जयपुर का आमेर किला अपनी भव्य वास्तुकला, ऐतिहासिक विरासत और शाही अंदाज के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध है। कभी यहां पहुंचने के लिए हाथी की सवारी करना पर्यटकों के लिए खास आकर्षण हुआ करता था। किले की ओर बढ़ते हुए हाथी की पीठ से दिखाई देने वाला नजारा लोगों के लिए यादगार अनुभव बन जाता था।
हालांकि, अब आमेर किले की यह पारंपरिक शाही सवारी धीरे-धीरे पर्यटकों की पसंद से बाहर होती जा रही है। पिछले सात वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो हाथी की सवारी करने वाले पर्यटकों की संख्या में करीब 70 प्रतिशत की गिरावट देखी गई है। इससे पर्यटन से जुड़े लोगों के लिए भी चिंता बढ़ी है। हाथी की सवारी में आई इस गिरावट के पीछे कई वजहें मानी जा रही हैं। पशु कल्याण को लेकर बढ़ती जागरूकता, पर्यटकों की बदलती पसंद और सवारी से जुड़े नियमों में बदलाव ने भी इसे प्रभावित किया है।
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जानिए क्या है आंकड़े
आमेर महल प्रशासन से उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2018-2019 में जहां 1,64,608 पर्यटकों ने हाथी की सवारी का आनंद लिया था। वहीं 2019-2020 में 1,08,378 पर्यटकों ने हाथी की सवारी करी थी। हालांकि, 2020-21 के कोरोना महामारी के दौरान पर्यटक स्थलों पर बेहद असर पड़ा था। इसी के चलते केवल 2,922 पर्यटकों ने हाथी की सवारी करी थी। इसके बाद धीरे- धीरे पर्यटकों द्वारा हाथी की सवारी करना बेहद कम होती चला गई। हालांकि, 2025-26 में केवल 48,474 पर्यटकों ने हाथी की सवारी का आनंद लिया।
क्या कारण है 70 प्रतिशत की गिरावट का ?
विश्व हाथी दिवस के मौके पर हाथियों के संरक्षण और कल्याण को लेकर जागरुकता बढ़ाए जाने के बीच आमेर के ये आंकड़े पर्यटनों की बदलती पसंद को भी जाहिर करती है। प्रशासन के अनुसार कोरोना महामारी के बाद पर्यटन गतिविधियां भले ही सामान्य हो गई हों लेकिन हाथी सवारी की लोकप्रियता पुराने स्तर पर नहीं लौट सकी।
वर्ष 2018-19 के मुकाबले 2025-26 में हाथी की सवारी करने वाले पर्यटकों की संख्या में एक लाख से अधिक की कमी दर्ज की गई। पर्यटन क्षेत्र से जुड़े लोगों का मानना है कि हाथी सवारी से पर्यटकों के दूर होने के पीछे विदेशी पर्यटकों की संख्या में कमी के साथ उनकी बदलती पसंद भी अहम कारण है। खासकर विदेशी पर्यटकों में पशु कल्याण को लेकर जागरुकता बढ़ी है। यही वजह है कि कई पर्यटक जानवरों के इस्तेमाल वाली गतिविधियों के बजाय जीप सफारी और प्रकृति आधारित पर्यटन को ज्यादा पसंद कर रहे हैं।
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क्या कहा पर्यटन विशेषज्ञों ने ?
पर्यटन विशेषज्ञों का कहना है कि दुनिया भर में पशु कल्याण से जुड़े अंतरराष्ट्रीय अभियानों के कारण कई विदेशी पर्यटक हाथी की सवारी से परहेज कर रहे हैं। उन्होंने कहा कई अंतरराष्ट्रीय टूर संचालकों और ट्रैवल कंपनियों ने अपनी पशु कल्याण नीतियों के तहत हाथी की सवारी को अपने टूर पैकेज से हटा दिया है। साथ ही उन्होंने कहा देश में राष्ट्रीय उद्यानों, वाइल्ड लाइफ सेंचुरी और अन्य वन्यजीव पर्यटन स्थलों के बढ़ते विकल्पों ने भी पर्यटकों के लिए नए रास्ते खोल दिए हैं।
अभियानों के कारण से विदेशी पर्यटकों में जीप सफारी और अनुभव आधारित पर्यटन की मांग बढ़ रही है। जबकि हाथी सवारी धीरे-धीरे वैकल्पिक गतिविधि बनती जा रही है। साथ ही यूरोपीय देशों की आर्थिक परिस्थितियों और पश्चिम एशिया में जारी तनाव का असर भी अंतरराष्ट्रीय पर्यटन पर पड़ा है।
कैसे जयपुर के कारोबार पर पड़ा असर
इजराइल और आसपास के क्षेत्रों से आने वाले पर्यटकों की संख्या में कमी का असर जयपुर के पर्यटन कारोबार पर भी पड़ा है। आमेर में हाथी सवारी को लेकर पिछले कुछ वर्षों में पशु अधिकार संगठनों ने भी विरोध-प्रदर्शन किए हैं। इन संगठनों ने पर्यटन में हाथियों के इस्तेमाल के साथ उनके स्वास्थ्य और देखभाल से जुड़े मुद्दे उठाए हैं। इन विवादों के कारण भी हाथी सवारी को लेकर पर्यटकों पर असर पड़ा।
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क्या कहा हाथी गांव विकास समिति के अध्यक्ष ने ?
पर्यटन विशेषज्ञ संजय कौशिक ने कहा कि आमेर महल राजस्थान का ऐसा प्रमुख ऐतिहासिक स्थल है जहां कई दशकों से हाथी की सवारी होती रही है। हालांकि, पिछले करीब पांच वर्षों में इसे लेकर पर्यटकों का रुझान लगातार कम हुआ है और इसके पीछे कई कारण हैं। हाथी गांव विकास समिति के अध्यक्ष बल्लू खान ने कहा कि विदेशी पर्यटकों की संख्या में कमी के कारण आमेर महल में हाथियों के फेरे भी कम हो गए हैं। उन्होंने बताया कि एक हाथी के भोजन पर प्रतिदिन करीब 4,000 रुपये तक खर्च आता है।
विशेषज्ञों का कहना था कि बदलते पर्यटन रुझानों के बीच हाथियों के संरक्षण और पर्यटन के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। जयपुर की पहचान आमेर किले और उसकी ऐतिहासिक विरासत से गहराई से जुड़ी है। ऐसे में भविष्य में पर्यटन को अधिक जिम्मेदार, पशु-अनुकूल और पर्यावरण केंद्रित बनाने पर जोर देना होगा।
