ज्योतिष शास्त्र में सूर्य ग्रह को बेहद खास माना जाता है। सूर्य को ग्रहों का राजा भी कहा जाता है। कुंडली के अलग-अलग भावों में सूर्य देव के प्रवेश करने से उसका प्रभाव व्यक्ति के भाग्य पर अलग तरीके से पड़ता है। इससे व्यक्ति का भाग्य संवर भी सकता है और बिगड़ भी सकता है। जब सूर्य ग्रह कुंडली के शुभ भाव में विराजमान होता है, तो व्यक्ति को न सिर्फ सुख और संपत्ति मिलती है, बल्कि उसे करियर में भी नई ऊंचाइयां हासिल होती हैं। इसके विपरीत, जब कुंडली के अशुभ भाव में सूर्य देव विराजमान हों, तो व्यक्ति को जीवन में कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। साथ ही, सेहत से जुड़ी समस्याएं भी परेशान कर सकती हैं।


लाल किताब के अनुसार, जब सूर्य अपने मित्र ग्रहों के साथ बैठता है, तो उसे शुभ स्थिति माना जाता है। सूर्य मित्र ग्रहों के साथ बैठकर व्यक्ति पर सकारात्मक प्रभाव डालता है। वहीं, जब सूर्य अपने शत्रु ग्रहों या उनकी राशियों में बैठा हो, तो उसका प्रभाव नकारात्मक रहता है। सूर्य के नकारात्मक प्रभाव से व्यक्ति गुस्सैल, बीमार और ईर्ष्यालु हो सकता है।

 

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सूर्य ग्रह के प्रभाव


लाल किताब के अनुसार, सूर्य के मित्र ग्रह बृहस्पति, मंगल और चंद्रमा हैं, जबकि शनि, राहु और केतु शत्रु ग्रह माने जाते हैं। जब सूर्य इन शत्रु ग्रहों के घर में प्रवेश कर जाए या उनकी राशि में उनके साथ बैठ जाए, तो व्यक्ति के भाग्य पर बुरा असर पड़ सकता है। अब सवाल उठता है कि यदि सूर्य शत्रु ग्रहों के साथ बैठा हो, तो कुंडली के अलग-अलग भावों के अनुसार व्यक्ति के जीवन में किस प्रकार की बाधाएं आती हैं।


कुंडली के 12 भाव में सूर्य ग्रह


पहला भाव-लाल किताब के अनुसार, कुंडली का पहला भाव स्वयं का भाव होता है। अगर यहां सूर्य अपने मित्र ग्रहों के साथ बैठा हो, तो व्यक्ति के स्वभाव में आत्मविश्वास, साहस और नेतृत्व क्षमता आती है। इसके विपरीत, यदि सूर्य शत्रु ग्रहों के साथ बैठा हो, तो व्यक्ति को अपने व्यवहार में संघर्ष करना पड़ सकता है।


दूसरा भाव-इसे पैतृक संपत्ति का भाव माना जाता है। अगर यहां सूर्य अशुभ स्थिति में बैठा हो, तो व्यक्ति को पैतृक धन की हानि का सामना करना पड़ सकता है। इसके अलावा, बचपन से ही आर्थिक चुनौतियां झेलनी पड़ सकती हैं।


तीसरा भाव-इस भाव में सूर्य ग्रह मौजूद हो, तो व्यक्ति में बोलने का गुण आता है। इसके विपरीत, अगर सूर्य अशुभ स्थिति में हो, तो व्यक्ति को अपनी बात रखने में कठिनाई आ सकती है।

 

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चौथा भाव-इसे माता का भाव माना जाता है। यदि यहां सूर्य शत्रु ग्रहों के साथ बैठ जाए, तो व्यक्ति को मानसिक अशांति का सामना करना पड़ सकता है।


पांचवां भाव-लाल किताब में इस भाव को संतान का भाव माना गया है। इस भाव में मौजूद ग्रहों के अनुसार संतान का स्वभाव तय होता है। अगर यहां सूर्य देव अशुभ स्थिति में बैठ जाएं, तो व्यक्ति को संतान संबंधी कष्ट झेलने पड़ सकते हैं।


छठा भाव-अगर इस भाव में सूर्य देव राहु, शनि या अन्य शत्रु ग्रहों के साथ बैठ जाएं, तो व्यक्ति को स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में आंखों की बीमारी या ब्लड प्रेशर जैसी समस्याएं हो सकती हैं।


सातवां भाव-अगर इस भाव में सूर्य और चंद्रमा एक साथ बैठ जाएं, तो व्यक्ति को लव लाइफ में तनाव का सामना करना पड़ सकता है।


आठवां भाव- इस भाव में सूर्य देव बैठ जाएं, तो व्यक्ति को धन हानि का सामना करना पड़ सकता है।

 

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नौवां भाव-यहां भाव में सूर्य देव बैठ जाएं, तो व्यक्ति की अपने पिता के साथ अनबन हो सकती है। साथ ही, उसे पिता का प्रेम भी नहीं मिल पाता।


दसवां भाव-यह भाव व्यक्ति के करियर को दर्शाता है। यदि यहां सूर्य अशुभ स्थिति में बैठा हो, तो व्यक्ति को करियर में चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।


ग्यारहवां भाव- इस भाव पर सूर्य का नकारात्मक प्रभाव हो, तो व्यक्ति को बार-बार नौकरी बदलनी पड़ सकती है, जिससे उसकी आय और सैलरी में अस्थिरता बनी रह सकती है।


बारहवां भाव-सूर्य अपने शत्रु ग्रहों के साथ बैठा हो, तो वह बेहद नकारात्मक प्रभाव देता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति को मानसिक परेशानियों या मानसिक रोगों का सामना करना पड़ सकता है।

 

नोट: यह लेख ग्रंथ और  ज्योतिषीय मान्यताओं और गणनाओं पर आधारित है। इसकी पुष्टि हम नहीं करते हैं।