राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम' और राष्ट्रगान 'जन गण मन' के अंतर को लेकर एक बार फिर चर्चा छिड़ गई है। इसी बीच सीनियर एक्ट्रेस शर्मिला टैगोर ने इस पर अपनी राय रखी। उनका बयान सामने आने के बाद एक्ट्रेस कंगना रनौत ने अपनी प्रतिक्रिया दी। कंगना ने कहा कि एक आर्टिस्ट के तौर पर शर्मिला जी के ऐसे सीमित विचार देखकर उन्हें झटका लगा है। कंगना ने उनसे हिंदू-मुस्लिम सोच से बाहर आने की अपील की।

 

'वंदे मातरम' को 1870 के दशक में बंकिम चंद्र चटर्जी ने लिखा था और यह उनके उपन्यास 'आनंदमठ' में शामिल था। यह आजादी के आंदोलन में एक बड़ा नारा बना। इस गीत के पहले दो पद देश की खूबसूरती और जमीन की तारीफ करते हैं। बाद के चार पदों में दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती जैसी हिंदू देवियों का जिक्र है। अभी बहस इस बात पर है कि क्या इसके सभी पदों को एक जैसा माना जाए। कुछ लोगों का कहना है कि यह देश की भावना और आजादी की लड़ाई का प्रतीक है जबकि कुछ मानते हैं कि हिंदू देवी-देवताओं के जिक्र के कारण दूसरे धर्मों के लोगों के लिए इसे पूरा अपनाना मुश्किल हो सकता है।

 

यह भी पढ़ें: पहले डिजिटल अरेस्ट, फिर 42 लाख रुपये ऐंठे, बुजुर्ग अफसर को लूट ले गए डिजिटल ठग

शर्मिला टैगोर का बयान

शर्मिला टैगोर ने एक इंटरव्यू में अपना पक्ष रखते हुए कहा, 'मेरा मानना है कि कई धार्मिक लोग सिर्फ एक भगवान को मानते हैं, बहुत से भगवानों को नहीं। 'वंदे मातरम' के एक हिस्से में कई देवी-देवताओं का जिक्र है।' उन्होंने आगे कहा, 'जो लोग सिर्फ एक ईश्वर में विश्वास रखते हैं, उनके लिए 'वंदे काली, वंदे दुर्गा' कहना आसान नहीं होता। इसलिए अगर हम देश के सभी धर्मों के लोगों को साथ लेकर चलना चाहते हैं, तो इस गीत के पहले दो पद ही सबसे सही और बेहतर हैं।'

कंगना रनौत का जवाब

कंगना रनौत ने शर्मिला टैगोर के इंटरव्यू का वीडियो अपनी इंस्टाग्राम स्टोरी पर शेयर करते हुए लिखा, 'मैं इस बात की तारीफ करती हूं कि शर्मिला जी ने वंदे मातरम पर अपनी हिचकिचाहट के बारे में बात की है लेकिन एक कलाकार के तौर पर मुझे यह देखकर झटका लगा है कि कला या कविता को लेकर उनकी सोच इतनी सीमित कैसे हो सकती है। किसी भी कविता या गाने में शब्द सिर्फ एक इशारा होते हैं। एक कवि या कलाकार अपनी बात का गहरा असर छोड़ने के लिए हर तरह की कल्पनाओं और मिसालों का इस्तेमाल करता है। वंदे मातरम आजादी की लड़ाई की भावना है। बंकिम चंद्र जी देश को अपने अंदर की शक्ति को जगाने के लिए कह रहे हैं। आप कला की इतनी बड़ी रचना को सिर्फ एक धार्मिक काम तक कैसे सीमित कर सकती हैं?'

 

यह भी पढ़ें: NALSAR ने CJI सूर्यकांत को बनाया चीफ गेस्ट, छात्रों का डिग्री लेने से इनकार

स्वामी विवेकानंद का उदाहरण

कंगना ने आगे लिखा, 'स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि मुझे ऐसे युवा चाहिए जिनकी मांसपेशियां लोहे की, हड्डियां स्टील की और नसें बिजली जैसी मजबूत हों। वह मौसम का हाल नहीं बता रहे थे, वह सिर्फ लोगों से अपनी अंदरूनी शक्ति को जगाने की मांग कर रहे थे। कृपया इस हिंदू-मुस्लिम सोच से बाहर आएं। भले ही हम एक ही भगवान को मानते हों लेकिन डॉक्टर भी ताकत को शक्ति ही कहते हैं। आइए हम सब एक-दूसरे को अपनों की तरह गले लगाएं। मैं आपसे बहुत प्यार करती हूं और आपसे मिलने वाली प्यार भरी झप्पी से मुझे कोई ऐतराज नहीं है, जैसी आप हमेशा मुझे देती हैं।'