक, जब शीतयुद्ध का अंत हुआ तो इस संधि पर दुनिया के दो सबसे ताकवर देशों ने हस्ताक्षर किए।
रूस और अमेरिका पहली बार एक मंच पर आए। अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन और सोवियत नेता मिखाइल गोर्बाचेव ने 8 दिसंबर 1987 को इंडटमीडिए रेंज न्यूक्लियर फोर्सेज (INF) पर हस्ताक्षर किए। 1991 में एक और संधि हुई। स्ट्रेटेजिक आर्म्स रिडक्शन ट्रिटी। 31 जुलाई, 1991 को दोनों नेताओं ने इस पर हस्ताक्षर किए। साल 1994 तक यह लागू हुआ। दोनों देशों ने परमाणु क्षमता कम करने की कवायद की। दोनों की गंभीरता कितनी थी, आज भी संदेह के घेरे में है।
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अमेरिका के पास परमाणु हथियार, दूसरे रखें तो दिक्कत क्यों?
परमाणु हथियार बनाने पर 5 देशों का एकाधिकार है। अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन। ये देश, कभी नहीं चाहते कि दुनिया के दूसरे देश, परमाणु हथियार बनाएं। 5 मार्च 1970 को इस संधि पर सदस्य देशों ने हस्ताक्षर किए। मार्च 1970 में लागू हुई यह संधि परमाणु हथियारों के फैलाव को रोकने के लिए बनी थी। इसमें 190 देश शामिल हैं। संधि में दो तरह के देश हैं। पहले परमाणु हथियार वाले 5 देश। दूसरे बाकी गैर-परमाणु हथियार वाले देश। इनकी कुछ शर्तें ऐसी हैं, जिन्हें एक बड़ा हिस्सा, भेदभावपूर्ण बताता है-
- परमाणु हथियारों के प्रसार पर पूरी तरह से रोक
- निरस्त्रीकरण की दिशा में सभी देश आगे बढें
- केवल शांतिपूर्ण काम के लिए परमाणु तकनीक मुहैया हो
- गैर परमाणु देश, परमाणु हथियार बनाने की कोशिश न करें
- परमाणु देश अपनी परमाणु क्षमता कम करें
आलोचना क्या है?
प्रोफेसर निखिल गुप्ता बताते हैं, 'जिन देशों के पास परमाणु हथियार हैं, वे अपना परमाणु हथियार सीमित नहीं करते लेकिन ऐसे देश जो परमाणु हथियार बनाते हैं उन पर कभी जंग थोपते हैं, कभी प्रतिबंध। दुनिया उत्तर कोरिया और ईरान का हश्र देख रही है। अमेरिका तय करता है कि कौन हथियार रखेगा, कौन नहीं। इजरायल परमाणु नीति तय करने वाले 5 देशों में शामिल नहीं है, फिर भी ईरान पर आत्मरक्षा का तर्क देकर हमला कर देता है, जबकि ईरान, शांतिपूर्ण मकसदों के लिए यूरेनियम संवर्धन कर रहा था। इसमें ताकवर देशों की तानाशाही चलती है, छोटे देश पिसते हैं। चीन और फ्रांस ने इस संधि का अरसे तक विरोध किया लेकिन साल 1992 तक, दोनों देश इस संधि का हिस्सा बन गए। अमेरिका और रूस दोनों दावा करते हैं कि उन्होंने अपने परमाणु हथियार घटाए हैं लेकिन ऐसा हुआ नहीं है।'
भारत इस रेस में कहा खड़ा है?
