उत्तर प्रदेश के हाथरस में हुए दर्दनाक हादसे को छह साल हो चुके हैं लेकिन परिवार आज भी परेशान है। सितंबर 2020 में 19 साल की दलित युवती की मौत के बाद हाथरस का बुलगढ़ी गांव देशभर में चर्चा का केंद्र बन गया था। पुलिस की ओर से की गई कार्रवाई पर देशभर में सवाल उठाए गए। अब छह साल बाद पीड़िता का परिवार कह रहा है कि सुरक्षा के नाम पर उसकी जिंदगी घर की चारदीवारी में कैद होकर रह गई है। परिवार को घर और सरकारी नौकरी का वादा भी अभी तक सरकार ने पूरा नहीं किया है। इसके चलते यह मामला एक बार फिर चर्चा में है।
हाथरस पीड़िता के परिवार के मुताबिक, उनका घर के बाहर निकलना मुश्किल है औ उनका कोई सामाजिक जीवन नहीं बचा है। परिवार का आरोप है कि कोई सदस्य सामान्य तरीके से काम भी नहीं कर पा रहा है। पीड़िता के भाई ने कहा कि ऐसा लगता है जैसे उन्हें घर में ही जेल में बंद कर दिया गया हो। परिवार का कहना है कि लंबे समय से चली आ रही कानूनी लड़ाई और सुरक्षा व्यवस्था ने उनकी आर्थिक स्थिति भी बेहद खराब कर दी है।
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अभी तक नहीं मिला घर
हाथरस रेप पीड़िता के परिवार को सरकार की ओर से घर और एक सरकारी नौकरी देने का आश्वासन दिया गया था। हालांकि, छह साल के बाद भी परिवार को अब तक घर नहीं मिला है। इस मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सख्ती दिखाई है। कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को पीड़िता के परिवार को तीन महीने के भीतर नोएडा या गाजियाबाद में घर देने के लिए कहा है।
इस मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस जसप्रीत सिंह की बेंच ने राज्य सरकार के पहले के उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें परिवार के लिए कासगंज, एटा या अलीगढ़ में घर का विकल्प दिया गया था। पीड़िता के भाई ने बताया कि सराकर ने उनहें इन जगहों पर भी घर इस शर्त पर देने के लिए कहा कि परिवार अपनी पैतृक जमीन सरकार को सुपुर्द करेगा। कोर्ट ने कहा कि सरकार के इस फैसले में परिवार की नोएडा या गाजियाबाद में घर देने की मांग पर ठीक से विचार ही नहीं किया गया। कोर्ट ने राज्य के रवैये में गैर जरूरी विरोध करार दिया और कहा कि सरकार का रवैया ऐसा प्रतीत होता है जैसे वह मामले को पीड़ित परिवार के खिलाफ एक प्रतिद्वंद्वी मुकदमे की तरह देख रही हो।
सुरक्षा मिली लेकिन परेशानी बढ़ी
पीड़ित परिवार में इस समय पीड़िता के माता-पिता, दो भाई, एक भाभी और तीन बच्चे यानी कुल आठ सदस्य हैं। परिवार का कहना है कि उन्हें सीआरपीएफ की सुरक्षा मिली हुई है, लेकिन यह सुरक्षा उनकी सामान्य जिंदगी की राह में भी बड़ी रुकावट बन गई है। परिवार के मुताबिक, जब भी किसी कानूनी सुनवाई के लिए लखनऊ, दिल्ली या किसी दूसरे शहर जाना पड़ता है, तो सुरक्षा के बावजूद उन्हें ट्रैवल के लिए खुद ही व्यवस्था करनी पड़ती है। इसके लिए खर्च परिवार पर आर्थिक बोझ बन रहा है। परिवार का कहना है कि पिछले छह सालों में कानूनी प्रक्रिया में उनकी बड़ी रकम खर्च हो गई है। इसके साथ ही परिवार का कहना है कि कुछ स्थानीय लोगों की दुश्मनी के कारण उनकी सुरक्षा को लेकर चिंता लगातार बनी हुई है।
कहां घर मांग रहा पीड़ित परिवार?
पीड़िता के भाई का कहना है कि नोएडा या गाजियाबाद में बसने से परिवार को सुरक्षा के साथ-साथ सामान्य जिंदगी शुरू करने का मौका मिल सकता है। उनका कहना है कि एनसीआर में रोजगार के ज्यादा अवसर हैं और परिवार के दूसरे सदस्य भी काम करके अपनी आर्थिक स्थिति सुधार सकते हैं। बच्चों की पढ़ाई के लिहाज से भी परिवार नोएडा या गाजियाबाद को बेहतर विकल्प मानता है। कोर्ट के पुराने आदेश में परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने का वादा किया गया था लेकिन अब तक नौकरी नहीं मिली। ऐसे में अब कोर्ट ने इस पर भी सरकार से जवाब मांगा है।
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2020 में हुई थी दर्दनाक घटना
इस पूरे मामले की शुरुआत सितंबर 2020 की उस घटना से हुई थी, जिसमें 19 साल दलित युवती का गैंगरेप किया जाता है। गंभीर चोटों के बाद युवती को दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल ले जाया गया, जहां 29 सितंबर 2020 को उसकी मौत हो गई। इसके बाद रात में उसके शव का अंतिम संस्कार किए जाने को लेकर भी बड़ा विवाद हुआ। राजनीतिक दलों ने और सामाजिक संगठनों ने आवाज उठाई तो उन्हें पीड़ित परिवार से मिलने नहीं दिया गया, जिसके बाद जमकर विवाद हुआ।
परिवार ने आरोप लगाया था कि अंतिम संस्कार उनकी सहमति के बिना किया गया, जबकि प्रशासन ने इस आरोप से इनकार किया था। इस घटना के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्वत संज्ञान लिया और पूरे मामले की जांच शुरू की। कोर्ट ने ही परिवार के पुनर्वास और नौकरी देने का आदेश सरकार को दिया था। अब हाई कोर्ट ने तीन महीने के भीतर सरकार को पीड़ित परिवार को घर देने के लिए कहा।
