कहा जाता है कि पाकिस्तान की सेना जंग कोई जीती नहीं और चुनाव कोई हारी नहीं। अब उसकी इसी उपलब्धि को एक मौलाना चुनौती देने में जुटा है। पाकिस्तान की सेना से मौलाना ने साफ कहा है कि अगर सियासत करने का इतना ही शौक है तो वर्दी उतारो और चुनाव लड़ लो। पता चल जाएगा कि जनता किसके साथ है। अब भला जो सेना खुद चुनाव कराती हो, सीएम-पीएम चुनती हो... उसको यह शब्द कितने अच्छे लगेंगे।

 

कुछ लोगों का कहना है कि अगर यह बयान किसी नेता ने दिया होता तो बंदूक की दम पर सत्ता चलाने वाली पाकिस्तान की सेना कब का उसे निपटा चुकी थी। मसला यहां मौलाना है और उस मौलाना का, जिसकी पकड़ पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर से बलूचिस्तान तक है। हालांकि सेना ने मौलाना के खिलाफ नेताओं और यूट्यूबरों की फौज उतार दी है। चौतरफा बयानबाजी जारी है। कोई मौलाना को देशद्रोही बता रहा तो कोई कौम का दुश्मन।

 

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दूसरी तरफ मौलाना भी अपनी जबान पर टिका है। यही कारण है कि पूरा मामला 'मौलाना vs मुनीर' होता जा रहा है। कहा जा रहा है कि सेना मौलाना से कुछ ऐसा करवाना चाहती है, जो पहले हाफिज सईद उसके लिए करता था, लेकिन मौलाना होशियार निकला। उसने हजारों की भीड़ के सामने न केवल आसिम मुनीर के प्लान की पोल खोल दी, बल्कि सेना के इशारे पर नाचने से भी मना कर दिया है। इसे पाकिस्तान की सैन्य भाषा में बगावत कहा जा रहा है।

 

आइये बात करते हैं कि पाकिस्तान के बेहद प्रभावशाली मौलाना और जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम के सरबराह फजलुर रहमान के कसूर जलसे की, जिसने पाकिस्तान के सैन्य और सियासी हलकों में तूफान ला दिया है।

कसूर जलसे में क्या हुआ?

13 अप्रैल को पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के कसूर में मौलाना फजलुर रहमान का जलसा होना था। मगर पाकिस्तान की सेना ने अनुमति नहीं दी। मौलाना फजलुर रहमान ने सेना की मंजूरी बगैर कसूर में जलसा किया और आसिम मुनीर पर खूब हमला बोला। मौलाना ने खुलासा किया कि पाकिस्तान की सेना चाहती थी कि वे हथियारबंद लश्कर का गठन करें, ताकि बाद यह लड़ाके बलूचिस्तान, खैबरपख्तूनख्वा और पीओके में सेना के खिलाफ आवाज उठाने वाले लोगों को निशाना बना सके। हालांकि मौलाना ने साफ मना कर दिया और कहा कि मुझे इसका वेतन नहीं मिलता है।

'सेना शहादत के लिए वेतन लेती है'

जलसे में मौलाना फजलुर रहमान ने पाकिस्तान के जान गंवाने वाले सैनिकों पर बेहद कड़ी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा, 'वे (सेना) कहते हैं कि हमारे जवान भी तो शहीद हो रहे हैं। ओ बाबा तेरे जवानों ने पेटी ही इसलिए बांधी है। तनख्वाह इसी की ले रहे हैं कि उन्हें मुल्क की सलामती के लिए लड़ना है। तुम खून का मेरे ऊपर क्या एहसान डालते हो। मेरे खून पसीने के टैक्स से इसी बात के लिए तो तनख्वाह ले रहे हो।' 

मौलाना से क्या करवाना चाहती है पाकिस्तानी सेना?

फजलुर रहमान ने आगे पाकिस्तान सेना की पोल खोल दी और कहा कि हमें कहते हैं कि तुम लश्कर निकालो। तुम असलहा लेकर मुसल्लह (हथियारबंद) गिरोहों के साथ लड़ो। मैंने कोई तनख्वाह नहीं ली। मैं कोई लश्कर नहीं बनाऊंगा। तुम चले जाओंगे... तुम मेरी सरजमीं को आने वाले नस्लों तक जातीय दुश्मनी तक धकेल रहे हो। हमेशा-हमेशा के लिए कत्लोगारत की तरफ धकेल रहे हो। यह किसी और को समझाओ। यह हमें मत समझाया करो।

 

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'वर्दी उतारा और चुनाव लड़ो'

मौलाना ने चुनौती भरे स्वरों में कहा कि अगर आपको सियासत करनी है तो वर्दी उतारकर आइये। पता चल जाएगा कि वर्दी वाले को लोग क्या वोट देते हैं। यह आपका इख्तियार (अधिकार) है कि आप जिसको चाहेंगे तो हुकूमत देंगे और जिससे चाहेंगे तो हुकूमत छीन लेंगे।

टकराव के मूड में मौलाना

अब गुजरांवाला समेत पाकिस्तान के कई शहरों में मौलाना फजलुर रहमान के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जा रही है। 28 जुलाई को पाकिस्तान की एक अदालत ने उन्हें तलब भी किया है। अब देखना यह होगा कि पाकिस्तान की सेना मौलाना के खिलाफ कोई कदम उठाती है या अपने कदम पीछे खींचती है, क्योंकि कसूर जलसे में ही मौलाना ने साफ शब्दों में कहा है कि अगर कोई हाथ उनकी तरफ बढ़ेगा तो उसे धर से काट दिया जाएगा।

क्या सत्ता में मजबूत होगी सेना की पकड़ या बगावत का खौफ

कुछ विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान की सेना अभी चौतरफा घिरी है। चार में से दो प्रांत में हालात बेकाबू हैं। बलूचिस्तान काफी हद तक हाथ से निकल चुका है। खैबरपख्तूनख्वा में टीटीपी ने कहर बरपा रखा है। पीओके में जनता सड़कों पर उतरी है। ऐसे में सेना नहीं चाहती है कि उसके सबसे मजबूत गढ़ पंजाब में कोई उधल-पुथल हो। यही कारण कि मौलाना के खिलाफ कदम उठाने से पहले पाकिस्तान की सेना फूंक-फूंककर कदम रख रही है। 

 

दूसरी तरफ कुछ विश्लेषकों की राय अलग है। उनका मानना है कि पीओजेके, खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में मची उथल-पुथल सेना को सत्ता में अपनी पकड़ और मजूबत करने का मौका देगी। मौलाना के बयान सत्ता हथियाना का एक माध्यम बन सकता है, क्योंकि अगर मौलाना पर एक्शन लिया गया तो हंगामा होना लाजिमी है। ऐसे में सेना नागरिक सरकार के स्थान पर खुद ही कमान संभाल सकती है। 

मौलाना की क्यों हो रही तारीफ?

पाकिस्तान में सेना से भिड़ना मानो शेर की मांद में घुसने जैसा है। ऐसे में न केवल पाकिस्तान के भीतर, बल्कि दुनियाभर में फैले पाकिस्तानी मौलाना के बयान की तारीफ करने में जुटे हैं। उनका कहना है कि मौलाना में कोई बात तो है, जो इस्लामाबाद के ठीक बंगल में सेना को खुली चुनौती देने में जुटे हैं। सेना के खिलाफ उनका एक-एक शब्द जिगरवाला है। वरना इमरान खान ने आसिम मुनीर से भिड़ने की कोशिश की और उनके साथ क्या हुआ? यह दुनिया देख ही रही है।