भारत परमाणु शक्ति संपन्न देश है। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) की रिपोर्ट बताती है कि भारत दुनिया का 6वां सबसे ताकवर परमाणु शक्ति संपन्न देश है। भारत के परमाणु परीक्षण पर भी अमेरिका और दुनिया के विकसित देशों को उतना ही ऐतराज था, जितना ईरान से है। 1974 में भारत ने परमाणु परीक्षण किया, जिससे दुनिया चौंक गई।
भारत ने 18 मई 1974 को भूमिगत परमाणु परीक्षण किया था। पोखरण में हुए इस परीक्षण के बारे में दुनिया को खबर तक नहीं हुई। भारत इकलौता ऐसा देश था जो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) का स्थाई सदस्य नहीं था लेकिन परमाणु परीक्षण किया।
भारत यहीं नहीं रुका। 1974 के 'स्माइलिंग बुद्धा' से आगे बढ़कर भारत ने अपनी परमाणु क्षमताओं को और विकसित किया। 11 मई और 13 मई को 1998 में पोखरण में भारत ने एक और सफल भूमिगत परीक्षण किया। भारत ने खुद को परमाणु शक्ति संपन्न देश घोषित किया। अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने भारत पर कई कड़े प्रतिबंध लगाए। विदेशी मदद रोकी, सैन्य सौदों पर प्रतिबंध लगाए, कर्ज तक रोका गया। भारत की अर्थव्यवस्था को तबाह करने की पूरी कोशिश की गई लेकिनन भारत ने अपना रुख नहीं बदला। भारत पर लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों की वजह से खुद अमेरिका का नुकसान होने लगा। अक्तूबर 2001 तक, अमेरिका ने सारे प्रतिबंध हटा लिए थे।
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जिन देशों ने परमाणु हथियार छोड़ा, उनका क्या हुआ? देशों के हाल से समझिए
दक्षिण अफ्रीका, हथियार तबाह किए, हासिल ज्यादा हुआ
द न्यूक्लियर थ्रेट इनीशिएटिव (NTI) की रिपोर्ट बताती है कि दक्षिण अफ्रीका ने अपने दम पर परमाणु हथियारों को विकसित किया था। ये बम 50-60 किलोग्राम से ज्यादा संवर्धित यूरेनियम से बने थे और इनकी विस्फोटक क्षमता 10 से 18 किलोटन के बीच थी। 1989 में सरकार ने इस पूरे परमाणु कार्यक्रम को रोक दिया। 1990 में राष्ट्रपति फ्रेडरिक विलेम डी क्लर्क के आदेश पर सभी 6 तैयार बमों और एक अधूरे डिवाइस को नष्ट कर दिया गया। 1993 में राष्ट्रपति डी क्लर्क ने संसद में इस कार्यक्रम के बारे में सार्वजनिक रूप से बताया और कहा कि दक्षिण अफ्रीका ने परमाणु हथियार बनाने का रास्ता हमेशा के लिए छोड़ दिया है। परमाणु निरीक्षण और वर्तमान स्थितिअंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) ने 1993 में जांच की और पुष्टि की कि दक्षिण अफ्रीका ने अपने सभी परमाणु हथियार और उत्पादन उपकरण पूरी तरह नष्ट कर दिए हैं। देश के पास अभी भी नागरिक उपयोग के लिए HEU है, जो IAEA की सुरक्षा व्यवस्था के अधीन है। दक्षिण अफ्रीका 1991 में नॉन-प्रोलिफरेशन ट्रीटी (NPT) में शामिल हुआ और खुद को नॉन-न्यूक्लियर वेपन स्टेट घोषित किया।
असर क्या हुआ?
कंप्रिहेंसिव न्यूक्लियर टेस्ट बैन ट्रिटी (CTBT) और ट्रिटी ऑन प्रोहिबिशन ऑफ न्यूक्लियर वेपन (TPNW) जैसी संधियों पर हस्ताक्षर किए हैं। दक्षिण अफ्रीका चाहता है कि पूरी दुनिया परमाणु हथियारों से मुक्त हो। दक्षिण अफ्रीका में तब श्वेत अल्पसंख्यकों जिन्हें अपारथाइड कहते थे, उनकी सरकार थी। उनकी नीतियां भेदभाव और अलगावपूर्ण थीं। 1978 में सोवियत संघ के डर की वजह से अपने परमाणु कार्यक्रमों को शुरू किया लेकिन बाद में अंगोला से क्यूबा की सेना का पलायन हुआ, नमीबिया जैसी जगहें आजाद हुईं और सोवियत संघ कमजोर पड़ गया। अमेरिकी देशों ने प्रतिबंध लगाए थे। परमाणु हथियार रखने से ज्यादा दक्षिण अफ्रीका को राहत, न रखने में मिली। अब NPT में नॉन-न्यूक्लियर स्टेट के रूप में शामिल हुआ। सोने, हीरे, प्लेटिनम की खान के तौर पर मशहूर यह देश, अब तमाम आर्थिक असमानताओं के बाद भी प्रगति कर रहा है। अमेरिका, चीन से लेकर भारत तक, निवेश कर रहा है।
बेलारूस, परमाणु हथियार छोड़ने का सिला क्या मिला?
