राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस (RSS) पर एक बार फिर राजनीतिक बहस छिड़ गई है। कर्नाटक के गृहमंत्री प्रियांक खड़गे ने हाल ही में कहा कि उनकी सरकार ऐसा कानून बनाने पर विचार कर रही है, जिसके तहत RSS जैसे संगठनों के लिए रजिस्ट्रेशन कराना जरूरी होगा। इन कानून से उनकी फंडिंग, ऑडिट और जवाबदेही तय होगी। उन्होंने सवाल उठाया है कि देश का सबसे बड़ा सामाजिक और सांस्कृतिक संगठन बिना रजिस्ट्रेशन के कैसे काम कर रहा है। प्रियांक खड़गे ने संगठन पारदर्शिता, फंडिंग और ऑडिट को लेकर भी चिंता जताई है।
बता दें कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) को स्थापना से लेकर अब तक 100 से अधिक साल लगभग 101 साल पूरे हो चुके हैं। भारत में ऐसा कोई कानून नहीं है, जो हर सामाजिक संस्था के लिए रजिस्ट्रेशन कराना जरूरी बनाता हो। हालांकि, कोई संस्था चाहे तो अपना रजिस्ट्रेशन करा सकती है लेकिन हर संस्था के लिए ऐसा करना जरूरी नहीं है।
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क्या हर संगठन का रजिस्ट्रेशन जरूरी होता है?
भारत में कोई भी सामाजिक संगठन कई तरह से काम कर सकता है। चाहे वह सोसायटी, ट्रस्ट या कंपनी के रूप में रजिस्ट्रेशन कराए, या फिर लोगों का एक साधारण समूह बनकर काम करे। हर संगठन के लिए रजिस्ट्रेशन कराना कानूनन जरूरी नहीं होता। इसलिए कुछ संगठन बिना रजिस्ट्रेशन के भी काम कर सकते हैं। भारत में फिलहाल ऐसा कोई आम कानून नहीं है जो किसी भी स्वैच्छिक संगठन को सोसाइटी, ट्रस्ट या कंपनी के तौर पर रजिस्टर करने के लिए मजबूर करे। उनके पास इसका विकल्प जरूर होता है।
कर्नाटक सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1960 भी किसी संगठन को रजिस्ट्रेशन कराने के लिए मजबूर नहीं करता। यह कानून सिर्फ यह सुविधा देता है कि अगर कोई संस्था चाहे तो अपना रजिस्ट्रेशन करा सकती है। इसमें कहीं भी यह नहीं लिखा है कि हर सामाजिक या स्वैच्छिक संगठन के लिए रजिस्ट्रेशन कराना जरूरी है। इसलिए मौजूदा कानून के तहत RSS बिना रजिस्ट्रेशन के भी काम कर सकता है और इसमें कोई कानूनी दिक्कत नहीं है।
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RSS का क्या कहना है?
