बीते कुछ महीनों में यह देखा गया है कि नकली चीजों के पकड़े जाने का सिलसिला बढ़ गया है। कभी नकली खोआ, कभी नकली पनीर तो कभी किसी ब्रांड के नाम पर फर्जी प्रोडक्ट पकड़े जाते हैं। यह सिलसिला दवाओं तक भी पहुंच रहा है। इस साल ही सैकड़ों करोड़ की दवाएं, सिरप और अन्य चीजें पकड़ी गई हैं और दर्जनों लोग गिरफ्तार हुए हैं। इसके बावजूद यह सिलसिला थमा नहीं है। ऐसे में यह आशंका पैदा होती है कि हम जो दवाएं खा रहे हैं, वे असली हैं भी या नहीं? पिछले कुछ समय में जितने तरह की दवाएं पकड़ी गई हैं और अवैध कारोबार के लिए जो तरीके अपनाए गए हैं, वे हर किसी को हैरान कर देते हैं।
इसी महीने पुडुचेरी में लगभग 5000 करोड़ की नकली दवाएं और कच्चा माल बरामद हुआ है। इस मामले के तार एक IPS अधिकारी से जुड़े और उनकी गिरफ्तीर भी हुई। इसी तरह नकली ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन, ब्लड प्रेशर और कैंसर की नकली दवाएं, ऑक्सीलजिन, एजिंथ्रोमाइसिन और पैरासिटामाल जैसी दवाओं की नकली कॉपी बेचने वाले दर्जनों लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। इन लोगों के पास से भारी मात्रा में नकली दवाएं, दवाएं बनाने के लिए जरूर कच्चा माल और कई अन्य प्रतिबंधित चीजें भी बरामद की गई हैं।
कितना बड़ा है नकली दवाओं का खेल?
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की साल 2024 की एक रिपोर्ट बताती है कि दुनियाभर कम और मध्यम आय वाले देशों में 10 प्रतिशत दवाएं नकली ही हैं। इसी रिपोर्ट के मुताबिक, ये देश हर साल लगभग 2.89 लाख करोड़ रुपये इसी तरह की दवाओं पर खर्च कर देते हैं। WHO का कहना है कि इस तरह की दवाएं लोगों की सेहत के लिए नुकसानदायक हैं और कई बार ये जानलेवा भी साबित होती हैं। साथ ही, जिस मकसद से ये दवाएं ली जाती हैं, वह भी पूरा नहीं होता क्योंकि इन दवाओं में जरूरी तत्व ही नहीं पाए जाते।
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WHO की रिपोर्ट, इस तरह की दवाएं लोगों में ऐसी समस्याएं पैदा कर देती हैं जिन्हें ठीक कर पाना लगभग नाममुकिन हो जाता है। साथ ही, इसका आर्थिक असर भी होता है और लोगों को इलाज पर कई गुना ज्यादा पैसे भी खर्च करते हैं।
भारत में बढ़ती जा रही नकली दवाओं की समस्या
इस साल 1 जनवरी से लेकर अभी तक लगभग 3 दर्जन घटनाएं ऐसी हुई हैं जिनमें अलग-अलग एजेंसियों ने नकली दवाएं बनाने और बेचने वाले लोगों की गिरफ्तारी की है। इसमें दर्जनों ठिकानों पर की गई छापेमारी भी शामिल है। इनमें ज्यादातर ठिकाने राजधानी दिल्ली, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और हरियाणा में पकड़े गए। इन छापेमारियों के बाद कम से कम 75 लोगों की गिरफ्तारी हुई, दर्जनों लोग पकड़े गए और कई एफआईआर भी दर्ज की गई हैं।
हैरान करने वाली बात है कि पकड़ी गई दवाओं में आमतौर पर इस्तेमाल होने वाली पैरासिटामोल और एजिंथ्रोमाइसिन से लेकर एंटीबायोटिक, रेबीज, एंटी सीरम और कैंसर तक की दवाएं शामिल हैं। यह दिखाता है कि नकली दवाओं का यह रैकेट कितना बड़ा और खतरनाक है। इन लोगों के पास से भारी मात्रा में नकली दवाएं और कच्चा माल बरामद किए गए हैं।
होश उड़ा देंगी घटनाएं
