हाल ही में मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले के ब्यावरा में रहने वाले बिट्टू तबाही यानी सुरेंद्र सिंह चौधरी ने खूब चर्चा बटोरी। ब्यावरा में बहने वाली नदी अजनार को साफ करने के चलते चर्चा में आए बिट्टू तबाही ने कई महीनों में नदी में जमा कचरे को साफ किया और अब यही नदी काफी हद तक साफ दिख रही है। बिट्टू तबाही के इस काम ने तारीफ तो बटोरी लेकिन एक बार फिर से नदियों का प्रदूषण चर्चा में आ गया। बिट्टू तबाही के पुराने वीडियो में भी देखा जा सकता है कि नदी में प्लास्टिक का कचरा भरा हुआ था। ऐसा ही कई और नदियों में देखा जाता है। यह प्लास्टिक कचरा खुली जगहों, डंपिंग साइट, नालियों, नदियों और अन्य जलाशयों में भरता जा रहा है। इसका असर जलभराव, जलवायु परिवर्तन और बढ़ती बीमारी के रूप में देखने को मिल रहा है।
बीते कुछ साल में प्लास्टिक का इस्तेमाल घटने के बजाय और बढ़ गया है। भारत सरकार ने इसी साल संसद में बताया था कि भारत में साल 2020-21 में 41.26 लाख टन, 2021-22 में 39.01 लाख और 2022-23 में 42.36 लाख टन प्लास्टिक कचरा पैदा हुआ। इस हिसाब से हर भारतीय 3.6 किलोग्राम प्लास्टिक कचरा पैदा करता है। यह मात्रा हर साल बढ़ती ही जा रही है। इसमें से लगभग 60 प्रतिशत कचरे की ही रीसाइकलिंग हो पाती है जिसके चलते 40 प्रतिशत कचरा खुले डंपिंग ग्राउंड, लैंडफिल, खाली पड़ी जमीनों, नालियों, नालों और नदियों में फेंक दिया जाता है।
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आम जिंदगी कैसे पैदा करती है प्लास्टिक कचरा?
सुबह जब आप सोकर उठते हैं तो सबसे पहले ब्रश का इस्तेमाल करके दांत साफ करते हैं। टूथब्रथ और टूथपेस्ट की ट्यूब दोनों ही प्लास्टिक की बनी होती है। बाथरूम में इस्तेमाल होने वाले शैंपू के बोतल या पैकेट, साबुन के रैपर और अन्य सामान भी प्लास्टिक के ही बने होते हैं। बाथरूम से निकलकर किचन में पहुंचें तो वहां आने वाला पैकेज्ड दूध प्लास्टिक की थैली में आता है। किचन में आने वाली ज्यादातर सब्जियां प्लास्टिक के पैकेट या पन्नियों में पैक होकर मिलती हैं। पूजा में इस्तेमाल होने वाली चीजें भी प्लास्टिक के ही पैकेट में पैक होती हैं।
इसी तरह खाना बनाने में इस्तेमाल होने वाले मसाले, तेल, पैकेज्ड फूड आइटम्स, स्नैक्स आदि भी प्लास्टिक के ही पैकेट में आते हैं। दवाएं, कपड़े, जूते और बाजार में मिलने वाली तमाम अन्य वस्तुएं भी ज्यादातर बार प्लास्टिक के पैकेट में मिलती हैं। अब नतीजा यह होता है कि हर दिन जब आपके घर से कचरा निकलता है तो उसमें एक बड़ा हिस्सा प्लास्टिक का होता है।
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अब महानगरों में निकला यह कूड़ा तो प्रोसेसिंग प्लांट तक जाता है और वहां इसे रीसायकल भी किया जा सकता है। हालांकि, छोटे शहरों और गांवों में यह कचरा कहीं न कहीं फेंक दिया जाता है। धीरे-धीरे यही कचरा जमा होने लगता है और यह प्लास्टिक सड़ता भी नहीं है। लंबे समय से जमीन पर पड़ा प्लास्टिक मिट्टी की गुणवत्ता को प्रभावित करता है, जलभराव का कारण बनता है और कई बार बारिश के समय बहकर नदी, नालों से होते हुए समुद्र तक भी पहुंच जाता है।
कहां पैदा हो रहा सबसे ज्यादा प्लास्टिक कचरा?
भारत में पैदा होनेवाले कुल प्लास्टिक कचरे में 13.5 प्रतिशत हिस्सेदारी कर्नाटक की, 12.7 प्रतिशथ तेलंगाना की, 10.2 प्रतिशत तमिलनाडु की औऱ 9.7 प्रतिशथ दिल्ली की है। इसके अलावा यूपी में 9.7 प्रतिशत, गुजरात में 8.1 प्रतिशत और महाराष्ट्र में 7.5 प्रतिशत कचरा पैदा होता है।
कितना हो पाता है मैनेजमेंट?
संसद में दिए एक जवाब में केंद्र सरकार ने बताया था कि 5 दिसंबर 2024 तक भारत में सिर्फ 978 ऐसी यूनिट थीं जहां प्लास्टिक कचरे की प्रोसिसिंग या रीसायकलिंग की जा सकती थी। सबसे ज्यादा 326 यूनिट तमिलनाडु में, आंध्र प्रदेश में 139, बिहार में 102 यूनिट, उत्तर प्रदेश में 68, उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल में 51-51, केरल में 48, जम्मू-कश्मीर में 43 और महाराष्ट्र में सिर्फ 41 यूनिट थीं। हैरानी की बात है कि गुजरात, हरियाणा, मणिपुर, राजस्थान, त्रिपुरा और असम समेत कुल 13 राज्य या केंद्र शासित प्रदेश ऐसे थे जहां एक भी ऐसी यूनिट नहीं थीं। NITI आयोग ने ही 2023 में अपनी एक रिपोर्ट में माना था कि सिर्फ 17 प्रतिशत परिवारों में ही कचरे को अलग-अलग रखा जाता है।
ये आकंड़े गवाही दे रहे हैं कि भारत में प्लास्टिक का कचरा जिस रफ्तार से बढ़ रहा है, उसकी तुलना में प्लास्टिक के विकल्प या प्लास्टिक की रीसायकलिंग नहीं बढ़ रही है। आसान उपलब्धता और कम कीमत के कारण प्लास्टिक की पैकिंग ही सबसे ज्यादा इस्तेमाल हो रही है। इसे रोकने की दिशा में किए जाने वाले काम नाकाफी हैं और यह बात हर दिन दिखने वाली गंदगी से जाहिर है। अगर यही रफ्तार रहती है और ऐसे ही प्लास्टिक का कचरा खुली जगहों, नदी-नालों और अन्य जगहों पर फेंका जाता रहा तो बिट्टू तबाही जैसे लाखों युवा मिलकर भी शायद इन प्राकृतिक जगहों को साफ नहीं कर पाएंगे।
