उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी ने गैर-यादव पिछड़ा वर्ग के अहम हिस्से कुर्मी समाज को साधने की कवायद तेज कर दी है। करीब 7.5 फीसदी आबादी वाला कुर्मी समाज प्रदेश के कई हिस्सों में चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की स्थिति में है। 2024 के लोकसभा चुनाव में इस सामाजिक समीकरण का झुकाव कई सीटों पर भारतीय जनता पार्टी के बजाय समाजवादी पार्टी की ओर गया। अब बीजेपी इस अंतर को पाटने की कोशिश में जुटी है। पार्टी ने महाराष्ट्र के विनोद तावड़े को उत्तर प्रदेश का प्रभारी और गुजरात के जगदीश पटेल को सह प्रभारी बनाया है। दोनों नियुक्तियों को 2027 की चुनावी रणनीति में कुर्मी वोटरों तक पहुंच मजबूत करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

 

2024 के लोकसभा चुनाव के बाद उत्तर प्रदेश में कुर्मी समाज से चुने गए सांसदों में समाजवादी पार्टी के राम प्रसाद चौधरी (बस्ती), लालजी वर्मा (अंबेडकरनगर), नरेश उत्तम पटेल (फतेहपुर), आरके चौधरी (मोहनलालगंज), उत्कर्ष वर्मा (खीरी), राम शिरोमणि वर्मा (श्रावस्ती) और शिवपाल सिंह पटेल (प्रतापगढ़) के नाम शामिल किए जाते हैं।

 

भारतीय जनता पार्टी की ओर से पंकज चौधरी (महराजगंज), प्रवीण सिंह पटेल (फूलपुर) और क्षत्रपाल सिंह गंगवार (बरेली) जैसे नाम हैं, जबकि अपना दल (एस) की अनुप्रिया पटेल मिर्जापुर से सांसद चुनी गईं। यही तस्वीर बीजेपी की चिंता को समझने के लिए काफी हैं। 2014 और 2019 में बीजेपी के साथ मजबूत दिखा कुर्मी आधार 2024 में कई इलाकों में खिसका और समाजवादी पार्टी के पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक (PDA) समीकरण को इसका फायदा मिला।

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2022 में बीजेपी के पक्ष में था मजबूत समीकरण?

2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी और उसके सहयोगियों को कुर्मी समाज के बीच अच्छी पकड़ मिली थी। इसी सामाजिक समीकरण ने पूर्वांचल, अवध और मध्य यूपी की कई सीटों पर बीजेपी को मजबूती दी। 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण को जिस तरह जोड़ा, उसमें कुर्मी समाज का एक हिस्सा भी उसके साथ गया। यही कारण है कि 2027 से पहले बीजेपी के सामने केवल अपने पुराने वोट बैंक को बचाने की चुनौती नहीं है, बल्कि समाजवादी पार्टी के साथ गए कुर्मी मतदाताओं को वापस जोड़ने की भी चुनौती है।

 

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तावड़े-पटेल की जोड़ी क्यों अहम?

विनोद तावड़े को उत्तर प्रदेश का प्रभारी और जगदीश पटेल को सह प्रभारी बनाए जाने को बीजेपी के संगठनात्मक और सामाजिक समीकरण दोनों से जोड़कर देखा जा रहा है। तावड़े को चुनाव प्रबंधन और संगठन संचालन का लंबा अनुभव है, जबकि पटेल की भूमिका को गुजरात मॉडल के संगठनात्मक अनुभव से भी जोड़ा जा रहा है।

 

बीजेपी के पास पहले से कुर्मी समाज के कई बड़े चेहरे हैं। पंकज चौधरी, स्वतंत्र देव सिंह, राकेश सचान और आशीष पटेल जैसे नेता पार्टी और सहयोगी दलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। ऐसे में तावड़े और पटेल की नियुक्ति का असली लक्ष्य केवल कुर्मी चेहरों को आगे करना नहीं, बल्कि संगठन के जरिए इस समुदाय तक पहुंच को और मजबूत करना माना जा रहा है।

कुर्मी प्रभाव वाले जिले कौन से?