मई और जून 2026 में उत्तर प्रदेश के आगरा में नकली दवाओं के बड़े नेटवर्क का पर्दाफाश हुआ। FSDA ने 13 दवा फर्मों और 12 गोदामों पर छापेमारी की और इसमें 9 एफआईआर दर्ज की गई। छापेमारी के बाद 3.63 करोड़ रुपये की नकली दवाएं पकड़ी गईं। पकड़ी गई दवाओं में सरकारी अस्पतालों में दी जाने वाली दवाएं, जीवन रक्षक दवाएं और खांसी के लिए दी जाने वाले ऑक्सोलामाइन जैसी दवाएं शामिल थीं।
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जून में ही महाराष्ट्र के कई जिलों के कुल 34 ठिकानों पर हुई छापेमारी में नकली दवाएं पकड़ी गईं। 4.12 करोड़ रुपये की दवाओं में कई दवाएं ऐसी थीं जिन पर फर्जी लेबल थे और 2.23 लाख रुपये की दवाओं को विज्ञापन का उल्लंघन करता पाया गया।
फरवरी 2025 में दिल्ली पुलिस ने बिहार के पटना से 9 लोगों को गिरफ्तार किया। ये लोग एक फैक्ट्री में नकली दवाएं बना रहे थे। इनके पास से 5 करोड़ से ज्यादा रुपये की दवाएं मिलीं। इसमें जिंक के 1.19 लाख टैबलेट, एजिंथ्रोमाइसिन के 42 हजार टैबलेट के अलावा 27 किलो पैरासिटामोल पाउडर, 13 किलो ट्रामाडोल पाउडर और 500 ग्राम अल्प्राजोलम बरामद किया गया। ये लोग इन्हीं पाउडर से नकली दवाएं बना रहे थे और पेनकिलकर के तौर पर इन्हें बेचकर लोगों को नशे का आदी भी बना रहे थे।
इसी तरह मई 2026 में देश की राजधानी दिल्ली के मुखर्जी नगर में सरकार अस्पतालों के लेबल हटाकर उन्हें अलग-अलग राज्यों में बेचने का मामला सामने आया और 6 करोड़ से ज्यादा की दवाएं बरामद हुईं। मई 2026 में ही दिल्ली में Unitel Pharma नाम के एक सिंडिकेट का भंडाफोड़ हुआ। 10 करोड़ से ज्यादा की दवाएं बरामद हुईं जिनमें कैंसर और लिवर की नकली दवाएं बरामद की गईं। इस केस में भी 4 लोग गिरफ्तार किए गए। इसी महीने यानी जुलाई 2026 में यूपी के आगरा में फिर से 3.63 करोड़ रुपये की दवाएं जब्त हुईं।
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कौन सी हैं ये दवाएं?
हमने खबरों की पड़ताल में पाया कि ज्यादातर ऐसी नकली दवाएं बनाई जा रही हैं जिनको लोग नाम बताकर खरीदते हैं। उदाहरण के लिए पेन किलर और सिरदर्द वाली दवाएं। इसमें पैरासिटामोल, एंजिथ्रोमाइसिन को नकली बनाने के मामले सबसे ज्यादा हैं। इसके अलावा, खांसी की दवा ऑक्सोलामाइन, दर्द की दवा ओक्सालगिन, जीवन रक्षक दवाओं और नकली इंसुलिन बनाने के मामले भी शामिल हैं।
हैरानी की बात है कि इन दवाओं के रैपर और पैकेजिंग हूबहू असली ब्रांड जैसे पाए गए जिसकी वजह से आम ग्राहकों का इन्हें पहचान पाना मुश्किल था।
क्यों नहीं खत्म होती यह समस्या?
WHO का मानना है कि कई देशों में इस तरह के आपराधिक गिरोंहो को रोकने के लिए जरूरी संसाधन नहीं हैं। दूसरी बात यह है कि इस तरह का काम करने वाले लोग हूबहू असली जैसी पैकिंग और कई ऐसे तरीकों का इस्तेमाल करते हैं जिससे इनकी पहचान कर पाना मुश्किल होता है। साथ ही, ऑनलाइन डिलीवरी सिस्टिम के जरिए इनकी सप्लाई होने के चलते ये सीधे ग्राहकों तक पहुंच जाती हैं और कम कीमत के कारण ग्राहक भी इनके प्रति आकर्षित होते हैं।
एक और कारण है कि कई देशों में असली दवाएं महंगी होने के चलते इस तरह के अपराधियों को मौका मिलता है। वे सरकारी अधिकारियों और पुलिस तक के लोगों को पैसे देकर अपना काम निकाल लेते हैं और आसानी से ऐसी दवाएं मार्केट में आ जाती हैं।
