उत्तर प्रदेश की राजनीति में एटा जिला हमेशा से प्रभावशाली नेताओं, बाहुबली छवि वाले राजनीतिक चेहरों और जातीय समीकरणों का केंद्र रहा है। इस जिले में पिछले तीन दशक की राजनीति में एक ही परिवार का दबदबा रहा है। यहां पूर्व विधायक रामेश्वर सिंह यादव और उनके भाई जुगेंद्र सिंह यादव का नाम सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिना जाता है। पंचायत की राजनीति से शुरू हुआ यह सफर विधानसभा, जिला पंचायत और समाजवादी पार्टी के सत्ता केंद्र तक पहुंचा।
एक समय ऐसा था जब एटा जिले में किसी भी बड़े चुनावी समीकरण की चर्चा यादव बंधुओं के बिना अधूरी मानी जाती थी।आज भी एटा, अलीगंज, जलेसर और आसपास के जिलों की राजनीति में इन दोनों भाइयों का प्रभाव चर्चा का विषय बना रहता है। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में कानूनी कार्रवाई, गैंगस्टर एक्ट, संपत्ति कुर्की और जेल प्रवास ने उनके राजनीतिक सफर को नया मोड़ भी दिया।
बीहड़ों से राजनीति तक का सफर
स्थानीय राजनीतिक चर्चाओं और पुराने राजनीतिक किस्सों में यह बात अक्सर कही जाती है कि युवावस्था में रामेश्वर यादव का संपर्क बीहड़ क्षेत्र के प्रभावशाली लोगों से रहा। बाद में उन्होंने सक्रिय राजनीति की राह चुनी और तत्कालीन क्षेत्रीय नेता लटूरी सिंह के करीब आए। राजनीतिक जानकारों के अनुसार पंचायत चुनावों से उन्होंने अपना सार्वजनिक राजनीतिक सफर शुरू किया और धीरे-धीरे ग्रामीण क्षेत्रों में मजबूत संगठन खड़ा कर लिया। यही वह दौर था जब यादव परिवार ने पंचायत प्रतिनिधियों, सहकारी संस्थाओं और स्थानीय संगठनों के माध्यम से अपनी पकड़ मजबूत करनी शुरू की। इसके बाद दोनों भाइयों ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
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समाजवादी राजनीति ने दिया बड़ा मंच
1990 के दशक में समाजवादी राजनीति के विस्तार के साथ यादव बंधुओं का कद भी बढ़ता गया। समाजवादी पार्टी के संगठन में उनकी सक्रियता बढ़ी और एटा जिले में पार्टी का मजबूत आधार तैयार करने वालों में उनका नाम शामिल होने लगा। पार्टी के भीतर उनकी स्वीकार्यता लगातार बढ़ती गई और धीरे-धीरे उनका प्रभाव पड़ोसी जिलों तक फैल गया। राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा रही कि समाजवादी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व तक उनकी सीधी पहुंच थी, जिसका लाभ उन्हें संगठन और चुनावी राजनीति दोनों में मिला।
तीन बार विधायक बने रामेश्वर यादव
रामेश्वर सिंह यादव ने अलीगंज विधानसभा सीट से 1996 में पहली बार जीत दर्ज कर विधानसभा में प्रवेश किया। इसके बाद 2002 में दूसरी बार और 2012 में तीसरी बार विधायक बने। लगातार तीन चुनावी जीतों ने उन्हें एटा जिले की राजनीति का बड़ा चेहरा बना दिया। रामेश्वर यादव ने विधानसभा चुनावों के अलावा लोकसभा राजनीति में भी अपनी किस्मत आजमाई। उन्होंने फर्रुखाबाद लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन जीत हासिल नहीं कर सके। इसके बाद 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में भी उन्हें हार का सामना करना पड़ा। हालांकि हार के बावजूद उनका राजनीतिक प्रभाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ।
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जिला पंचायत की राजनीति के 'किंग' बने जुगेंद्र
जहां रामेश्वर यादव विधानसभा की राजनीति का चेहरा बने, वहीं जुगेंद्र सिंह यादव ने जिला पंचायत की राजनीति में अपना अलग साम्राज्य खड़ा किया। जिला पंचायत अध्यक्ष पद और पंचायत प्रतिनिधियों के नेटवर्क पर उनकी मजबूत पकड़ की चर्चा वर्षों तक होती रही। एटा जिले में लंबे समय तक जिला पंचायत की राजनीति यादव परिवार के इर्द-गिर्द घूमती रही। वर्तमान में भी परिवार की राजनीतिक सक्रियता बनी हुई है और रेखा यादव जिला पंचायत की राजनीति का महत्वपूर्ण चेहरा मानी जाती हैं।
