उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले योगी सरकार की योजनाओं का फोकस अब अलग-अलग सामाजिक वर्गों तक पहुंच बनाने पर दिखाई दे रहा है। पहले महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा, रसोइयों के मानदेय में बढ़ोतरी और बेटियों के लिए स्कूटी जैसे कदमों के बाद अब मछुआरा परिवारों के लिए बड़ा फैसला किया गया है। सरकार ने पात्र मछुआरा परिवारों की बेटियों के विवाह पर एक लाख रुपये की सहायता और बच्चों की पढ़ाई के लिए आर्थिक मदद की व्यवस्था की है। सरकार के इस कदम को जहां मछुआरा परिवारों के कल्याण से जोड़कर देखा जा रहा है, वहीं चुनावी नजरिए से इसे निषाद और मछुआरा समाज के बीच पकड़ मजबूत करने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है।
प्रदेश सरकार ने मत्स्य पालक कल्याण कोष का दायरा बढ़ाते हुए पात्र मछुआरा परिवारों की बेटियों के विवाह के लिए एक लाख रुपये की सहायता देने की व्यवस्था की है। कन्या की उम्र 18 से 21 वर्ष के बीच होना जरूरी बताया गया है। इसके साथ ही पूर्व-दशम कक्षा में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को अधिकतम 10 माह तक 150 रुपये प्रतिमाह और 750 रुपये वार्षिक अनुदान देने की व्यवस्था की गई है। परिवार की वार्षिक आय दो लाख रुपये तक होने की शर्त भी बताई गई है।
आरक्षण की मांग के बीच सरकार का नया दांव
निषाद समाज की राजनीति में आरक्षण लंबे समय से बड़ा मुद्दा रहा है। निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद लगातार निषाद समेत मछुआरा समाज से जुड़ी जातियों को आरक्षण देने की मांग उठाते रहे हैं। 2026 में भी उनकी ओर से इस मांग को लेकर सरकार पर दबाव बनाने की खबरें सामने आई हैं। ऐसे में आरक्षण के मुद्दे के बीच बेटियों की शादी के लिए एक लाख रुपये और बच्चों की शिक्षा के लिए आर्थिक मदद की घोषणा को राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सवाल यही है कि क्या सरकार आर्थिक मदद के जरिए उस सामाजिक वर्ग तक अपनी पहुंच मजबूत करना चाहती है, जो आरक्षण को अपनी बड़ी मांग मानता रहा है?
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किन जातियों को मिलेगा फायदा?
मछुआरा समाज को केवल एक जाति तक सीमित नहीं माना जाता। इस सामाजिक समूह में अलग-अलग क्षेत्रों में केवट, मल्लाह, निषाद, बिंद, धीमर, कश्यप, बाथम, रैकवार, मांझी, गोंडिया और कहार समेत कई समुदायों की पहचान की जाती है।यही वजह है कि मछुआरा-निषाद समाज का प्रभाव उत्तर प्रदेश की कई विधानसभा सीटों पर चुनावी गणित को प्रभावित करने वाला माना जाता है। गोरखपुर, मऊ, गाजीपुर, बलिया, संतकबीरनगर, मिर्जापुर, भदोही, प्रयागराज, वाराणसी, जौनपुर, फतेहपुर, बांदा, हमीरपुर, सहारनपुर और लखीमपुर जैसे जिलों में निषाद आबादी का प्रभाव माना जाता है।
BJP-निषाद पार्टी गठबंधन के लिए अहम सीटें
2022 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी और निषाद पार्टी गठबंधन ने इस सामाजिक समीकरण को चुनावी मैदान में इस्तेमाल किया था। निषाद पार्टी ने गठबंधन में 16 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे थे और इनमें कई सीटों पर उसे सफलता भी मिली। 2027 के लिए अभी भारतीय जनता पार्टी और निषाद पार्टी के बीच अंतिम सीट बंटवारा सार्वजनिक नहीं हुआ है।
निषाद पार्टी लगातार अपने संगठन को मजबूत करने और चुनावी तैयारी की बात कर रही है। मेंहदावल, नौतनवा, खड्डा, शाहगंज और ज्ञानपुर जैसी सीटें, जहां मौजूदा विधानसभा में निषाद पार्टी के विधायक बताए जाते हैं, इसके अलावा करछना और तिंदवारी जैसी सीटों पर भी निषाद नाम वाले भारतीय जनता पार्टी विधायक 2022 में जीते थे, जो इस समुदाय के व्यापक राजनीतिक प्रभाव की तस्वीर दिखाता है।
महिलाओं के बाद निषाद वोट पर फोकस?
सरकार की हालिया घोषणाओं को एक साथ देखें तो महिलाओं, बेटियों और अब मछुआरा परिवारों पर विशेष जोर दिखाई देता है। राजनीतिक नजरिए से इसका मतलब यह निकाला जा रहा है कि भारतीय जनता पार्टी 2027 से पहले अलग-अलग सामाजिक समूहों को लक्षित कल्याणकारी योजनाओं के जरिए अपने साथ जोड़ना चाहती है। महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा और स्कूटी जैसे कदमों के बाद मछुआरा परिवारों की बेटियों के विवाह पर एक लाख रुपये की सहायता का फैसला इसी क्रम में देखा जा रहा है।
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असली परीक्षा 2027 में हो पाएगी?
भारतीय जनता पार्टी के सामने एक तरफ निषाद पार्टी के साथ गठबंधन है, तो दूसरी तरफ निषाद समाज की आरक्षण की पुरानी मांग भी है। ऐसे में सरकार की आर्थिक सहायता वाली योजनाएं इस समाज के बीच कितना असर डालती हैं, यह आने वाले महीनों में साफ होगा।फिलहाल इतना जरूर है कि मछुआरा परिवारों की बेटियों की शादी के लिए एक लाख रुपये और बच्चों की शिक्षा के लिए सहायता ने 2027 की चुनावी राजनीति में निषाद-मछुआरा वोट को फिर केंद्र में ला दिया है। अब नजर इस बात पर होगी कि आरक्षण की मांग और सरकारी योजनाओं के बीच निषाद समाज का चुनावी रुख किस दिशा में जाता है।