26 दिसंबर 1991 को USSR का विघटन हुआ। अविभाजित रूस, अब 15 अलग-अलग स्वतंत्र देशों में बंट गया। बेलारूस के पास खुद का हथियार नहीं था। हथियार विरासत में मिले थे और इसे तैयार करने वाला देश रूस था। बेलारूल ने तय किया कि 1996 तक सारे हथियारों को रूस को सौंप देगा। बेलारूस, दुनिया का आठवां परमाणु भंडार वाला देश था। बेलारूस चाहता था कि उसकी छवि एक ऐसे देश की बने जो संप्रभु हो लेकिन प्रतिबंधों से मुक्त हो। Congress.Gov की रिपोर्ट बताती है कि रूस अपने परमाणु हथियरों के रखरखाव पर $8.1 अरब डॉलर रुपये खर्च करता है। बेलारूस के लिए यह बोझ उठा पाना मुश्किल था।
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परमाणु हथियार छोड़ने से क्या मिला?
अमेरिका, ब्रिटेन और रूस जैसी महाशक्तियों ने उसकी संप्रभुता को मान्यता दी। सीमित सीमाओं के सम्मान का वादा किया और सुरक्षा गारंटी दी। अंतराष्ट्रीय स्तर पर इन देशों ने बेलारूस की मदद की। 5 दिसंबर 1994 को बुडापेस्ट मेमोरेंडम के तहत अमेरिका, ब्रिटेन और रूस ने बेलारूस को यह भरोसा दिया कि उसकी सीमाओं पर हमले नहीं होंगे। वह NPT संधि का हिस्सा गैर परमाणु राज्य के तौर पर बना। रूस और बेलारूस बेहद करीब हैं, यह देश, रूस का सहयोगी है, यूरोप के कड़े प्रतिबंध झेल रहा है। रूस के साथ बेलारूस 'यूनियन स्टेट' समझौता है।
कजाकिस्तान ने हथियार क्यों छोड़े?
USSR के विघटन से जो 15 देश बने थे, उनमें कजाकिस्तान भी एक देश था। तब कजाकिस्तान के पास 1410 से ज्यादा परमाणु हथियार थे। अप्रैल 1995 तक, कजाकिस्तान ने सारे परमणु हथियार रूस को सौंप दिए थे। रूस और चीन जैसे देशों को यह मंजूर नहीं था कि कजाकिस्तान परमाणु हथियार रखे। कजाकिस्तान भी NPT का हिस्सा बना और खुद को एक गैर परमाणु शक्ति राज्य के तौर पर मान्यता दी। कजाकिस्तान इस बात से वाकिफ था कि परमाणु हथियार रखने का खामियाजा उसे भुगतना पड़ेगा। रूस ने सेमिपालाटिंस्क टेस्ट साइट या 'द पॉलीगॉन' पर 450 से ज्यादा परमाणु परीक्षण किए थे। काजाकिस्तान इसे और बढ़ाना नहीं चाहता था।
कजाकिस्तान को क्या मिला?
साल 1994 में हुए बुडाबेस्ट मेमोरेंडम के तहत रूस, अमेरिका और ब्रिटेन ने वादा किया कि इस देश पर हमले नहीं किए जाएंगे। क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान होगा। वित्तीय मदद की जाएगी। कजाकिस्तान को भारी कर्ज मिला। कजाकिस्तान उत्तर में रूस से घिरा है, पूरब में चीन से, दक्षिण में किर्गिजस्तान, उज्बेकिस्तान और तुर्केनिस्तान से घिरा है, पशिम में कैस्पियन सागर है। इस भौगोलिक सीमाओं के दायरे में उसके पास परमाणु हथियार छोड़ने से बेहतर रास्ता कुछ भी नहीं था।
यूक्रेन ने क्यों परमाणु हथियार छोड़े, बदले में क्या मिला?
