संसद से सड़क तक छात्रों की आवाज गूंज रही है। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने नीट पेपर लीक और छात्रों के अन्य मुद्दों पर 20 जुलाई को 'चलो संसद' मार्च की कॉल दी थी। इस मार्च में भारी संख्या में युवा पहुंचे और दिल्ली पुलिस ने बल का प्रयोग करके प्रदर्शन कर रहे छात्रों को खदेड़ा। छात्रों पर लाठीचार्ज के बाद सरकार की मुश्किलें और ज्यादा बढ़ गई। कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दल जो अब तक अपने तरीके से इस मुद्दे पर प्रदर्शन कर रहे थे वे सभी अब सडकों पर उतर आए। राहुल गांधी समेत कई कांग्रेस नेता पीएम मोदी के आवास के बाहर प्रदर्शन करने पहुंचे और कई नेता जंतर-मंतर सीजेपी के प्रदर्शन में पहुंचे। हालांकि, यह पहला ऐसा आंदोलन नहीं है जिसने सरकार की मुश्किलें बढ़ाई हैं।
भारत के इतिहास में आजादी से पहले भी और बाद भी कई ऐसे छात्र आंदोलन हैं जिन्होंने सरकारों की मुश्किलें बढ़ाई और कई बार छात्रों के प्रदर्शन ने सरकारों से अपनी मांगों को मानने पर मजबूर किया। छात्रों के इन प्रदर्शनों के कारण लालू, नीतिश जैसे कई बड़े नेता भी बने और कई नेताओं की कुर्सियां भी गई। अब छात्रों की नजर मौजूदा शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की कुर्सी पर है।
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जब छात्र आंदोलन से गिरी सरकार
साल 1973 के दिसंबर महीने में अहमदाबाद के एल.डी. कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग के छात्रों ने हॉस्टल के मेस बिल में भारी बढ़ोतरी के विरोध में हड़ताल शुरू की थी। सिर्फ मेस बिल में बढ़ोतरी के साथ शुरू हुआ यह छात्र आंदोलन कुछ ही समय में जनआंदोलन बन गया। यह आंदोलन मेस बिल से आगे बढ़कर भ्रष्टाचार और बढ़ती महंगाई के खिलाफ आंदोलन बन गया था।
छात्रों ने 'नवनिर्माण युवक समिति' का गठन किया और राज्य भर में रैलियां, भूख हड़ताल और जनता कर्फ्यू जैसे अनोखे विरोध प्रदर्शन किए। व्यापक जन आक्रोश और हिंसक झड़पों के कारण, फरवरी 1974 में तत्कालीन मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा और गुजरात में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया। स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह पहला अवसर था जब जन दबाव में किसी निर्वाचित सरकार को गिरा दिया गया था।
जेपी आंदोलन
970 के दशक में बढ़ती बेरोजगारी, व्यापक भ्रष्टाचार और खाद्यान्न संकट ने आम जनता को परेशान कर दिया था। इसी समय गुजरात में नवनिर्माण आंदोलन हुआ और इस आंदोलन से प्रेरणा लेकर बिहार में भी आंदोलन हुआ। महंगाई, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी के खिलाफ छात्रों ने आंदोलन शुरू किया। बाद में समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण ने इस आंदोलन का नेतृत्व किया और इसे संपूर्ण क्रांति का स्वरूप दिया। यह आंदोलन इतना बड़ा हो गया था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार पर जबरदस्त दबाव बना। इसके बाद देश में इमरजेंसी लगी और इसके बाद हुए 1977 के आम चुनाव में कांग्रेस पार्टी सत्ता से बाहर हो गई।
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असम में छात्रों का आंदोलन
असम में वैसे तो छात्रों ने कई आंदोलन किए हैं लेकिन असम आंदोलन के नाम से 1979 से 1985 के बीच हुए छात्र आंदोलन ने सबसे ज्यादा असर छोड़ा। इस आंदोलन को 'विदेशी विरोधी आंदोलन' भी कहा जाता है। वर्ष 1979 में मंगलदोई लोकसभा उपचुनाव के दौरान मतदाता सूची में बड़ी संख्या में संदिग्ध और अवैध प्रवासियों के नाम पाए गए। इससे असमिया समुदाय में अपनी जनसांख्यिकी और संस्कृति खोने का डर पैदा हो गया था। इसी डर से ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (AASU) के नेतृत्व में विदेशी नागरिकों की पहचान और निष्कासन की मांग को लेकर आंदोलन शुरू हो गया।
इस 6 साल लंबे संघर्ष में लगभग 855 से अधिक लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। 15 अगस्त 1985 की रात को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की उपस्थिति में केंद्र सरकार और छात्र नेताओं के बीच ऐतिहासिक असम समझौता हुआ। इसके तहत 25 मार्च 1971 के बाद असम में आने वाले अवैध प्रवासियों की पहचान कर उन्हें निर्वासित करने का निर्णय लिया गया। इन आंदोलनों के अलावा भी कई बड़े छात्र आंदोलन हुए हैं जिन्होंने राजनीति पर गहरा असर छोड़ा है।
