आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी, तनाव, खराब खान-पान और देर से परिवार शुरू करने की वजह से कई कपल्स को बच्चा पैदा करने में दिक्कतें आ रही हैं। साथ ही कुछ महिलाओं को प्रेग्नेंसी के दौरान भी तरह-तरह की परेशानियां झेलनी पड़ रही हैं। इसीलिए अब लोग सिर्फ इलाज पर निर्भर नहीं रह रहे हैं, बल्कि गर्भधारण से पहले ही अपनी सेहत को बेहतर बनाने पर जोर दे रहे हैं। इसी वजह से आयुर्वेद का 'गर्भाधान संस्कार' तेजी से लोकप्रिय हो रहा है।

विशेषज्ञों के अनुसार, आधुनिक जीवनशैली और तनाव का सबसे ज्यादा असर प्रेग्नेंसी पर पड़ रहा है।
इन समस्याओं को देखते हुए कई कपल्स अब गर्भधारण की योजना बनाने से पहले आयुर्वेद की मदद ले रहे हैं और 'गर्भाधान संस्कार' जैसे कार्यक्रमों में हिस्सा लेने के लिए आगे आ रहे हैं।

 

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क्या है गर्भाधान संस्कार?

आयुर्वेद में गर्भाधान संस्कार को गर्भधारण की तैयारी का पहला कदम माना जाता है। इसका मतलब सिर्फ बच्चा पैदा करना नहीं बल्कि होने वाले माता-पिता को पहले से शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से तैयार करना है। माना जाता है कि अगर माता-पिता पहले से स्वस्थ होंगे तो प्रेग्नेंसी भी बेहतर होगी और बच्चे का विकास भी अच्छी तरह हो सकेगा।

इसमें क्या-क्या किया जाता है?

कर्नाटक के उडुपी स्थित एसडीएम आयुर्वेद महाविद्यालय एवं अस्पताल में कई सालों से यह सुविधा दी जा रही है। यहां आने वाले कपल्स को उनकी सेहत के हिसाब से सलाह दी जाती है। इसमें खान-पान में बदलाव, रोजमर्रा की अच्छी आदतें अपनाना, योग और मानसिक तनाव कम करने जैसे उपाय बताए जाते हैं। इसका मकसद शरीर को गर्भधारण के लिए तैयार करना होता है।

 

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आयुर्वेद क्या कहता है?

आयुर्वेद के अनुसार, स्वस्थ गर्भधारण के लिए चार चीजें सबसे जरूरी मानी गई हैं। इनमें सही समय, महिला का स्वस्थ रिप्रोडक्टिव सिस्टम, शरीर को पूरा पोषण मिलना और स्वस्थ ऐग और स्पर्म शामिल हैं। आयुर्वेद इसे खेती से जोड़कर समझाता है। जैसे अच्छी फसल के लिए उपजाऊ जमीन, सही मौसम, पर्याप्त पानी और अच्छे बीज की जरूरत होती है उसी तरह स्वस्थ बच्चे के लिए भी इन सभी बातों का ध्यान रखना जरूरी माना गया है।

डॉक्टर ने क्या कहा?

एसडीएम आयुर्वेद महाविद्यालय एवं अस्पताल की प्राचार्य और वरिष्ठ स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. ममता के. वी. का कहना है कि 'गर्भ' का मतलब भ्रूण और 'आधान' का मतलब उसकी स्थापना है। उनके अनुसार गर्भाधान संस्कार सिर्फ एक चिकित्सा प्रक्रिया नहीं बल्कि माता-पिता को शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक रूप से तैयार करने की प्रक्रिया है ताकि बच्चे को जीवन की बेहतर शुरुआत मिल सके।