दिल्ली के सत्य निकेतन में रविवार को एक इमारत ढहने से 7 लोगों की मौत हो गई। इस हादसे के बाद दिल्ली हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है। याचिका में मांग की गई है कि हादसे की जांच कराई जाए, हादसा क्यों हुआ इसका पता लगाया जाए। हादसे के बाद सिर्फ  सत्य निकेतन ही नहीं, विजय नगर, कमला नगर, करोल बाग जैसे कई इलाकों में पुरानी इमारते हैं, जो गिरने की कगार पर पहुंच गई हैं लेकिन यहां सैकड़ों छात्र रहते हैं। 

सत्य निकेतन में हुए इस हादसे के बाद से ही अब दिल्ली के उन इलाकों को लेकर सवाल उठ रहे हैं, जहां जर्जर निर्माण हैं और हादसे से बस कुछ कदम दूर हैं। दिल्ली के ही चावड़ी बाजार इलाके में कई इमारतें ऐसी हैं, जो तय मानकों के हिसाब से नहीं बनाई गईं हैं, जिनके गिरने की आशंका सबसे ज्यादा है। सिर्फ दिल्ली ही नहीं, देश के कई महानगर ऐसे खतरे के मुहाने पर खड़े हैं।

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धंस रही है महानगरों की जमीन

नेचर सस्टेनेबिलिटी जर्नल में छपी एक नई स्टडी ने भारत के पांच बड़े महानगरों में जमीन धंसने और इमारतों को होने वाले संभावित नुकसान को लेकर चिंता जताई है। शोधकर्ताओं ने सैटेलाइट रडार डेटा के जरिए दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, बेंगलुरु और कोलकाता की करीब 1.3 करोड़ इमारतों और 8 करोड़ लोगों को कवर करते हुए 2015 से 2023 के बीच की जमीनी धंसाव का विश्लेषण किया।

 

स्टडी के मुताबिक इन शहरों में कुल 878 वर्ग किलोमीटर जमीन धंस रही है, जिससे करीब 19 लाख लोग ऐसे इलाकों में रह रहे हैं जहां हर साल 4 मिलीमीटर से ज्यादा की दर से जमीन नीचे जा रही है। मौजूदा हालात में दिल्ली, मुंबई और चेन्नई में कुल 2,406 इमारतें ऐसी हैं, जिन्हें धंसाव की वजह से ढांचागत नुकसान का ज्यादा जोखिम है।

सत्य निकेतन में दुर्घटनास्थल की तस्वीर। Photo Credit: PTI

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किस शहर में कितनी तेजी से धंस रही जमीन?

स्टडी के मुताबिक सबसे तेज धंसाव दिल्ली में देखा गया, जहां अधिकतम दर 51 मिलीमीटर प्रति वर्ष तक दर्ज की गई। इसके बाद चेन्नई में 31.7 मिलीमीटर, मुंबई में 26.1 मिलीमीटर, कोलकाता में 16.4 मिलीमीटर और बेंगलुरु में 6.7 मिलीमीटर प्रति वर्ष की अधिकतम दर पाई गई। दिल्ली में बिजवासन, फरीदाबाद और गाजियाबाद जैसे इलाकों में धंसाव सबसे ज्यादा दर्ज हुआ, जबकि चेन्नई में अड्यार नदी के बाढ़ क्षेत्र और शहर के बीचोंबीच के इलाकों में यह समस्या सबसे गंभीर पाई गई।

2,406 इमारतें हाई रिस्क में, 5 दशक में आंकड़ा 23,529 पार

शोधकर्ताओं ने मौजूदा धंसाव दर के आधार पर अलग-अलग समयावधि के लिए अनुमान भी लगाए हैं। मौजूदा दौर में दिल्ली में 2,264, मुंबई में 110 और चेन्नई में 32 इमारतें उच्च खतरे की श्रेणी में हैं। अगर यही धंसाव दर अगले 50 साल तक जारी रहती है तो दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, चेन्नई और कोलकाता को मिलाकर कुल 23,529 इमारतें बहुत ज्यादा खतरे की श्रेणी में पहुंच सकती हैं। इनमें से 50 साल बाद दिल्ली में 11,457, मुंबई में 3,477, बेंगलुरु में 8,284, कोलकाता में 112 और चेन्नई में 199 इमारतें 'बहुत ज्यादा खतरे' की श्रेणी में होने का अनुमान है।

 

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30 साल बाद खतरा और गहराएगा?

स्टडी के मुताबिक 30 साल की मध्यावधि का अनुमान भी दिया गया है। इसके मुताबिक 30 साल बाद दिल्ली, चेन्नई और मुंबई में क्रमशः 3,169, 958 और 255 इमारतें बहुत ज्यादा खतरे की श्रेणी में आ सकती हैं। इसके अलावा ज्यादा खतरे की श्रेणी में दिल्ली में 24,582, बेंगलुरु में 40,843, मुंबई में 14,249, चेन्नई में 2,577 और कोलकाता में 4,052 इमारतें शामिल हो सकती हैं।

सत्य निकेतन में दुर्घटनास्थल की तस्वीर। Photo Credit: PTI

देश में धंसने की कगार पर खड़ा राज्य कौन सा है?

50 साल की अवधि के अनुमान में चेन्नई सबसे ज्यादा प्रभावित शहर के तौर पर सामने आया है। यहां सबसे ज्यादा जोखिम है। इसकी जद में 97,946 इमारतें आ सकती हैं। दिल्ली में यह आंकड़ा 38,428 और कोलकाता में 30,344 है। शोधकर्ताओं का कहना है कि आगे चलकर चेन्नई में ज्यादा और बहुत ज्यादा खतरे वाली इमारतों की संख्या दिल्ली और मुंबई से भी आगे निकल सकती है।

 

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जमीन से खिसक रहा पानी, हादसे को न्योता है?

स्टडी के मुताबिक धंसाव की मुख्य वजह भूजल का जरूरत से ज्यादा दोहन है। दिल्ली में जलोढ़ मिट्टी के दबने की वजह भूजल निकासी को बताया गया है, जबकि चेन्नई में अड्यार नदी के बाढ़ क्षेत्र की मिट्टी के दबने और भूजल दोहन दोनों को इसकी वजह माना गया है। दिल्ली के द्वारका इलाके में भूजल सुधारने को लेकर हुए सरकारी प्रयासों की वजह से जमीन ऊपर उठने का ट्रेंड भी देखा गया, जहां यह दर सालाना 15.1 मिलीमीटर दर्ज की गई।

1989 से 2023 तक हुए हादसों का भी जिक्र

स्टडी में 1989 से 2023 के बीच मीडिया रिपोर्टों के आधार पर जुटाए गए आंकड़ों का भी हवाला दिया गया है, जिनमें इन पांच महानगरों में कुल 26 इमारतें गिरने की घटनाएं दर्ज हुईं। इन हादसों में करीब 351 लोगों की मौत और 320 लोग घायल हो चुके हैं। रिपोर्ट में यह भी साफ किया गया है कि जमीन धंसने का सीधा संबंध इमारतों के गिरने से साबित नहीं होता, लेकिन यह अन्य वजहों जैसे कमजोर निर्माण, रखरखाव की कमी और बाढ़ या भूकंप जैसी आपदाओं के असर को और बढ़ा सकता है।