बेलारूस और कजाकिस्तान ने जिस वजह से अपने परमाणु हथियार रूस को सौंपे, वही वजह यूक्रेन के साथ भी रही। साल 1994 में जब यूक्रेन 'बुडापेस्ट मेमोरेंडम' पर हस्ताक्षर कर रहा था तो उसे रत्ती भर भी आशंका नहीं थी कि रूस उसे 24 फरवरी 2022 को तबाह करने की कसम लेगा और इस हद तक तबाह कर देगा कि उसे उभरने में दशक लग जाएंगे।
साल 1991 में सोवियत संघ से यूक्रेन भी अलग हुआ था। यूक्रेन के पास 1900 परमाणु हथियार थे, यह देश, दुनिया की तीसरा सबसे ताकतवर परमाणु शक्ति संपन्न देश था। यह देश, भारत से कहीं ज्यादा परमाणु क्षमता में ताकतवर देश था। बस एक कमी यह थी कि इन हथियारों का सोर्स कोड, यूक्रेन के पास कभी था ही नहीं। यूक्रेन के लिए ये खाली पड़े डब्बे से ज्यादा नहीं थे। यूक्रेन न तो इनके रख-रखाव पर $8.1 अरब डॉलर खर्च कर सकता था, न ही उसकी हैसियत थी।
यूक्रेन को बदले में क्या मिला?
यूक्रेन भी चाहता था कि उसकी गिनती यूरोपीय देशों में हो, वहां की आर्थिक छूट का लाभ मिले और व्यापारिक तौर पर मजबूत हो जाए। यूक्रेन ने हथियार त्यागे तो अमेरिका, ब्रिटेन और रूस ने उसकी संप्रभुता की लिखित गारंटी भी थी। अमेरिका, ब्रिटेन और इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड (IMF) ने यूक्रेन को सिस्टमैटिक ट्रांसफॉर्मेशन फैसिलिटी (STF) के तहत लगभग 763.1 मिलियन अमेरिकी डॉलर का कर्ज भी दिया। 1995 तक, इन देशों की हालत देखकर दक्षिण अफ्रीका भी परमाणु हथियार छोड़ने के लिए तैयार हो गया। |
यूक्रेन कुछ दशक तक आर्थिक प्रगति के शीर्ष पर पहुंचा लेकिन नॉर्थ अटलांटिक ट्रिटी ऑर्गेनाइजेशन (NATO) में शामिल होने की जिद ने तबाह कर दिया। यूक्रेन के डोनेट्स्क और लुहान्स्क में रूसी भाषियों की एक बड़ी आबादी रहती है। क्रीमिया में भी रूस के समर्थक थे। रूस का आरोप था कि यहां यूक्रेन दमन कर रहा है। 2014 में भी रूस ने कुछ इलाकों में कब्जे की कोशिशें की, नियंत्रण स्थापित किया। यूक्रेन का पश्चिमी देशों की ओर झुकाव, यूक्रेन को तबाह कर बैठा।
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बुडापेस्ट समझौता क्या है?
प्रोफेसर निखिल गुप्ता:-
दिसंबर 1994 में हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट में एक समझौता हुआ। तीन पूर्व-सोवियत गणराज्य, यूक्रेन, बेलारूस और कजाकिस्तान ने अपने सभी परमाणु हथियार रूस को सौंपने का वादा किया। बदले में दुनिया की तीन परमाणु शक्तियों, अमेरिका, ब्रिटेन और रूस ने इन तीनों देशों को एक लिखित सुरक्षा गारंटी दी थी, जिसके तहत उन्होंने इन देशों की स्वतंत्रता, संप्रभुता और मौजूदा भौगोलिक सीमाओं का सम्मान करने का वादा किया गया। उन पर हमला न करने, आर्थिक दबाव न बनाने का वादा किया गया था।
रूस ने समझौते की धज्जियां उड़ा दीं। यूक्रेन की तबाही, रूस ने ही लिखी, समझौते के बाद भी।
उत्तर कोरिया, प्रतिबंधों के साए में भी जिस देश ने हथियार बनाए
उत्तर कोरिया ने 2003 में NPT संधि से किनारा कर लिया और परमाणु हथियार बनाए। तब उत्तर कोरिया की कमान किम जोंग उन के पिता किम जोंग इल गद्दी पर बैठे थे। वह किम इल सुंग के बेटे थे और चाहते थे कि अमेरिका, दक्षिण कोरिया और जापान जैसे देश उन्हें आंख न दिखा सकें। वह साल 2011 तक शासक रहे और अमेरिका की आंखों की किरकिरी बने रहे। अमेरिका की धमकियां, आर्थिक प्रतिबंध उन पर बेअसर रहे, वह एक के बाद एक परमाणु परीक्षण करते गए, आर्थिक प्रतिबंध झेलते रहे। किम जोंग जब-तब परमाणु परीक्षण करते रहते हैं, परमाणु मिसाइलें बनाते हैं, दुनिया देखती है, खीझती है, कर कुछ नहीं पाती है। दुनिया को अपनी जेब में रखने का दावा करने वाले डोनाल्ड ट्रंप भी किम जोंग से बात करना चाहते हैं, उनके परमाणु कार्यक्रमों को रोकने की हिमाकत के बारे में सोचते भी नहीं हैं।
क्यों कुछ बिगाड़ नहीं पाता है अमेरिका या दुनिया?