एटा में क्यों कहा जाता था 'यादव बंधुओं का किला'
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यादव बंधुओं की सबसे बड़ी ताकत उनका संगठन था। पंचायत प्रतिनिधियों, ब्लॉक प्रमुखों, ग्राम प्रधानों और स्थानीय कार्यकर्ताओं का ऐसा नेटवर्क उन्होंने तैयार किया जो कई चुनावों में निर्णायक साबित हुआ। एटा जिले के अलावा अलीगढ़, कासगंज, फर्रुखाबाद और आसपास के क्षेत्रों में भी उनकी राजनीतिक पकड़ की चर्चा होती रही। यही कारण था कि समाजवादी पार्टी के भीतर भी उनकी बात को गंभीरता से लिया जाता था।
बीजेपी सरकार आने के बाद बढ़ीं मुश्किलें
2017 में प्रदेश में बीजेपी सरकार बनने के बाद यादव बंधुओं की राजनीतिक और कानूनी चुनौतियां तेजी से बढ़ीं। दोनों भाइयों के खिलाफ पहले से दर्ज मामलों की जांच तेज हुई और कई नए मुकदमे भी दर्ज किए गए। दुष्कर्म, गैंगस्टर एक्ट, भूमि कब्जा, धोखाधड़ी और अन्य गंभीर आरोपों से जुड़े मामलों में पुलिस और प्रशासन ने कार्रवाई की। प्रशासनिक रिकॉर्ड के अनुसार एटा, अलीगढ़, आगरा, मथुरा और फर्रुखाबाद समेत कई जिलों में परिवार से जुड़ी संपत्तियों पर कार्रवाई की गई।
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कुर्की और जेल ने बदली राजनीतिक तस्वीर
प्रशासनिक कार्रवाई के दौरान करोड़ों रुपये की संपत्तियां कुर्क की गईं। पुलिस और प्रशासन ने इसे माफिया और बाहुबली तत्वों के खिलाफ अभियान का हिस्सा बताया। वहीं समर्थकों ने इन कार्रवाइयों को राजनीतिक प्रतिशोध करार दिया। विभिन्न मामलों में कार्रवाई के दौरान दोनों भाइयों को जेल भी जाना पड़ा। लंबे समय तक जेल में रहने के बाद उन्हें अदालतों से राहत मिली और बाद में जमानत पर रिहा हुए।
जेल से निकलते ही फिर सक्रिय हुई राजनीति
जेल से बाहर आने के बाद यादव बंधुओं ने राजनीतिक गतिविधियां तेज कर दीं। समाजवादी पार्टी के कार्यक्रमों में उनकी सक्रियता बढ़ी और कार्यकर्ताओं के बीच उनकी मौजूदगी फिर दिखाई देने लगी। हाल ही में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव का एटा दौरा भी चर्चा में रहा। राजनीतिक हलकों में इसे यादव परिवार की बढ़ती सक्रियता और 2027 के चुनावी संकेतों से जोड़कर देखा जा रहा है। सैफई परिवार से नजदीकी की चर्चाराजनीतिक गलियारों में लंबे समय से यादव बंधुओं की समाजवादी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से नजदीकी की चर्चा होती रही है। समर्थकों का मानना है कि पार्टी संगठन में उनकी पकड़ और शीर्ष नेताओं से संवाद की क्षमता ही उनकी राजनीतिक ताकत का बड़ा आधार रही है।
2027 के चुनाव में क्या फिर लौटेगा पुराना दौर?
अब सबसे बड़ा सवाल 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर है। क्या रामेश्वर यादव एक बार फिर अलीगंज से चुनावी मैदान में उतरेंगे? क्या यादव परिवार अपना पुराना राजनीतिक प्रभाव दोबारा हासिल कर पाएगा? या फिर बदल चुके राजनीतिक समीकरण उनके सामने नई चुनौतियां खड़ी करेंगे? एटा की राजनीति पर नजर रखने वाले जानकारों का मानना है कि कानूनी चुनौतियों के बावजूद यादव बंधुओं को अभी भी हल्के में नहीं लिया जा सकता।
पंचायत स्तर पर उनका नेटवर्क, समाजवादी राजनीति में उनकी स्वीकार्यता और वर्षों से बना जनाधार उन्हें आज भी जिले की राजनीति का बड़ा खिलाड़ी बनाए हुए है। यही वजह है कि 2027 के चुनावी रण की चर्चा शुरू होते ही एटा में एक बार फिर रामेश्वर और जुगेंद्र यादव का नाम राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया है।
