सैन्य मामलों में सऊदी अरब ने पाकिस्तान पर जितना यकीन किया, उतना शायद ही किसी देश पर किया होगा। मगर पिछले एक दशक में दो मौके ऐसे आए जब रियाद को अपने सबसे परम सहयोगी की सबसे अधिक जरूरत थी, लेकिन पाकिस्तान ने मदद से साफ इनकार कर दिया। दोनों ही मामलों में सऊदी अरब ने ईरान समर्थित यमन के हूती विद्रोहियों के खिलाफ इस्लामाबाद से सैन्य सहयोग मांगा था। बदले में उसे एकजुटता और कड़ी निंदा का संदेश मिला।
दुनियाभर को इस बार लग रहा था कि पाकिस्तान शायद सैन्य दखल देने पर मजबूर होगा, क्योंकि हाल ही में हुए मक्का समझौते में एक देश पर हमला सभी पर हमला मानने वाला प्रावधान था। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि हूती विद्रोहियों के साथ रियाद का संघर्ष पहले से चल रहा था। मक्का रक्षा समझौता बाद में हुआ। इस कारण से पाकिस्तान जंग में उतरने के लिए बाध्य नहीं है। सवाल यह भी है कि सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच पिछले साल भी एक-दूसरे की रक्षा करने का समझौता हुआ था... तो फिर उसका क्या हुआ?
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हूती विद्रोहियों ने यमन में सऊदी समर्थित सेनाओं के खिलाफ न केवल जंग छेड़ी, बल्कि दक्षिणी सऊदी अरब पर बैलेस्टिक मिसाइल और ड्रोन से भीषण तबाही मचाई। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने एक हफ्ते में दो बार हमलों की सिर्फ निंदा की। उम्मीद लगाई गई कि पाकिस्तान सैन्य दखल देगा। हालांकि पाकिस्तान के डिप्टी पीएम और विदेश मंत्री इशाक डार ने स्पष्ट किया, 'सऊदी अरब पर हूती हमलों के जवाब में मक्का समझौते के तहत पाकिस्तान की ओर से किसी सैन्य कार्रवाई पर कोई चर्चा नहीं हुई।' इजरायली चैनल 14 का दावा है कि पाकिस्तान के इनकार के बाद ही मोहम्मद बिन सलमान ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को फोन लगाया था। वहां से भी उन्हें सिर्फ निराशा मिली है।
10 साल में दूसरी बार संकट के मुहाने पर रियाद
हूती विद्रोहियों के खिलाफ सऊदी अरब आज से लगभग 10 साल पहले भी पाकिस्तान से खुला सैन्य समर्थन मांग चुका है। उस वक्त पाकिस्तान ने अपनी संसद के माध्यम से सैन्य मदद करने से साफ मना कर दिया था। पाकिस्तान के इस कदम को बेहद चौंकाने वाला माना गया, क्योंकि 1982 के समझौते के तहत सऊदी अरब में उसकी सैन्य मौजूदगी वर्षों तक रही।
जब 2015 में पाकिस्तान ने दिया धोखा
2014 मे सऊदी अरब ने तत्कालीन नवाज शरीफ सरकार को 1.5 अरब डॉलर का कर्ज दिया। अगले वर्ष 2015 में सऊदी अरब को उम्मीद थी कि हूती विद्रोहियों के खिलाफ पाकिस्तान सैन्य दखल देगा। 10 अप्रैल 2015 को पाकिस्तान की संसद ने फैसला किया कि वह हूती विद्रोहियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई में पाकिस्तान हिस्सा नहीं लेगा। पाकिस्तान ने खुद को तटस्थ रखा और सऊदी अरब के साथ सिर्फ एकजुटता दिखाई। उस वक्त संसद में वित्त मंत्री इशाक डार ने प्रस्ताव पेश किया था। 10 साल बाद यही इशाक डार दोबारा दुनिया को बता रहे हैं कि सैन्य दखल का कोई इरादा नहीं है।
बिगड़े रिश्तों को सेना ने कैसे संभाला?
