शेख हसीना के अपदस्थ होने के बाद से भारत और बांग्लादेश के रिश्ते हर रोज नई परीक्षा से गुजर रहे हैं। मोहम्मदू यूनुस की अंतरिम सरकार के बाद तारिक रहमान के सत्ता में आने से कुछ बेहतर होने की उम्मीद थी, लेकिन अब यह भी धराशायी हो गई। ढाका में भारत विरोधी लहर को लगातार समर्थन मिल रहा है। नई दिल्ली की चिंताओं को नजरअंदाज करना आम बात हो गई है। दिल्ली की तुलना में पाकिस्तान और तुर्की को अधिक तरजीह दी जा रही है।
दूसरी तरफ पिछले दो साल से भारत ने बांग्लादेश के प्रति धैर्य का परिचय दिया। तनाव बढ़ाने वाले मुद्दों को छूने से बचता रहा। जबकि बांग्लादेश ने पूर्वोत्तर और बंगाल की खाड़ी का जिक्र करके भारत को असहज किया। उम्मीद थी कि इसी महीने बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान नई दिल्ली आएंगे। राष्ट्रपति कार्यकाल ने मीडिया को कार्यक्रम से संबंधित एक ईमेल भी भेज दिया था, लेकिन बाद में इसे वापस ले लिया गया।
भारत को क्यों नजरअंदाज कर रहे तारिक रहमान?
तारिक रहमान जब फरवरी महीने में बांग्लादेश के प्रधानमंत्री बने तो भारत ने सबसे पहले उन्हें नई दिल्ली आने का न्योता दिया। मगर उन्होंने अपना पहला राजकीय दौरा मलेशिया का किया। इसके बाद चीन की यात्रा की। पांच महीने बाद भारत ने तारिक रहमान को दूसरी बार न्योता भेजा। अबकी ब्रिक्स सम्मेलन में हिस्सा लेने का अनुरोध किया गया। दोनों ही निमंत्रण को नजरअंदाज करके तारिक रहमान ने शायद स्पष्ट कर दिया है कि भारत के साथ पहले जैसे रिश्तों को बनाए रखने में बांग्लादेश की कोई दिलचस्पी नहीं है। अब सवाल यह है कि भारत कब तक धैर्य दिखाएगा। क्या बांग्लादेश को उसी की भाषा में जवाब देने का समय आ गया है। अगर ऐसा नहीं किया गया तो क्या दिक्कतें खड़ी होंगी?
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बांग्लादेश का तर्क है कि अभी यात्रा का माहौल नहीं है। शेख हसीना की प्रेस कॉन्फ्रेंस ने माहौल को बिगाड़ दिया है। नई दिल्ली को विश्वास बहाली और बातचीत का माहौल बनाना होगा। बांग्लादेश के विदेश मामलों के राज्य मंत्री हुमायूं कबीर यहां तक कह चुके हैं कि प्रधानमंत्री को भारत जाने की कोई जल्दी नहीं है। सवाल यह है कि एक तरफ बांग्लादेश कह रहा है कि बातचीत का माहौल बनाना होगा। दूसरी तरफ भारत विरोधी बयानबाजी को बढ़ावा दे रहा है।
भारत की टेंशन बढ़ा देगा पाकिस्तान का दखल
बांग्लादेश में जब-जब बीएनपी की सरकार आई तब-तब उसके भारत से रिश्ते अच्छे नहीं रहे। बीएनपी सरकार में पाकिस्तान और कट्टरपंथियों का ढाका में खूब प्रभाव रहा। पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने बांग्लादेश में आतंकी लैंच पैड बना लिए थे। तारिक रहमान की सरकार के रुख से स्पष्ट है कि भारत को सतर्क रहने की जरूरत है। शेख हसीना के जाने के बाद ही बांग्लादेश में भारत विरोधी तत्व और कट्टरपंथियों की बाढ़ सी आ गई है। इनके सहारे आईएसआई पूर्वोत्तर में अशांति फैला सकती है। अगर ऐसा हुआ तो भारत के सामने पूर्वी मोर्चे पर बड़ी सुरक्षा चुनौती खड़ी होगी।
राफेल का जिक्र, क्या बांग्लादेश को भारत की परवाह नहीं
तारिक रहमान के सूचना एवं प्रसारण सलाहकार जाहिद उर रहमान ने मंगलवार को ही कहा कि बांग्लादेश चीन में बने जे-10सीई लड़ाकू जेट को खरीदना पर विचार कर रहा है। उन्होंने इस सौदे के पीछे जो संदर्भ दिया, वह बहुत कुछ बताता है। उन्होंने कहा कि हालिया भारत-पाकिस्तान संघर्ष में जे-10सीई ने बेहतरीन प्रदर्शन दिखाया। उसने एक भारतीय राफेल को मार गिराया। गौर करने वाली बात यह है कि सार्वजनिक डोमेन में इस दावे की पुष्टि करने वाला कोई तथ्य मौजूद नहीं है। प्रेस कॉन्फ्रेंस में जानबूझकर भारत के राफेल का जिक्र करना यह बताता है कि बांग्लादेश का शीर्ष नेतृत्व नई दिल्ली की भावनाओं की कोई परवाह नहीं करता है।
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बांग्लादेश में दिलचस्पी क्यों दिखा रहा तुर्की?
बांग्लादेश के मंत्री हुमायूं कबीर ने हाल ही में दो बार अपने बयान में मक्का समझौते में शामिल होने की इच्छा व्यक्त कर चुके हैं। अगर बांग्लादेश मक्का समझौते में शामिल होता है तो इससे साफ हो जाएगा कि उसने भारत की जगह तुर्की और पाकिस्तान के साथ जोड़ने का विकल्प चुन लिया। पिछले साल ऑपरेशन सिंदूर में तुर्की की क्या भूमिका थी? यह जगजाहिर है।
तुर्की का पूरा फोकस भारत को घेरने की है। आर्मेनिया, ग्रीस और साइप्रस में भारत की रणनीतिक घेरेबंदी के जवाब में तुर्की ने पाकिस्तान और बांग्लादेश में अपनी मौजूदगी बढ़ाना शुरू कर दिया है। वह बांग्लादेश को उसकी सेना को आधुनिक बनाने में मदद कर रहा है। तोप, टैंक और ड्रोन की आपूर्ति में जुटा है। आने वाले वर्षों में हथियारों के साक्षा उत्पादन पर भी सहमति बनी है। तुर्की का मकसद ढाका के सहारे पूर्वोत्तर, म्यांमार और बंगाल की खाड़ी में दखल देना है।
स्पष्ट लकीर खींचने की जरूरत
भारत सरकार ने अभी तक बांग्लादेश के मामले में धैर्य का परिचय दिया। रिश्तों को बचाने और संभालने की कोशिश की। जबकि ढाका भारत विरोधी ताकतों चीन, पाकिस्तान और तुर्की के साथ अधिक निकटता बढ़ाते जा रहा है। ऐसे में भारत को एक स्पष्ट लकीर खींचने की जरूरत है। हाल ही में इजरायल ने सीरिया के एक एयरबेस पर हमला किया। इसके बाद उसने साफ शब्दों में कहा कि इजरायल के हितों को नुकसान पहुंचाने वाले तुर्की के दखल को वह बर्दाश्त नहीं करेगा।
भारत सरकार को भी ढाका को यह बताने की जरूरत है कि अगर नई दिल्ली के सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को छुआ या चुनौती देने की कोशिश की तो यह रेडलाइन मानी जाएगी। यह इसलिए भी जरूरी है कि ढाका को यह पता हो कि भारत के संदर्भ में क्या छूना और क्या नहीं।