RSS का कहना है कि वह कोई कंपनी या सोसायटी नहीं, बल्कि स्वयंसेवकों का संगठन है। इसलिए मौजूदा कानून उसे रजिस्ट्रेशन कराने के लिए मजबूर नहीं करते। कर्नाटक के मंत्री प्रियांक खड़गे के सवाल पर RSS प्रमुख मोहन भागवत ने भी कहा कि हर चीज का रजिस्ट्रेशन नहीं होता। उन्होंने कहा कि जिन संस्थाओं को सरकार से पैसा या मदद लेनी होती है, उन्हें रजिस्ट्रेशन की जरूरत पड़ती है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि अगर कोई संगठन रजिस्टर्ड नहीं है, तो उसके बैंक खाते किसके नाम पर चलते हैं? उसकी जमीन या इमारतें किसके नाम होती हैं? अगर कोई कानूनी विवाद हो जाए, तो जिम्मेदार किसे माना जाएगा? संगठन के पैसे का हिसाब-किताब कैसे रखा जाता है? यही सवाल इस बहस का सबसे बड़ा मुद्दा बने हुए हैं।
3 बार लग चुका है बैन
RSS पर 3 बार बैन भी लग चुका है, पहली बार 1948 में, जब महात्मा गांधी की हत्या के बाद संघ को इससे जोड़कर देखा गया था। उस समय 30 जनवरी 1948 को तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल द्वारा प्रतिबंध लगाया गया था, जो 11 जुलाई 1949 को कुछ शर्तों के साथ हटाया गया। दूसरी बार 1975 में, जब देश में आपातकाल लगी थी, उस दौरान राजनीतिक गतिविधियों और विरोध के अंदेशे के चलते यह कार्रवाई हुई। 4 जुलाई 1975 को प्रतिबंध लगा, जो आपातकाल समाप्त होने के बाद 1977 में हटाया गया। तीसरी बार 1992 में, जब अयोध्या में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद की परिस्थितियां नाजुक हो गई थीं। उस समय 10 दिसंबर 1992 को RSS पर प्रतिबंध लगाया गया, जिसे जून 1993 में ट्रिब्यूनल के फैसले के बाद हटा लिया गया।
बगैर रजिस्ट्रेशन कैसे काम कर रहा RSS?
ऐसा नहीं है कि RSS से जुड़ी हर संस्था भी बिना रजिस्ट्रेशन के है। RSS से जुड़े कई ट्रस्ट, सोसायटी और अन्य संगठन अलग-अलग कानूनों के तहत रजिस्टर्ड हैं। शिक्षा, सेवा, प्रकाशन, अस्पताल, स्कूल, बैंक खाते, संपत्ति और अन्य प्रशासनिक काम अक्सर इन्हीं पंजीकृत संस्थाओं के जरिए चलाए जा रहे हैं। यही वजह है कि RSS का केंद्रीय संगठन भले रजिस्टर्ड न हो, लेकिन उससे जुड़े कई काम कानूनी रूप से पंजीकृत संस्थाओं के माध्यम से किए जाते हैं।
बैंक, जमीन और पैसा कैसे मैनेज होता है?
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, जब जमीन खरीदनी होती है, भवन बनाना होता है, बैंकिंग या दूसरे कानूनी काम करने होते हैं, तो RSS से जुड़े अलग-अलग रजिस्टर्ड ट्रस्ट और सोसायटी यह काम संभालते हैं। उदाहरण के तौर पर, नई दिल्ली स्थित RSS मुख्यालय भी एक रजिस्टर्ड ट्रस्ट के जरिए चल रहा है। संघ की ज्यादातर सहयोगी संस्थाएं रजिस्टर्ड हैं, आयकर नियमों का पालन करती हैं, उनका ऑडिट होता है और वे अपनी-अपनी कानूनी व्यवस्था के तहत काम करती हैं।
RSS ही नहीं, कई अन्य संस्थाओं का नहीं है रजिस्ट्रेशन
ऐसा नहीं है कि बिना रजिस्ट्रेशन काम करने वाला सिर्फ RSS ही है। भारत में कई अखाड़े, धार्मिक समूह, संप्रदाय और सामाजिक संगठन भी बिना रजिस्ट्रेशन के काम करते हैं। RSS का मामला अलग माना जाता है।यह करीब 100 साल पुराना और देशभर में सक्रिय बड़ा संगठन है। इसकी हजारों शाखाएं हैं, कई पूर्णकालिक प्रचारक काम करते हैं, बड़े स्तर पर कार्यक्रम होते हैं और लोगों से आर्थिक सहयोग भी मिलता है। इसलिए कुछ लोग सवाल उठाते हैं कि इतने बड़े संगठन की जवाबदेही और वित्तीय व्यवस्था किस कानूनी ढांचे के तहत तय होती है। कर्नाटक सरकार के प्रस्ताव के बाद यह बहस फिर तेज हो गई है कि क्या देश के बड़े सामाजिक और स्वैच्छिक संगठनों के लिए रजिस्ट्रेशन अनिवार्य होना चाहिए।
