इन दिनों चीनी की कीमतों को लेकर हंगामा मचा हुआ है। महंगी होती चीनी की खबरों के बीच सरकार दावा कर रही है कि चीनी की कमी नहीं है। सरकारी राशन की दुकानों पर अभी भी 13 से 14 रुपये में ही चीनी मिल रही है जबकि बाजार में चीनी की कीमत 65 रुपये किलो तक पहुंच गई है। राशन की यही दुकानें हर महीने करोड़ों रुपये का अनाज भी बांटती हैं। कुछ साल पहले तक मिट्टी का तेल भी इन्हीं दुकानों पर बंटा करता था। इसके लिए एक पूरी व्यवस्था बनी हुई है जिसे पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम (PDS) कहा जाता है।
PDS के लिए राशन उपलब्ध कराने के लिए सरकार किसानों से गेहूं और धान जैसे अनाज खरीदती है। चीनी मिलों से चीनी खरीदी जाती है और जरूरत पड़ने पर अन्य चीजें भी खरीदी जाती हैं। इसके लिए ग्रामसभा या मोहल्ले के स्तर पर दुकानें बनाई गई हैं। बड़े-बड़े गोदाम बनाए गए हैं और पूरा एक सप्लाई सिस्टम है ताकि लोगों तक ये चीजें पहुंचाई जा सकें। इसी PDS के जरिए हर महीने करोड़ों लोगों को मुफ्त अनाज भी बांटा जा रहा है। हालांकि, यह सिस्टम एक झटके में नहीं तैयार हुआ है। इसके पीछे कुछ ऐतिहासिक परिस्थितियां रही हैं जिनके चलते इसकी शुरुआत हुई और आज तक यह सिस्टम जारी है।
कैसे हुई राशनिंग की शुरुआत?
बात है देश की आजादी से पहले की। सन 1940 के आसपास का समय था और दुनिया में दूसरे विश्व युद्ध की शुरुआत हो गई थी। तब भारत अनाज के मामले में इतना संपन्न नहीं था जितना अब है। आर्थिक असमानता हद से ज्यादा थी और एक बड़े वर्ग के पास अपनी जमीन तक नहीं थी कि वह उसमें खेती करके अनाज उगा सके और खा सके। उसी समय बंगाल में भुखमरी जैसी स्थिति पैदा हो गई। अंग्रेजों का शासन था और वे खुद विश्व युद्ध में परेशान थे। भारत के लोगों को भी लड़ने भेजा गया था तो यहां व्यवस्था अंग्रेजों को ही संभालनी थी। ऐसी स्थिति में 1 दिसंबर 1942 को गवर्नर जनरल काउंसिल ने खाद्य विभाग बनाया। इसकी जिम्मेदारी एक वरिष्ठ सदस्य बेंजामिन जॉर्ज होल्ड्सवर्थ को मिली और वह फूड सेक्रेटरी बनाए गए।
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इस औपचारिक शुरुआत से पहले साल 1939 में मुंबई में PDS की शुरुआत हुई थी। तब लोगों को राशन कार्ड दिए गए थे और गेहूं और चावल जैसी चीजें बांटी गईं। 1943 के अंत तक 13 और 1946 तक कुल 771 शहरों में यह व्यवस्था शुरू कर दी गई थी। जब दूसरा विश्व युद्ध खत्म हो गया तो भारत में भी राशनिंग सिस्टम खत्म कर दिया गया लेकिन भारत को आजादी मिलने के बाद फिर से इसे शुरू किया गया। तब कारण यह था कि दुनियाभर में अनाज की कीमतें बढ़ रही थीं और आर्थिक स्तर पर कमजोर लोगों के लिए खाना खरीद पाना ही मुश्किल होने लगा था।
1951 में जब भारत ने अपने विकास की योजना बनाई तो PDS को वरीयती दी गई। देश के विकास के लिए इसे बेहद अहम माना गया। पहली पंचवर्षीय योजना में ही PDS को देश के गांवों तक पहुंचाने की कोशिश की गई ताकि अनाज की कमी को दूर किया जा सके। उस वक्त गेहूं और चावल के अलावा केरोसिन तेल, खाने का तेल, कोयला और चीनी जैसी चीजें इन दुकानों पर उपलब्ध कराई गईं।
आजादी के बाद का इतिहास
जब भारत आजाद हो गया तो 29 अगस्त 1947 को इसी खाद्य विभाग का नाम बदलकर खाद्य मंत्रालय बनाया गया। तब चीनी और वनस्पति निदेशालय इसी खाद्य मंत्रालय का हिस्सा था। 1 फरवरी 1952 को कृषि और खाद्य मंत्रालय को एक करके खाद्य एवं कृषि मंत्रालय बना दिया गया। हालांकि, 14 साल के बाद अक्तूबर 1956 खाद्य मंत्रालय और कृषि मंत्रालय नाम के दो अलग मंत्रालय बनाए गए। अगले ही साल यानी 17 अप्रैल 1957 को दोनों को फिर से एक कर दिया गया। 30 दिसंबर 1958 को सेंट्रल एंड स्टेट वेयरहाइउसिंग कार्पोरेशन के काम भी इसी मंत्रालय के खाद्य विभाग को सौंप दिए गए।
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1960 में इसी मंत्रालय के तहत दो विभाग बनाए गए। खाज्य विभाग का काम अनाज जुटाना और बांटना था। अनाज के आयात, निर्यात, राज्यों को सप्लाई और समन्वय का काम भी इसी विभाग के पास था। चीनी और वनस्पति विभाग भी इसी विभाग के अंतर्गत था। 1965 में इसी विभाग के तहत फूड कार्पोरेशन आफ इंडिया (FCI) का गठन हुआ।
1991 के जून महीने में अलग से खाद्य मंत्रालय बनाया गया। 1992 में इसके भी दो विभाग बनाए गए। एक विभाग था फूड का और दूसरा था फूड प्रोक्योरमेंट और डिस्ट्रीब्यूशन का। 1997 में खाद्य मंत्रालय और सिविल सप्लाईज मंत्रालय को एक करके फूड एंक कंज्यूमर अफेयर्स मंत्रालय बना। इसमें फूड एंड सिविल सप्लाईज, शुगर एंड एडिबल आयल्स और कंज्यूमर अफेयर्स नाम के तीन विभाग बने।
15 अक्तूबर 1999 को इसी का नाम बदलकर कंज्यूमर अफेयर्स एंड पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन मिनिस्ट्री रख दिया गया। विभाग वही 2 रहे। आखिर में 17 जुलाई 2000 को फिर से नाम बदला और कंज्यूमर अफेयर्स, फूड एंड पब्लिक डिस्ट्रीब्ययूशन नाम रखा गया और अभी भी इसी नाम से यह मंत्रालय चल रहा है।