पाकिस्तान के 2015 के रवैये से सऊदी अरब बेहद नाराज हुआ। दोनों देशों के रिश्तों में कड़वाहट आई। उसी समय पाकिस्तान की सेना ने दखल दिया। सऊदी अरब ने जब इस्लामिक मिलिट्री काउंटर टेररिज्म कोएलिशन (IMCTC) का गठन किया तो पाकिस्तान की सेना ने खुलकर समर्थन किया। पाकिस्तान के पूर्व सेना प्रमुख राहिल शरीफ का इसका पहला कमांडर इन चीफ बनाया गया। इसके बाद पाकिस्तान की सेना ने सऊदी अरब में पहले से ही मौजूद अपने 1600 सैनिकों को गठबंधन में शामिल करने की घोषणा की। सेना की इस पहल से दोनों देशों के बिगड़े रिश्ते पटरी पर लौट सके।
एक दशक बाद दोबारा पाकिस्तान की परीक्षा
सितंबर महीने में हूती विद्रोही लाल सागर की तरफ बढ़े तो सऊदी अरब और उसकी समर्थित सेनाओं ने बमबारी की। जवाब में हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब की तेल सुविधाओं, सैन्य ठिकानों और हथियार डिपो पर बैलेस्टिक मिसाइल और ड्रोन से हमला किया। पाकिस्तान ने सिर्फ हमले की निंदा की। यह भी कहा कि उसने मक्का रक्षा समझौते के तहत जवाबी कार्रवाई का कोई फैसला नहीं लिया है।
2014 की तर्ज पर इस बार भी संघर्ष से पहले सऊदी अरब ने पाकिस्तान को 3 अरब डॉलर की आर्थिक मदद दी थी, ताकि वह संयुक्त अरब अमीरात का कर्ज चुका सके। पांच महीने बाद हूतियों के खिलाफ पाकिस्तान ने सऊदी अरब को ठेंगा दिखा दिया। हालांकि अबकी बार पाकिस्तान ने कूटनीतिक रास्ता जरूर चुना है। वह ईरान के साथ बातचीत कर रहा है, ताकि बीच का रास्ता निकाला जा सके। यहां एक रोचक बात यह है कि पाकिस्तान के लगभग 8000 सैनिक और बड़ी संख्या में विमान अब भी सऊदी अरब में तैनात हैं।
कितने गहरे हैं दोनों देशों के सैन्य संबंध?
पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच रक्षा सहयोग की शुरुआत 1967 से होती है। तब पाकिस्तान ने अपने एयरफोर्स और मिलिट्री ट्रेनरों को सऊदी अरब भेजा, ताकि सऊदी सेना को प्रशिक्षण दिया जा सके। 1982 के पाकिस्तान-सऊदी सैन्य प्रोटोकॉल के तहत पाकिस्तान के सैन्य अधिकारी सऊदी अरब में तैनात होने लगे। समझौते के तहत लगभग 15 हजार पाकिस्तानी सेना के जवानों को सऊदी अरब भेजा गया।
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1990-91 में पाकिस्तान ने गल्फ युद्ध में सऊदी अरब का साथ दिया। जब इराक ने कुवैत पर अचानक हमला किया तो पाकिस्तान ने बड़ी तादाद में अपने सैनिकों को सऊदी अरब भेजा। हजारों पाकिस्तानी सैनिकों ने सऊदी अरब के रणनीतिक ठिकानों की सुरक्षा की। दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि राहिल शरीफ के अलावा पूर्व सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा भी तीन साल तक सऊदी अरब में तैनात रह चुके हैं। मौजूदा सेना प्रमुख आसिम मुनीर रियाद में सैन्य अताशे रहे हैं।
हूती विद्रोहियों से भिड़ने से क्यों बचता है पाकिस्तान?
सवाल यह है कि पाकिस्तान हूती विद्रोहियों के खिलाफ सऊदी अरब को सैन्य मदद देने से क्यों बचता है? एक वजह यह है कि ईरान से उसकी सीमा लगती है। हूती विद्रोहियों को ईरान का खुला समर्थन है। अगर इस्लामाबाद ने यमन में दखल दिया तो ईरान उसके खिलाफ दक्षिण-पश्चिम सीमा पर मोर्चा खोल सकता है। अबकी बार पाकिस्तान ने खाड़ी देशों पर ईरान की ताकत को देखा भी है। उसका कोई शहर ईरान की जद से दूर नहीं है।
ईरान शिया बहुल देश है। पाकिस्तान में शिया अल्पसंख्यक है, लेकिन संख्या अच्छी खासी है। उसे डर है कि अगर संघर्ष में उलझे तो देशभर में सांप्रदायिक तनाव बढ़ और हिंसा बढ़ सकती है। हूती विद्रोही खुद में एक बड़ी ताकत बन चुके हैं। वे लाल सागर से तेल अवीव तक हमला करने की ताकत रखते हैं। इस्लामाबाद के सैन्य दखल देने पर कराची हूती विद्रोहियों के निशाने पर आ सकता है। दखल न देन की एक वजह यह भी है कि पाकिस्तान के सामने आर्थिक चुनौतियां विशाल हैं। वह अब उस स्थिति में नहीं है कि कोई बड़ी जंग लड़ सके।
सऊदी अरब और पाकिस्तान को एक-दूसरे की जरूरत क्यों?
सऊदी अरब धन कुबेर है। अकूत दौलत और तेल का बड़ा केंद्र है। मानव संसाधन, सुरक्षा और सैन्य प्रशिक्षण में पाकिस्तान उससे आगे है। पाकिस्तान मुस्लिम जगत का इकलौता परमाणु हथियार वाला देश है। सऊदी अरब पर उसकी आर्थिक और ऊर्जा की निर्भरता अधिक है। हमेशा रियाद के झंडे के नीचे रहने वाला स्वभाव है। पाकिस्तानी नेता भी सऊदी नेताओं के आगे अधीनस्थ की तरह व्यवहार करते हैं। इन्हीं सभीकरणों से रियाद का हमेशा से ही इस्लामाबाद पर अधिक भरोसा रहा है।
