उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में अभी समय है लेकिन दिल्ली में हुई एक मुलाकात ने प्रदेश की राजनीति का तापमान अचानक बढ़ा दिया है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की बंद कमरे में हुई बैठक को विपक्ष की सबसे अहम चुनावी बैठक माना जा रहा है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यह मुलाकात सिर्फ औपचारिक नहीं थी, बल्कि सीट शेयरिंग से लेकर चुनावी रणनीति, जातीय समीकरण और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को सत्ता से बाहर करने के रोडमैप तक कई मुद्दों पर गंभीर मंथन हुआ। हालांकि, बैठक में क्या तय हुआ, इस पर दोनों दलों ने कोई आधिकारिक जानकारी नहीं दी है।

 

2024 के लोकसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस के गठबंधन ने उत्तर प्रदेश में बीजेपी को कड़ी चुनौती दी थी। समाजवादी पार्टी ने 37 सीटें जीतकर प्रदेश की सबसे बड़ी विपक्षी ताकत के रूप में वापसी की जबकि कांग्रेस ने 6 सीटों पर जीत दर्ज कर वर्षों बाद अपनी स्थिति मजबूत की। गठबंधन को कुल 43 सीटें मिलीं, जिसने यूपी की राजनीति का पूरा समीकरण बदल दिया।अब यही मॉडल विधानसभा चुनाव में लागू करने की कवायद शुरू हो चुकी है।

सीट शेयरिंग पर कहां अटका है पेच?

राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस विधानसभा चुनाव में अपनी भूमिका पहले से बड़ी चाहती है। पार्टी करीब 80 से 100 सीटों पर चुनाव लड़ने की इच्छा जता रही है। वहीं, समाजवादी पार्टी अपने मजबूत संगठन और जनाधार के आधार पर कांग्रेस को 50 से 60 सीटों से अधिक देने के पक्ष में शुरुआत में नहीं थी। अब चर्चा है कि दोनों दल 60 से 70 सीटों के बीच किसी सहमति वाले फार्मूले पर आगे बढ़ सकते हैं। हालांकि, इस संख्या की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और बातचीत अभी जारी मानी जा रही है।

 

यह भी पढ़ें: UP के 1.86 लाख शिक्षकों को राहत, कार्यरत शिक्षकों के लिए स्पेशल TET

बीजेपी के सामने क्या होगी सबसे बड़ी चुनौती?

यदि सपा और कांग्रेस समय रहते सीटों का विवाद सुलझा लेते हैं और एकजुट होकर चुनाव मैदान में उतरते हैं, तो बीजेपी के सामने कई सीटों पर मुकाबला कठिन हो सकता है। विपक्ष की रणनीति बीजेपी के खिलाफ वोटों के बिखराव को रोकने पर केंद्रित हो सकती है।हालांकि, बीजेपी भी पिछड़े वर्ग, गैर-यादव ओबीसी, गैर-जाटव दलित, महिलाओं, लाभार्थी वर्ग और अपने सहयोगी दलों के साथ सामाजिक समीकरण साधने की रणनीति पर काम कर रही है। इसलिए चुनावी तस्वीर केवल गठबंधन से नहीं, बल्कि उम्मीदवारों, स्थानीय मुद्दों और प्रचार अभियान से भी तय होगी।

 

सपा की कोशिश अपने पारंपरिक यादव-मुस्लिम आधार को मजबूत बनाए रखने की होगी। कांग्रेस अनुसूचित जाति, सवर्ण, शहरी मतदाताओं और युवा वर्ग में अपनी पकड़ बढ़ाने की कोशिश करेगी। यदि दोनों दल प्रभावी तालमेल बनाते हैं, तो वे कई सामाजिक समूहों को साथ लाने का प्रयास करेंगे। दूसरी ओर बीजेपी गैर-यादव ओबीसी, गैर-जाटव दलित और लाभार्थी वर्ग में अपनी पकड़ बनाए रखने की रणनीति पर काम करेगी।

 

यह भी पढ़ें: 2 नए एक्सप्रेसवे को मंजूरी, 50 हजार लड़कियों को स्कूटी देगी UP सरकार

क्या बनेगा संयुक्त चुनावी प्लान?

सूत्रों के मुताबिक, बैठक में केवल सीटों पर ही नहीं, बल्कि साझा चुनाव अभियान, संयुक्त रैलियां, स्टार प्रचारकों की भूमिका, उम्मीदवार चयन, बूथ प्रबंधन और बीजेपी के खिलाफ साझा नैरेटिव तैयार करने जैसे मुद्दों पर भी चर्चा हुई। दोनों दल विधानसभा चुनाव से पहले कई संयुक्त कार्यक्रमों की रूपरेखा भी बना सकते हैं।


दिल्ली की बैठक से क्या संकेत मिले?राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दिल्ली की यह मुलाकात विपक्षी एकता को मजबूत करने की दिशा में अहम संकेत देती है। हालांकि, अंतिम तस्वीर सीटों के बंटवारे और दोनों दलों के औपचारिक ऐलान के बाद ही साफ होगी।फिलहाल इतना तय है कि 2027 के चुनावी महासंग्राम से पहले दिल्ली में हुई इस बैठक ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में नई हलचल जरूर पैदा कर दी है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि सपा और कांग्रेस कब और किस फार्मूले के साथ गठबंधन की आधिकारिक घोषणा करते हैं।