राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत के जिस कार्यक्रम को लेकर अमेरिका के न्यूयॉर्क में विरोध चल रहा था, उस कार्यक्रम में उन्होंने विश्व बंधुत्व का सदेश दिया है। उन्होंने मैडिसन स्क्वायर गार्डन में भारतीय-अमेरिकी संगठनों के करीब 5,000 सदस्यों को संबोधित किया। यह कार्यक्रम 'यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन' के नाम से हुआ था। इसमें उन्होंने एकता, विविधता, व्यक्तिगत जिम्मेदारी और प्रवासी भारतीयों के कर्तव्यों पर बात की। उन्होंने कहा कि सिर्फ पैसा कमाना या भौतिक सफलता ही जीवन की पूरी सफलता नहीं है।

मोहन भागवत ने कहा कि अमेरिका की पहचान बहुलता से जुड़ी है, जबकि भारत की पहचान 'विविधता में एकता' से है। उनके मुताबिक भारत में एकता और विविधता दोनों उसके स्वभाव में हैं। लोग दिखने, रहन-सहन और जरूरतों में अलग हो सकते हैं, लेकिन उनके भीतर एक समानता भी है। इसी वजह से लोग एक-दूसरे के दुख-सुख को महसूस करते हैं। उन्होंने विविधता को एकता की सुंदरता बताया।

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मोहन भागवत, RSS प्रमुख:-
अगर हम समाज को शिक्षित नहीं करते हैं, तो भटकाव आता है, और किसी तरह इतिहास में ऐसा हुआ। मैं उस पल को नहीं बता सकता। उसके बाद, हमारा समाज, हमारा देश, विदेशी हमलों का टारगेट बन गया और बहुत सी चीजें खो गईं।

'कर्मभूमि के प्रति रहें ईमानदार'

मोहन भागवत ने कहा कि राष्ट्र सिर्फ नक्शे पर बना भूगोल नहीं है। हर राष्ट्र का एक संदेश, एक मिशन और एक नियति होती है। स्वामी विवेकानंद का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि राष्ट्रों को भी अपने कर्तव्य निभाने होते हैं। भारतीय प्रवासियों से बात करते हुए भागवत ने कहा कि अमेरिका में रहने वाले भारतीयों को सबसे पहले उसी देश के प्रति ईमानदार रहना चाहिए, जहां वे रहते और काम करते हैं। उन्होंने इसे 'कर्मभूमि' का कर्तव्य बताया।

'जन्मभूमि से भी रखें जुड़ाव'

मोहन भागवत ने कहा कि जन्मभूमि भारत से जुड़ाव रखा जा सकता है, लेकिन यह अनिवार्य नहीं है। उन्होंने कहा कि भारत से मिले मूल्य और संस्कार उनके जीवन में दिखने चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि कमाई कितनी हुई, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि हम कितना बांटते हैं। करियर सिर्फ पैसे और भौतिक सुख का नाम नहीं है। हिंदू दर्शन में अर्थ और काम को महत्व दिया गया है, लेकिन सिर्फ भौतिक सुख स्थायी संतोष नहीं देता। 

मोहन भागवत, RSS प्रमुख:-
मैं कोई धार्मिक विद्वान नहीं हूं, न ही आपकी तरह कोई धार्मिक अथॉरिटी हूं, लेकिन मैं एक ऐसे समाज में काम कर रहा हूं जो ट्रेडिशनली कहता है कि धर्म अलग हो सकते हैं, लेकिन इंसानियत एक है। सच एक है, और इंसानियत उस सच का उत्पाद है। इसलिए इंसानियत एक है। वह सच एक सच है, लेकिन उसे बताने वाले के हिसाब से कई तरीकों से बताया गया है। क्योंकि इंसान होने के नाते, हम उस सॉफ्टवेयर के कैदी हैं जो हमारे दिमाग में बनाया गया है।

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'भूखा खड़ा हो, थाली देखे तो अनदेखा न करें'

मोहन भागवत ने जीवन के चार चरणों का जिक्र करते हुए कहा कि व्यक्ति को सीखना है, जीवन चलाना है और अगली पीढ़ी को अनुभव देना है। उन्होंने कहा कि इंसान होने का मतलब दूसरों के प्रति जिम्मेदारी भी है। अगर कोई भूखा व्यक्ति सामने खड़ा हो और आपकी थाली की ओर देखे, तो इंसान आसानी से अनदेखा नहीं कर सकता। 

धर्म और मजहब पर क्या संदेश दे गए मोहन भागवत?

मोहन भागवत ने कहा कि सही सोच इंसान को ऊंचा ले जाती है, गलत सोच उसे नीचे गिरा देती है। उन्होंने धर्म को सिर्फ पूजा या मजहब नहीं बताया। उनके अनुसार धर्म वह संतुलन है जिससे व्यक्ति, समाज और पर्यावरण साथ-साथ आगे बढ़ सकें। अंत में उन्होंने कहा कि कर्मभूमि और जन्मभूमि दोनों के प्रति कर्तव्य निभाने से दुनिया की कई समस्याओं का हल निकल सकता है।