उत्तर कोरिया, वैश्विक तौर पर सबसे उपेक्षित राष्ट्र है। वैश्विक बैंकिंग प्रणाली से बाहर है। कोयला, खनिज, हथियार और वहां के सी फूड तक को कोई देश खरीद नहीं सकता है। साल 2006 में ही यह देश परमाणु शक्ति संपन्न देश बन गया था। दक्षिण कोरिया, जापान और अमेरिका चिंता तो करते हैं लेकिन हिम्मत नहीं कर पाते हैं कि यहां हमला बोलें। अगर किसी ने हमला बोला तो तबाही को न्योता देना होगा। किम जोंग उन किसी की परवाह नहीं करते, किसी की सुनते नहीं। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से उनकी दोस्ती है।
उत्तर कोरिया चीन और रूस के 'बफर जोन' के तौर पर काम करता है। रूस को यूक्रेन के खिलाफ सैन्य मदद भी चोरी-छिपे दे चुका है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में ये दोनों वीटो-पावर देश अमेरिका को उत्तर कोरिया के खिलाफ कोई भी निर्णायक या दंडात्मक कदम उठाने नहीं देते। उत्तर कोरिया पर आर्थिक प्रतिबंधों का दबाव शून्य है।
ईरान को ऐसी सजा क्यों मिली?
ईरान पर हमेशा आरोप लगते थे कि यह देश चोरी-छिपे परमाणु हथियार बना रहा है। जुलाई 2015 में अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, चीन और जर्मनी के साथ ईरान का जॉइंट कंप्रिहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन (JCPOA) हुआ, जिसका मकसद ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकना था। मकसद था ईरान परमाणु कार्यक्रम पर कड़े प्रतिबंधों का एलान करना, जिससे यह देश परमाणु हथियार न बना सके।
ईरान पर शर्तें थोपी गईं कि अपने संवर्धित यूरेनियम को ईरान 3 प्रतिशत तक सीमित करे, जिसका मकसद बिजली या शांतिपूर्ण कामों के लिए ही हो। ईरान को निर्देश मिले कि अपने सेंट्रीफ्यूज यानी यूरेनियम साफ करने वाली मशीनें की संख्या कम कर दे। इंटरनेशन एटमिक एनर्जी एजेंसी (IAEA) इनकी निगरानी करे।
ईरान को क्या मिला?
अमेरिका, यूरोपीय संघ (EU) और संयुक्त राष्ट्र (UN) ने ईरान पर लगे व्यापार, बैंकिंग और अर्थव्यवस्था से जुड़े बेहद कड़े प्रतिबंध हटाए। ईरान को वैश्विक बाजार में लौटने का मौका मिला। साल 1980 के बाद ईरान ने यूरेनियम संवर्धन तेज कर दिया था। इस्लामिक क्रांति के बाद ईरान को लेकर दुनिया के ज्यादातर देशों को अविश्वास हुआ, साल 2002 में ईरान के गुप्त परमाणु कार्यक्रमों की जानकारी पूरी दुनिया को हुई। यह संकट बढ़ा, इजरायल हमेशा आशंकित रहा कि अगर परमाणु क्षमता से संपन्न देश, उसके आसपास है तो उसकी तबाही तय है।
यह समझौता कैसे टूटा?
मई 2018 में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका को इस समझौते से बाहर कर दिया। उन्हें ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्ला अली खामेनेई से दिक्कत थी। उनका कहना था कि यह समझौता कमजोर है, ईरान के मिसाइल कार्यक्रम पर रोक नहीं लगी, ईरान पर कड़े प्रतिबंध थोपे, ईरान ने भी समझौते की शर्तें माननी बंद कर दी। ईरान ने 60 से 70 प्रतिशत तक यूरेनियम संवर्धन कर लिया। ईरान परमाणु हथियार बनाने के बेहद करीब पहुंच गया।
अब किस हाल में है ईरान का परमाणु कार्यक्रम?
