दिल्ली मेट्रो दिलों को जोड़ती है। यह दिल्ली मेट्रो की टैगलाइन है। 12 कॉरिडोर वाली दिल्ली मेट्रो भारत का सबसे बड़ा मेट्रो नेटवर्क है। यह दावा भी किया जाता है कि दिल्ली मेट्रो दुनिया का सबसे बड़ा ड्राइवरलेस मेट्रो नेटवर्क है। इसमें कोई शक नहीं है कि नेशनल कैपिटल रीजन (NCR) में रहने वाले लोगों के लिए दिल्ली मेट्रो किसी वरदान से कम नहीं है। दिल्ली और उसके आसपास घूमने के लिए यह सबसे सुलभ और सस्ता परिवहन साधन है। लेकिन पीक टाइम में मेट्रो प्लेटफॉर्म पर जिस तरह की भीड़ होती है, उससे यात्रियों को कई समस्याओं से गुजरना पड़ता है। उस वक्त एहसास होता है कि दिल्ली मेट्रो सिर्फ दिलों को ही नहीं, बल्कि शरीरों को भी जोड़ने का काम करती है। भीड़ इतनी अधिक होती है कि यात्रियों को एक-दूसरे की सांस तक महसूस होती है। कई बार तो धक्का-मुक्की की नौबत आ जाती है। दिल्ली में अलग-अलग शहरों से आने वाले लोगों की संख्या जिस तेजी से बढ़ रही है, उसे देखते हुए बहुत संभव है कि आने वाले समय में स्थिति और बदतर हो जाए।
चीन, जापान, सिंगापुर और ब्रिटेन जैसे देशों के बड़े शहरों में भी लाखों लोग रोजाना मेट्रो से सफर करते हैं। वहां भी व्यस्त समय में ट्रेनों और स्टेशनों पर यात्रियों की संख्या बढ़ जाती है। लेकिन भीड़ को संभालने के लिए इन देशों ने अलग-अलग तरीके अपनाए हैं। कहीं स्टेशनों पर यात्रियों की एंट्री नियंत्रित की जाती है, तो कहीं ट्रेन के डिब्बों में भीड़ की जानकारी पहले ही दे दी जाती है। इन देशों की मेट्रो में किस तरह भीड़ को मैनेज किया जाता है और क्या इससे दिल्ली मेट्रो कुछ सीख सकती है, इसे समझने का प्रयास करते हैं।
चीन कैसे करता है भीड़ को नियंत्रित?
भारत के बाद चीन सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश है। चीन के बीजिंग और शंघाई जैसे शहरों में मेट्रो यात्रियों की संख्या काफी ज्यादा है। यहां भीड़ को नियंत्रित करने के लिए स्टेशन के अंदर यात्रियों की आवाजाही पर नजर रखी जाती है। जरूरत पड़ने पर स्टेशन में प्रवेश करने वाले यात्रियों की संख्या सीमित कर दी जाती है।
बीजिंग में कोरोना महामारी के दौरान भीड़ को नियंत्रित करने के लिए एक खास प्रयोग किया गया था। इसके तहत कुछ व्यस्त स्टेशनों पर यात्रियों को 10 मिनट के अलग-अलग स्लॉट में प्रवेश के लिए बुकिंग करने की सुविधा दी गई। इसका मकसद एक ही समय पर स्टेशन में ज्यादा यात्रियों को पहुंचने से रोकना था।
वहीं, शंघाई में मेट्रो स्टेशनों पर यात्रियों की आवाजाही आसान बनाने के लिए ऑटोमैटिक गेट का इस्तेमाल किया जाता है। यात्री कार्ड या QR कोड स्कैन करके गेट से गुजर सकते हैं। इससे टिकट जांच के लिए लगने वाली लाइन कम करने में मदद मिलती है।
जापान में AI बताता हैं मेट्रो की भीड़
जापान के टोक्यो में मेट्रो की भीड़ को संभालने का तरीका थोड़ा अलग है। यहां यात्रियों को यह जानकारी देने की कोशिश की जाती है कि ट्रेन के किस डिब्बे में कितनी भीड़ है। टोक्यो मेट्रो में AI और कैमरों की मदद से डिब्बों में यात्रियों की संख्या का अनुमान लगाया जाता है। इसकी जानकारी यात्रियों को डिजिटल डिस्प्ले और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए दी जाती है।
