सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच हुए मक्का रक्षा समझौते की हर तरफ चर्चा है। मुस्लिम देशों में इस बात का मंथन चल रहा है कि समझौता का हिस्सा बना जाए या नहीं। तुर्की ने अपनी पूरी कूटनीतिक ताकत मिस्र को शामिल कराने में झोंक दी है। पाकिस्तान चाहता है कि बांग्लादेश भी इसका हिस्सा बने। मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम से हाल ही में पाकिस्तान के पीएम ने फोन पर बात की। दावा है कि मक्का समझौते पर भी विचार-विमर्श किया गया। 

 

मक्का समझौते को 'मुस्लिम नाटो' की तरह प्रचारित किया जा रहा। इस वजह से देशों की दिलचस्पी और बढ़ जाती है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ भी इजरायल के खिलाफ मुस्लिम नाटो बनाने के पक्षधर हैं। अब सवाल यह है कि क्या यह सच में मुस्लिम नाटो साबित होगा? इससे पहले भी इसी तरह बगदाद पैक्ट किया गया था। उसका क्या हश्र हुआ और ताजा गठबंधन के सामने क्या चुनौतियां हैं? आइये सबकुछ समझते हैं।

 

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क्या है बगदाद समझौता?

साल 1955 में बगदाद संधि हुई थी। इसे केंद्रीय संधि संगठन (CENTO) के नाम से भी जाना जाता है। तुर्की, इराक, ग्रेट ब्रिटेन, पाकिस्तान और ईरान ने मिलकर यह संधि की थी।  चार साल बाद 1959 में इराक संधि से बाहर निकल गया। इसके बाद इसका नाम बगदाद संधि से बदलकर केंद्रीय संधि संगठन (CENTO) कर दिया गया था। मक्का समझौते की तरह यह भी एक रक्षात्मक संधि थी।

 

सबसे पहले साल 1954 में पाकिस्तान और तुर्की ने एक समझौता किया। इसका लक्ष्य क्षेत्र में स्थिरता और सुरक्षा को बढ़ावा देना था। एक साल बाद 1955 में तुर्की ने बगदाद में इराक के साथ एक अन्य आपसी सहयोग समझौता किया, ताकि बाहरी आक्रमण से मिलकर लड़ा जा सके। बाद में अन्य देशों को भी इसमें शामिल होने का न्योता दिया गया। इसके बाद ग्रेट ब्रिटेन, पाकिस्तान और सबसे बाद में ईरान इस समझौते का हिस्सा बना। इसका नाम बगदाद संधि रखा दिया गया।

मक्का समझौते से समानता क्या?

मक्का समझौते की शुरुआत भी ठीक बगदाद पैक्ट की तरह हुई। 2025 में पहले सऊदी अरब और पाकिस्तान ने आपसी सहयोग समझौता किया। एक साल बाद तुर्की को इसमें शामिल किया और बाद में इसे बाकी देशों के लिए भी खोल दिया गया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मक्का समझौते की तारीफ की। ठीक ऐसे ही बगदाद समझौते को भी अमेरिका का समर्थन हासिल था। अमेरिका कभी उसका हिस्सा नहीं बना, लेकिन पर्यवेक्षक की भूमिका निभाता रहा है।

कैसे बिखरी बगदाद संधि?

साल 1956 में मिस्र ने स्वेज नहर को बंद कर दिया। जवाब में इजरायल ने उसके सिनाई प्रायद्वीप पर हमला कर दिया। इराक में क्रांति हो गई। लेबनान में जन विद्रोह भड़क उठा। इन सब घटनाक्रमों ने बगदाद संधि को कमजोर करना शुरू कर दिया। 1957 में अमेरिका ने लेबनान में दखल दिया, ताकि सोवियत प्रभाव को रोका जा सके। उसने आइजनहावर सिद्धांत का हवाला दिया अपने कदम को उचित ठहराया। 

 

इस सिद्धांत की घोषणा तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति ड्वाइट डी. आइजनहावर ने की थी, इसलिए इसे आइजनहावर सिद्धांत कहा जाता है। इसके तहत मध्य पूर्व के किसी भी देश को साम्यवादी हमले के खिलाफ अमेरिकी सैन्य दखल और आर्थिक मदद का भरोसा मिला था। इराक को छोड़कर बगदाद संधि में शामिल सभी देशों ने लेबनान में अमेरिकी दखल का समर्थन किया। एक साल बाद 1959 में इराक ने संधि से खुद को अलग कर लिया।

कैसे संधि से अलग हुआ पाकिस्तान?

इराक के संधि से अलग होने के बाद इसका मुख्यालय तुर्की की राजधानी अंकारा शिफ्ट कर दिया गया। इस संधि की असफलता का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि गठबंधन के तहत न तो कोई सैन्य कमान का गठन हो सका और न ही संयु्क्त सशस्त्र बलों की स्थापना। सामूहिक रक्षा की गारंटी तो कोसों दूर की बात है। नतीजा यह हुआ कि 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद ईरान भी इससे अलग हो गया। इसी साल पाकिस्तान ने भी अपने कदम पीछे खींच लिए। 1971 में भारत के हाथ जंग हार जुके पाकिस्तान को एहसास हो गया था कि यह संगठन उसकी कोई रक्षा नहीं कर सकता है। 1979 में सेंटो या दूसरे शब्दों में कहें तो बगदाद संधि के ताबूत पर आखिरी कील ठोंक दी गई।  

बगदाद संधि की जरूरत क्यों पड़ी थी?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि बगदाद संधि की जरूरत ही क्यों पड़ी? इसका उत्तर यह है कि शीत युद्ध के दौर में अमेरिका नहीं चाहता था कि साम्यवाद या सोवियत का प्रभाव मध्य-पूर्व में पड़े। उसे रोकने के लिए ही यह सैन्य सुरक्षा गठबंधन किया गया था। हालांकि उस समय अमेरिका के तमाम प्रयासों के बावजूद सऊदी अरब और जॉर्डन ने बगदाद समझौते में स्पष्ट दूरी बनाए रखी थी। 

 

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क्या सच में मुस्लिम नाटो बन पाएगा मक्का रक्षा समझौता?