कुर्मी समाज का प्रभाव पूरे प्रदेश में समान नहीं है। राजनीतिक तौर पर पूर्वांचल, अवध, मध्य उत्तर प्रदेश और बुंदेलखंड के कई हिस्सों में इसकी मौजूदगी महत्वपूर्ण मानी जाती है। पूर्वांचल में महराजगंज, गोरखपुर, बस्ती, संतकबीरनगर, सिद्धार्थनगर, श्रावस्ती, अयोध्या, सुल्तानपुर और प्रतापगढ़ जैसे इलाकों में कुर्मी मतदाता कई सीटों पर प्रभाव डालते हैं।


अवध और मध्य यूपी में बाराबंकी, लखनऊ के आसपास के क्षेत्र, सीतापुर, लखीमपुर खीरी, हरदोई, उन्नाव, रायबरेली और फतेहपुर में भी कुर्मी मतदाताओं की राजनीतिक भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है।बुंदेलखंड और आसपास के क्षेत्रों में बांदा, चित्रकूट, हमीरपुर, महोबा और फतेहपुर सहित कुछ सीटों पर कुर्मी वोट चुनावी समीकरण प्रभावित कर सकता है। यह प्रभाव विधानसभा क्षेत्र के हिसाब से काफी बदलता है।

समाजवादी पार्टी की बढ़त बीजेपी के लिए क्यों चिंता?

सपा के लिए कुर्मी वोट इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उसका पारंपरिक यादव आधार पहले से मजबूत है। यदि यादव-मुस्लिम के साथ कुर्मी और दूसरे गैर-यादव पिछड़े वर्गों का एक हिस्सा भी सपा के साथ रहता है तो बीजेपी के सामने कई सीटों पर सीधी चुनौती खड़ी हो सकती है। यही वजह है कि बीजेपी अब पीडीए की काट के लिए गैर-यादव ओबीसी सामाजिक समीकरण को मजबूत करने पर जोर दे रही है। कुर्मी समाज इस रणनीति का अहम हिस्सा है। राजनीतिक विश्लेषणों में भी कुर्मी समुदाय को यूपी का महत्वपूर्ण गैर-यादव ओबीसी समूह माना गया है।

 

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बीजेपी के सामने तीन बड़ी चुनौतियां क्या हैं?

बीजेपी के सामने सबसे पहली चुनौती 2024 में समाजवादी पार्टी की ओर गए कुर्मी वोटरों को वापस लाना है। दूसरी चुनौती कुर्मी समाज के भीतर क्षेत्रीय नेतृत्व और स्थानीय मुद्दों को साधना है। तीसरी चुनौती यह है कि पार्टी के बड़े कुर्मी नेताओं की मौजूदगी को बूथ स्तर तक किस तरह प्रभावी बनाया जाए। पार्टी का नया संगठनात्मक प्रयोग कितना सफल होता है, इसका जवाब आने वाले महीनों में मिलने लगेगा।

 

भारतीय जनता पार्टी के पास कुर्मी समाज के बड़े चेहरे, संगठन और सरकार में प्रतिनिधित्व है। समाजवादी पार्टी के पास 2024 के लोकसभा चुनाव का प्रदर्शन और पीडीए का राजनीतिक संदेश है। ऐसे में 2027 की लड़ाई सिर्फ यह तय नहीं करेगी कि कुर्मी समाज किस दल के साथ है, बल्कि यह भी तय करेगी कि इस समाज का कितना हिस्सा किस पार्टी के साथ जाता है। यही वजह है कि करीब 7.5 फीसदी माने जाने वाले इस वोट बैंक पर बीजेपी और समाजवादी पार्टी दोनों की नजर है। बीजेपी के लिए चुनौती साफ है, लोकसभा में खिसका कुर्मी वोट वापस लाना और उसे विधानसभा चुनाव तक अपने पक्ष में बनाए रखना। बीजेपी ने सालभर पहले से ही इसे साधने के लिए तैयारियां शुरू कर दी थीं।