CBSE के ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) सिस्टम को लेकर उठे विवाद के बीच 17 वर्षीय छात्र सार्थक सिद्धांत राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गए हैं। कक्षा 12 के इस छात्र को संसद की शिक्षा, महिला, बाल, युवा एवं खेल मामलों की स्थायी समिति के सामने अपनी बात रखने के लिए बुलाया गया। आमतौर पर ऐसी समितियों के सामने वरिष्ठ अधिकारी और विशेषज्ञ पेश होते हैं लेकिन इस बार एक छात्र की प्रस्तुति ने सभी का ध्यान अपनी ओर खींच लिया।

 

सार्थक सिद्धांत ने CBSE की मूल्यांकन प्रक्रिया और उससे जुड़े टेंडर दस्तावेजों का अध्ययन करने के बाद कई सवाल उठाए थे। उनके दावों और विश्लेषण ने सोशल मीडिया पर व्यापक बहस छेड़ दी, जिसके बाद संसदीय समिति ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए उन्हें अपनी बात रखने का अवसर दिया।

 

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उत्तर पुस्तिका से शुरू हुई जांच

सार्थक 2025-26 बैच के कक्षा 12 के छात्र हैं। उनका कहना है कि जब उन्हें अपनी उत्तर पुस्तिका की स्कैन कॉपी मिली तो वह धुंधली और अधूरी थी। इसी अनुभव के बाद उन्होंने CBSE की ऑन-स्क्रीन मार्किंग प्रक्रिया को समझने का फैसला किया। जांच के दौरान उन्होंने सार्वजनिक रूप से उपलब्ध टेंडर दस्तावेजों का अध्ययन शुरू किया और कई जानकारियां जुटाईं।

 

सार्थक का दावा है कि उन्होंने सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध CBSE के 576 टेंडरों की समीक्षा की। इसके बाद उन्होंने अपने निष्कर्ष एक ब्लॉग के माध्यम से सार्वजनिक किए। ब्लॉग में उन्होंने आरोप लगाया कि ऑन-स्क्रीन मार्किंग से जुड़े टेंडर की कुछ शर्तों में बदलाव कर एक निजी कंपनी को फायदा पहुंचाया गया। उन्होंने टेंडर प्रक्रिया में करीब 15 कथित विसंगतियों का भी उल्लेख किया, जिससे यह मामला और चर्चा में आ गया।

 

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संसदीय समिति ने सुनी छात्र की बात

सार्थक के दावों के बाद संसद की स्थायी समिति ने उन्हें प्रस्तुति देने के लिए आमंत्रित किया। कांग्रेस सांसद दिग्विजय सिंह की अध्यक्षता वाली समिति ने उनकी बात सुनने के साथ-साथ CBSE और शिक्षा मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों से भी जानकारी ली। अब समिति उपलब्ध दस्तावेजों और अधिकारियों के जवाबों की समीक्षा करेगी। इस पूरे घटनाक्रम ने परीक्षा मूल्यांकन प्रणाली की पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर नई बहस छेड़ दी है।