अब सवाल यह है कि जब आज से 47 साल पहले बगदाद समझौता फेल हो चुका है तो क्या हाल ही में हुआ मक्का समझौता अपने उद्देश्यों तक पहुंच पाएगा? विश्लेषकों की इस पर राय अलग-अलग है। कुछ का मानना है कि मध्य-पूर्व में अमेरिका की सुरक्षा गारंटी कमजोर हो रही है। ईरानी हमलों के जवाब में सऊदी अरब के बचाव में भी ट्रंप प्रशासन नहीं आया। यह समझौता एक संदेश है कि इलाका केवल अमेरिका के भरोसे पर नहीं रहेगा।

क्या एक दूसरे के लिए लड़ पाएंगे मक्का रक्षा समझौते वाले देश?

सामूहिक रक्षा को ही मक्का समझौते की सबसे बड़ी शक्ति बताई जा रही है। लेकिन कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह प्रावधान ही सबसे बड़ी कमजोरी है। सऊदी अरब पर ईरान के हमला करने पर तुर्की सैन्य हस्तक्षेप नहीं करेगा। अगर भारत ने पाकिस्तान हमला किया तो इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि रियाद सैन्य हस्तक्षेप करें, क्योंकि नई दिल्ली के साथ उसके गहरे आर्थिक संबंध है। ठीक ऐसे ही इजरायल और तुर्की के बीच संघर्ष होने की स्थिति में सऊदी अरब और पाकिस्तान के प्रत्यक्ष दखल की संभावना भी न के बराबर है।

 

एक देश पर हमला... सभी देशों पर हमला माना जाएगा। मक्का समझौते में यह प्रावधान नाटो के आर्टिकल 5 का कॉपी है। नाटो के ही उदाहरण से समझते हैं कि क्या मक्का समझौते के तहत सामूहिक रक्षा संभव है।

 

नाटो को दुनिया का सबसे ताकतवार रक्षा गठबंधन माना जाता है। इसके आर्टिकल 5 यानी सामूहिक रक्षा का इस्तेमाल दुर्लभतम है। अगर इसे सामान्य बना दिया जाए तो आए दिन जंग ही होती रहेगी। 1949 में नाटो के गठन के बाद सिर्फ एक ही बार आर्टिकल- 5 का इस्तेमाल किया गया। वह भी तब जब अमेरिका में 9/11 जैसा भीषण आतंकी हमला हुआ था।  

सऊदी अरब के लिए भरोसे का साथी नहीं है पाकिस्तान

सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच अच्छे संबंध है। बावजूद इसके पाकिस्तान ने हर संकट में सऊदी अरब का साथ नहीं दिया है। हूती विद्रोहियों के खिलाफ जब आज से एक दशक पहले सऊदी अरब ने सैन्य गठबंधन बनाया तो पाकिस्तान ने इससे दूरी बना ली थी। 

 

दूसरा उदाहरण 2019 का है। हूती विद्रोहियों के साथ चल रही तनातनी के बीच ईरान ने सऊदी अरब की तेल सुविधाओं पर मिसाइलों से हमला किया था। उस वक्त भी पाकिस्तान ने सऊदी अरब की कोई मदद नहीं की थी।

 

सबसे ताजा उदाहरण हालिया अमेरिका-इजरायल और ईरान युद्ध है। ईरान ने सऊदी अरब पर मिसाइलें दागीं। रियाद के बार-बार गुहार लगाने के बाद भी पाकिस्तान आगे नहीं आया, बल्कि तेहरान के साथ कूटनीतिक गेम खेलता रहा। जब सऊदी अरब ने पाकिस्तान को 3 अरब डॉलर की आर्थिक सहायता दी तो ईरान-अमेरिका के बीच युद्धविराम होने के बाद अपनी सेना सऊदी अरब भेजी।

 

मक्का समझौते के अगले दिन ही हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब पर बैलेस्टिक मिसाइल दागी। न तुर्की मदद को आया और न ही पाकिस्तान। इससे ही आप समझौते की गंभीरता का अंदाजा लगा सकते हैं। 

 

उससे भी दिलचस्प एक और घटना है। 20 जुलाई को हूती विद्रोहियों ने लाल सागर में बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य में सऊदी अरब के खिलाफ नौसैनिक नाकेबंदी का ऐलान किया। रियाद ने आनन-फानन 50 देशों को न्योता भेजा। रियाद में बड़ी बैठक होने के बाद 13 देशों ने सऊदी अरब के साथ मिलकर नौसैनिक गठबंधन का ऐलान किया। इन देशों में बहरीन, बांग्लादेश, कोमोरोस, जिबूती, मिस्र, जॉर्डन, कुवैत, पाकिस्तान, कतर, सोमालिया, सूडान, तुर्की और यमन शामिल है। मगर अभी तक हूतियों के खिलाफ यह गठबंधन कोई ठोस कदम नहीं उठा सका है।