श्रीनगर में इस साल ज्यादा संख्या में तीर्थयात्री अमरनाथ यात्रा में शामिल हुए। सभी तीर्थयात्री बर्फीली गुफा के दर्शन के लिए यात्रा कर रहे थे लेकिन गुफा के बर्फ का शिवलिंग पिघल गया। अमरनाथ गुफा का पवित्र बर्फीली  शिवलिंग यात्रा शुरू होने के ठीक 5 दिनों में ही पिघल गया। बर्फीली  शिवलिंग का पिघलना जलवायु परिवर्तन का घातक संकेत देता है। हिमशिला के पिघलने को लेकर जम्मू- कश्मीर के विपक्ष के नेताओं ने दुख व्यक्त किया है।

 

पिछले साल पहलगाम में आतंकी हमला हुआ था, जिसके बाद जम्मू-कश्मीर में टूरिज्म कम हो गया। उसके बाद अमरनाथ यात्रा में हजारों की संख्या में श्रद्धालु तीर्थयात्रा करने पहुंचे हैं। जानकारी के मुताबिक, यह यात्रा 3 जुलाई को शुरू हुई थी, जो हर साल रक्षाबंधन के दिन खत्म होती है। अब सवाल उठता है कि किस वजह से अमरनाथ गुफा का बर्फ का शिवलिंग पिघल गया।

 

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किस वजह से पिघल गया शिवलिंग?

 

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस साल यात्रा शुरू होते ही अमर गुफा की बर्फ पिघलने लगी थी। 23 मई को शिवलिंग की ऊंचाई लगभग 7 फीट थी। इसके बाद 29 जून को बर्फ का शिवलिंग घटकर 5 फीट रह गया। यात्रा शुरू होने के बाद भी बर्फ पिघलना जारी रहा।

 

यह पहली बार नहीं हुआ है, जब अमरनाथ यात्रा शुरू होने के कुछ दिन बाद गुफा का बर्फ का शिवलिंग पिघल गया हो। इससे पहले 2004, 2006, 2007, 2016 और 2020 में भी यात्रा शुरू होने के कुछ दिन बाद हिमशिला पिघल गई थी। 2016 में यात्रा शुरू होने के 10 दिन बाद ही अमरनाथ गुफा का हिम शिवलिंग पिघल गया था।

 

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वैज्ञानिकों ने कई बार दावा किया है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से हिमालय, विश्व के बाकी पर्वतीय इलाकों की तुलना में तेजी से गर्म हो रहा है। हालांकि, गुफा की बर्फ पिघलने का एकमात्र कारण जलवायु परिवर्तन ही नहीं है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, कई लोगों का मानना है कि इस साल गुफा के आसपास लाखों की तादाद में भक्त पहुंचे थे, जिस कारण वहां गर्मी बढ़ गई और बर्फ पिघलने लगी। हालांकि, अभी तक गुफा की बर्फ पिघलने की वजह पर वैज्ञानिकों की कोई आधिकारिक रिपोर्ट नहीं आई है।

 

नेताओं ने तीर्थयात्री प्रबंधन पर उठाए सवाल

पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की इल्तिजा मुफ्ती ने अमरनाथ गुफा के बर्फ के शिवलिंग के पिघलने पर चिंता व्यक्त की थी। उन्होंने अमरनाथ यात्रा के मैनेजमेंट पर सवाल उठाए। इल्तिजा ने आरोप लगाया कि नियमों के मुताबिक हर दिन 10,000 लोग ही यात्रा में आ सकते थे, जबकि हकीकत में इससे ज्यादा लोग तीर्थयात्रा में शामिल हुए थे।