पश्चिम बंगाल में उपचुनाव से ठीक पहले ममता बनर्जी की बनाई हुई पार्टी तृणमूल कांग्रेस का नाम और निशान फ्रीज कर दिया गया है। इसकी वजह पार्टी का दोफाड़ हो जाना है। कुछ समय बाद यह तय होगा कि इस पार्टी के नाम और निशान पर किसका हक होगा। बीते कुछ सालों के भीतर यह चौथी तीसरी ऐसी बड़ी पार्टी है जिसमें इस तरह की टूट के कारण नाम और निशान को लेकर विवाद हुआ है। इससे पहले शरद पवार की बनाई राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP), राम विलास पासवान की बनाई लोकजनशक्ति पार्टी और बाल ठाकरे की बनाई शिवसेना के साथ भी ऐसा ही हो चुका है। ना तो यह पहली बार हुआ है और ना ही आखिरी बार। इतिहास गवाह है कि ऐसे कई राजनीतिक दल रहे जिन्हें बनाने वाले ही कभी नाम और निशान खो बैठे।
इस लिस्ट में देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस का नाम भी शामिल है। कभी कांग्रेस (I) बनी, कभी कांग्रेस (O) तो कभी कांग्रेस (R) अस्तित्व में आई। इसी तरह कांग्रेस के न निशान भी बदलते गए। मौजूदा वक्त में हम जिस भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को जानते हैं उसका चुनाव निशान हाथ का पंजा है लेकिन यह साल 1978 में अस्तित्व में आया। इसी तरह लोकदल और जनता दल के भी कई धड़े बने जो आज भी अस्तित्व में हैं। अब ऐसा लगता है कि तृणमूल कांग्रेस के साथ भी ऐसा ही होने वाला है।
कांग्रेस की लड़ाई
वैसे तो कांग्रेस के तमाम नेताओं ने पार्टी छोड़कर अलग-अलग समय पर अलग-अलग दल बनाए लेकिन पहली बार साल 1969 में पार्टी पर ही दावा ठोक दिया गया। 1952 से 1969 तक इसी कांग्रेस का चुनाव निशान दो बैलों को जोड़ी था। जब इंदिरा गांधी को 12 नवंबर 1969 को पार्टी कांग्रेस से निकाल दिया गया और कांग्रेस दो हिस्सों में बंटी तो दो बैलों की जोड़ी वाला निशान भी फ्रीज हो गया। इंदिरा गांधी ने पहले तो गाय और बछड़े वाले निशान पर चुनाव लड़ा लेकिन जब उनके दल को ही असली पार्टी माना गया तब उन्होंने निशान बदलकर हाथ का पंजा रख लिया।
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इस तरह एक बार फ्रीज हुआ दो बैलों की जोड़ी वाला निशान अब अस्तित्व में ही नहीं है और कांग्रेस 1980 से ही हाथ के पंजे के निशान पर चुनाव लड़ रही है।
जनता दल का बिखराव
शुरुआत में जब जनता पार्टी बनी थी तब उसका निशान 'किसान और हल' थे। बाद में जब इसी पार्टी का विलय जनता दल में विलय हुआ तो यह चिह्न फ्रीज कर दिया गया। इतना ही नहीं जब बाद में जनता दल कई टुकड़ों में बंट गया तो उसका चुनाव चिह्न 'पहिया' भी फ्रीज कर दिया गया। अब उसी जनता दल से निकला जनता दल (यूनाइटेड) तीर-धनुष और जनता दल (सेक्युलर) 'अनाज ले जाती महिला' के साथ अपनी राजनीति को आगे बढ़ा रहे हैं।
फ्रीज हुए और एक धड़े को मिल गए निशान
AIADMK (2017): तमिलनाडु की सीएम रहीं जयललिता का जब निधन हुआ तो AIADMK को लेकर विवाद हो गया। तब चुनाव आयोग ने दो पत्तियों वाले निशान और पार्टी के नाम को फ्रीज कर दिया गया था। तब एक धड़े का नाम AIADMK (अम्मा) था जिसे 'टोपी' निशान मिला और दूसरे धड़े AIADMK (PTA) को 'बिजली का खंभा' निशान मिला था। बाद में पलानीस्वामी वाले धड़े को असली पार्टी का नाम और निशान मिल गया।
लोक जनशक्ति पार्टी (2021): ऐसा ही विवाद तब हुआ जब राम विलास पासवान का निधन हुआ। तब इस पार्टी का निशान बंगला था। विवाद बढ़ा तो निशान और नाम फ्रीज हो गया। बाद में असली नाम और निशान पशुपति पारस को मिल गया और चिराग पासवान ने अपनी पार्टी का नाम लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास) रख लिया।
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NCP और शिवसेना में भी हुई टूट: इसी तरह शरद पवार की बनाई पार्टी एनसीपी का असली धड़ा पहले अजित पवार और फिर सुनेत्रा पवार के पास चला गया और चुनाव चिह्न घड़ी भी इसी धडे़ को मिल गया। शरद पवार को एनसीपी (शरद पवार) के नाम से संतोष करना पड़ा। इसी तरह उद्धव ठाकरे के पिता बाल ठाकरे ने जो शिवसेना बनाई थी, अब उसी के सर्वेसर्वा एकनाथ शिंदे बन गए हैं और उद्धव ठाकरे को शिवसेना (उद्धव बालासाहब ठाकरे) के नाम से संतोष करना पड़ा है।
ऐसा लगता है कि अब बारी तृणमूल कांग्रेस की है। इसकी वजह है कि उसके दो तिहाई से ज्यादा सांसद दूसरी पार्टी में चले गए हैं। वहीं, विधायकों ने खुद के मूल पार्टी होने का दावा करके ममता बनर्जी की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