ईरान पर दुनिया के दो सबसे ताकतवर देशों ने परमाणु हमला किया है, इजरायल और अमेरिका। साल 2025 में भी ईरान ने अपने दो यूरेनियम संवर्धन केद्र, इसफहान और नतान्ज पर हमले झेले। ईरान करीब 60 फीसदी पर यूरेनियम संवर्धित कर चुका था, परमाणु बम बनाने से कुछ कदम दूर था। 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल दोनों ने मिलकर हमला कर दिया। महीनों की जंग के बाद अब ऐसा लग रहा है कि इस संकट का हल निकलेगा। ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम रोकेगा। IAEA की शर्तों को ईरान कितना मानता है, यह अभी अनिश्चितता के घेरे में है।
NPT को कितना मान रहे हैं दुनिया के देश?
असिस्टेंट प्रोफेसर निखिल गुप्ता बताते हैं, 'साल 2022 में NPT की 10वीं समीक्षा बैठक हुई। रूस और यूक्रेन जंग लड़ रहे हैं, नई बैठक अनिश्चित है। 2021 में परमाणु हथियारों पर प्रतिबंध से जुड़ी एक नई संधि 'ट्रिटी ऑन द प्रोहिबिशन ऑफ न्यूक्लियर वेपन' लागू हुआ। यह परमाणु हथियारों के पूर्ण प्रतिबंध की बात करता है। 7 जुलाई 2017 को संयुक्त राष्ट्र में इसे अपनाया गया, 22 जनवरी 2021 को लागू हुआ। यह समझौता परमाणु हथियारों को विकसित करने, परीक्षण करने, उत्पादन करने, रखने, स्टॉक करने, उपयोग करने, धमकी देने, स्थानांतरित करने या किसी भी तरह सहायता देने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाती है। इसका लक्ष्य परमाणु हथियारों का पूर्ण उन्मूलन है। दिलचस्प बात यह है कि इसे दुनिया के परमाणु शक्ति संपन्न देश मानने के लिए तैयार नहीं हैं।'
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क्या NPT की कवायद कामयाब है?
निखिल गुप्ता, असिस्टेंट प्रोफेसर, दीवान लॉ कॉलेज:-
परमाणु हथियार जिन देशों के पास हैं, उनसे भिड़ने का जोखिम कोई नहीं लेता। अगर यूक्रेन परमाणु क्षमता से संपन्न होता तो रूस की कभी हिम्मत नहीं पड़ती कि उस पर हमला करे। परमाणु युद्ध से बचाता है, न कि किसी देश को युद्ध में झोंकता है। सोचकर देखिए कि क्या किसी देश ने उत्तर कोरिया, चीन, पाकिस्तान या फ्रांस जैसे देशों पर हमला किया है? NPT भेदभावपूर्ण नीति है, जिसमें ताकतवर देशों को परमाणु हथियारों पर एकाधिकार दे दिया गया है।
निखिल गुप्ता ने कहा, 'NPT ने परमाणु हथियारों के फैलाव को रोका है। सिर्फ 9 देशों के पास परमाणु हथियार हैं। 1960 के दशक तक ऐसा डर था कि आधी दुनिया परमाणु हथियार बना लेगी। इस संधि की सबसे बड़ी आलोचना यह है कि यह पक्षपाती है। अगर परमाणु हथियार हैं तो अमेरिका, ब्रिटेन, चीन, रूस और फ्रांस जैसे देशों का एकाधिकार क्यों हो। परमाणु हथियार से सबसे ज्यादा तबाही अमेरिका ने मचाई है, सबसे पहले उस पर प्रतिबंध लगना चाहिए। ईरान ने पहला हमला किसी देश पर नहीं बोला, ईरान से किसी देश को खतरा नहीं है, जितना अमेरिका से। अमेरिका ने कई देशों पर पहले ही हमला बोला। वेनेजुएला जैसे देश के राष्ट्रपति का अपहरण करता है, कनाडा को अस्थिर करने की बात करता है। दुनिया को परमाणु हथियार से बचाने की कवायद में इजरायल और अमेरिका ने दुनिया को तबाही में झोंक दिया है, जिसका असर भारत जैसे देशों को भुगतना पड़ रहा है।'


