सनातन धर्म में कई ऐसे पर्व-त्योहार मनाए जाते हैं, जब महिलाएं और पुरुष व्रत रखते हैं, ताकि उनके परिवार में सुख-शांति बनी रहे। इसी तरह हिंदू धर्म में लाखों सुहागन महिलाएं अपने सुखी वैवाहिक जीवन और पति की लंबी उम्र की कामना के लिए व्रत रखती हैं। पति की लंबी उम्र के लिए एक नहीं, बल्कि कई व्रत रखने की परंपरा है। व्रत रखने को लेकर दो अलग-अलग मान्यताएं हैं। जहां एक तरफ कई धार्मिक मान्यताओं में कहा गया है कि महिलाओं को पति की लंबी उम्र के लिए व्रत रखना चाहिए, वहीं दूसरी तरफ कई धार्मिक जानकारों का मानना है कि महिलाओं के लिए अनिवार्य तौर पर करवा चौथ या हरतालिका तीज का व्रत रखना जरूरी नहीं है। ऐसे में लोगों को धार्मिक ग्रंथ भगवद्गीता और मनुस्मृति के आधार पर समझना चाहिए कि व्रत रखना जरूरी है या नहीं।

 

इस साल 29 अक्टूबर को करवा चौथ पर्व मनाया जाएगा, जिसके दौरान लाखों महिलाएं एक दिन निर्जला व्रत रखेंगी। करवा चौथ पर्व पहले पंजाब और हरियाणा में अधिक मनाया जाता था, जबकि अब पूरे भारत में कई महिलाएं यह पर्व मनाती हैं। हिंदी फिल्मों में भी करवा चौथ पर्व को मनाते हुए दिखाया गया है, जिसे देखकर देश की तमाम महिलाओं ने करवा चौथ का व्रत रखना शुरू किया। अब सवाल उठता है कि धर्म ग्रंथों में व्रत रखने को लेकर क्या बताया गया है? आइए जानते हैं।

 

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 व्रत रखना जरूरी है या नहीं

सनातन धर्म में भगवद्गीता और मनुस्मृति को बेहद खास ग्रंथ माना जाता है। भगवद्गीता में धर्म और जीवन को लेकर कई बातें बताई गई हैं। भगवद्गीता में व्रत और उपवास के बारे में भी बताया गया है। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण जी ने अर्जुन को बताया कि कठिन उपवास रखना सही नहीं है। इसके साथ ही कृष्ण जी ने बताया कि न बहुत खाने वाले को योग सिद्ध होता है और न बिल्कुल न खाने वाले को सिद्धि प्राप्त होती है। शरीर को अनावश्यक कष्ट देने वाले तप को भी सही नहीं माना गया है। यानी कठोर उपवास का समर्थन नहीं किया गया है।

 

नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः।
न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन।।

 

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इस श्लोक का अर्थ है कि हे अर्जुन, यह योग न तो बहुत अधिक खाने वाले का सिद्ध होता है और न बिल्कुल न खाने वाले का। न बहुत सोने वाले को और न बहुत जागने वाले को सिद्धि प्राप्त होती है। इस श्लोक के जरिए बताया गया है कि न ज्यादा खाना सही है और न ही बिल्कुल भूखे रहना चाहिए। इससे साफ होता है कि व्रत रखना जरूरी नहीं है।

मनुस्मृति में क्या बताया गया ?

मनुस्मृति में बताया गया है कि पत्नियों को पतिव्रता धर्म का पालन करना चाहिए। जो महिलाएं पतिव्रता धर्म निभाती हैं, उन्हें यज्ञ, कठोर व्रत और तप करने की जरूरत नहीं है। यानी पत्नियों का सबसे बड़ा व्रत अपने पति का साथ निभाना है। मनुस्मृति के अनुसार महिलाओं को अच्छे-बुरे हर परिस्थिति में अपने पति का साथ निभाना चाहिए। इसके साथ ही पतियों को भी हमेशा अपनी पत्नियों का साथ देना चाहिए।

 

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'नास्ति स्त्रीणां पृथग्यज्ञो न व्रतं नाप्युपोषणम्।
पतिं शुश्रूषते येन तेन स्वर्गे महीयते॥'

 

इस श्लोक का मतलब है कि जो महिला अपने पति का आदर-सम्मान करती है, उसे कठिन व्रत और यज्ञ करने की जरूरत नहीं है। सिर्फ पतिव्रता धर्म निभाने से ही महिलाओं को पुण्य मिल जाएगा। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि व्रत रखना गलत है, बल्कि व्रत को अनिवार्य रूप से रखना जरूरी नहीं है।

 

नोट: यह लेख धार्मिक मान्यताओं और गणनाओं पर आधारित है। इसकी पुष्टि हम नहीं करते हैं।