इससे यात्री अपनी सुविधा के हिसाब से कम भीड़ वाले डिब्बे में चढ़ सकते हैं। इसका फायदा यह होता है कि ट्रेन के सभी डिब्बों में यात्रियों का दबाव कुछ हद तक बराबर हो सकता है। जापान में प्लेटफॉर्म पर यात्रियों के खड़े होने के लिए निशान भी बनाए जाते हैं। इससे ट्रेन के दरवाजे के सामने भीड़ लगाने के बजाय यात्रियों को कतार में खड़े होने में मदद मिलती है।
सिंगापुर में रोके जाते हैं एस्केलेटर
सिंगापुर में मेट्रो की भीड़ को नियंत्रित करने के लिए स्टेशन पर मौजूद कर्मचारियों और कंट्रोल रूम की मदद ली जाती है। यहां स्टेशन की निगरानी 24 घंटे की जाती है। अगर किसी प्लेटफॉर्म या स्टेशन के दूसरे हिस्से में यात्रियों की भीड़ बढ़ने लगती है, तो कर्मचारी तुरंत कदम उठाते हैं।
सिंगापुर के परिवहन मंत्रालय ने नवंबर 2022 में संसद में बताया था कि भीड़ बढ़ने पर स्टेशन से प्लेटफॉर्म तक यात्रियों की आवाजाही धीमी की जा सकती है। जरूरत पड़ने पर एस्केलेटर बंद किए जाते हैं या यात्रियों को कुछ समय के लिए स्टेशन के ऊपरी हिस्से में रोका जाता है। अगर ट्रेन में देरी की वजह से प्लेटफॉर्म पर भीड़ बढ़ रही है, तो संभव होने पर ट्रेनों की संख्या बढ़ाई जाती है। जरूरत पड़ने पर यात्रियों को आसपास के दूसरे मेट्रो स्टेशन की तरफ भी भेजा जाता है।
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लंदन में CCTV से रखते हैं भीड़ पर नजर
ब्रिटेन की राजधानी लंदन में भी मेट्रो स्टेशनों पर भीड़ नियंत्रित करने के लिए अलग व्यवस्था है। यहां हर स्टेशन के लिए भीड़ नियंत्रण और आपात स्थिति से निपटने की योजना बनाई जाती है। अगर किसी स्टेशन पर यात्रियों की संख्या अचानक बढ़ जाती है, तो कुछ टिकट गेट बंद किए जा सकते हैं। इससे स्टेशन में आने वाले यात्रियों की संख्या कम की जाती है। जरूरत पड़ने पर एस्केलेटर की दिशा भी बदली जा सकती है, ताकि यात्रियों की आवाजाही एक ही दिशा में बनी रहे।
स्टेशन पर तैनात कर्मचारी और CCTV कैमरों की मदद से भीड़ पर नजर रखते हैं। इसका मकसद भीड़ को इतना बढ़ने से रोकना है कि यात्रियों का चलना-फिरना मुश्किल हो जाए।
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दिल्ली मेट्रो क्या इन देशों से सीख सकती है?
दिल्ली मेट्रो में भी यात्रियों की बढ़ती संख्या को देखते हुए भीड़ प्रबंधन के इंतजाम जरूरी हैं। चीन, जापान, सिंगापुर और लंदन के उदाहरण बताते हैं कि सिर्फ ट्रेनों की संख्या बढ़ाना ही इसका समाधान नहीं है। स्टेशन के अंदर यात्रियों की आवाजाही और प्लेटफॉर्म पर भीड़ को नियंत्रित करना भी उतना ही जरूरी है।
दिल्ली मेट्रो में भी कुछ व्यवस्थाएं लागू की जा सकती हैं। जैसे यात्रियों को पहले से बताया जाए कि किस डिब्बे में कितनी भीड़ है। व्यस्त स्टेशनों पर एंट्री को नियंत्रित किया जाए। प्लेटफॉर्म पर यात्रियों के चढ़ने और उतरने के लिए अलग-अलग रास्ते बनाए जाएं। इसके अलावा ऑफिस आने-जाने के समय ज्यादा भीड़ वाले स्टेशनों पर अतिरिक्त कर्मचारियों की तैनाती की जा सकती है।
सबसे जरूरी बात यह है कि भीड़ बढ़ने के बाद नहीं, बल्कि उसके बढ़ने की आशंका होने पर ही कदम उठाए जाएं। इससे यात्रियों को धक्का-मुक्की से राहत मिल सकती है और मेट्रो का सफर ज्यादा सुरक्षित बनाया जा सकता है। यदि दिल्ली मेट्रो में भीड़ नियत्रिंत हो जाएगी तो उसका टैगलाइन पढ़ने में और आनंद आएगा।
