हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले के नालागढ़ में राष्ट्रीय राजमार्ग-105 (NH-105) पर छह पुलों के निर्माण के लिए खनन सामग्री की आपूर्ति में कथित फर्जीवाड़े का मामला सामने आया है। बद्दी पुलिस ने इस मामले में नालागढ़ के पूर्व विधायक केएल ठाकुर के बेटे अंचित ठाकुर, गणपति भारत प्राइवेट लिमिटेड और अन्य अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है। मामला कथित तौर पर फर्जी एम-फॉर्म और ट्रांजिट पास के इस्तेमाल से जुड़ा है, जिनके जरिए निर्माण कार्य के लिए स्टोन क्रशर से सामग्री की आपूर्ति किए जाने का आरोप है।

 

इस प्रकरण ने अब राजनीतिक तूल भी पकड़ लिया है। पूर्व विधायक केएल ठाकुर ने अपने परिवार के खिलाफ राजनीतिक षड्यंत्र का आरोप लगाते हुए कहा है कि वे पहले ही इस मामले की जानकारी पुलिस को दे चुके हैं। वहीं, नालागढ़ के विधायक हरदीप बावा ने कहा कि सरकार और पुलिस मामले की जांच कर रही हैं तथा दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।

डीजीपी को शिकायत के बाद शुरू हुई जांच

आरटीआई एक्टिविस्ट मोहन लाल शर्मा की शिकायत के बाद सामने आया। उन्होंने पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) को शिकायत देकर आरोप लगाया था कि ठाकुर रुहानी स्टोन क्रशर से निर्माण सामग्री की आपूर्ति के लिए कथित फर्जी एम-फॉर्म और ट्रांजिट पास का इस्तेमाल किया गया। शिकायत में आरोप लगाया गया कि यह सामग्री NH-105 पर छह पुलों के निर्माण कार्य में लगी गणपति भारत प्राइवेट लिमिटेड को उपलब्ध करवाई गई।

शिकायत मिलने के बाद पुलिस मुख्यालय के निर्देश पर मामले की जांच करवाई गई। परवाणू के डीएसपी अनिल शर्मा ने इस प्रकरण की जांच की। जांच के दौरान खनन विभाग की सत्यापन रिपोर्ट, जीएसटी रिकॉर्ड, बैंकिंग लेन-देन, रनिंग अकाउंट बिल और अन्य संबंधित दस्तावेजों की पड़ताल की गई। जांच के बाद 24 अक्तूबर को पुलिस थाना नालागढ़ में एफआईआर दर्ज की गई। बद्दी के एसपी विनोद धीमान ने मामले में एफआईआर दर्ज होने की पुष्टि की है।

 

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2418 कथित फर्जी फॉर्म का दावा, करोड़ों की रॉयल्टी का सवाल

इस मामले में सबसे गंभीर पहलू कथित तौर पर बड़ी संख्या में फर्जी एम-फॉर्म और ट्रांजिट पास के इस्तेमाल का है। शिकायतकर्ता की ओर से आरोप लगाया गया है कि कुल 2418 फर्जी फॉर्म तैयार किए गए थे। इससे सरकारी खजाने को करोड़ों रुपये की रॉयल्टी का नुकसान होने का दावा किया गया है। जांच से जुड़े दस्तावेजों में अलग-अलग तारीखों के रनिंग अकाउंट बिलों के आधार पर लंबे समय तक खनन सामग्री के परिवहन से संबंधित दस्तावेजों के इस्तेमाल का संकेत मिलने की बात सामने आई है। कथित फर्जी फॉर्म की संख्या, वास्तविक वित्तीय नुकसान, रॉयल्टी की देनदारी और संबंधित व्यक्तियों की भूमिका का अंतिम निर्धारण जांच तथा उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर होना है। शिकायतकर्ता के आरोपों को अभी न्यायिक रूप से प्रमाणित तथ्य नहीं माना जा सकता।

स्टोन क्रशर से निर्माण स्थल तक कैसे पहुंची सामग्री?

जांच का एक अहम बिंदु ठाकुर रुहानी स्टोन क्रशर से निर्माण सामग्री की आपूर्ति और उसके साथ इस्तेमाल किए गए दस्तावेजों के बीच संबंध है। जांच रिकॉर्ड के अनुसार, संबंधित अवधि में अंचित ठाकुर स्टोन क्रशर का प्रबंधन और नियंत्रण देख रहे थे। इसी आधार पर उनका नाम मामले में सामने आया है। अब जांच में यह स्थापित करना महत्वपूर्ण होगा कि कथित फर्जी एम-फॉर्म और ट्रांजिट पास कहां तैयार किए गए, उन्हें किसने जारी किया या उपलब्ध करवाया, निर्माण सामग्री की आपूर्ति में उनका इस्तेमाल किस तरह हुआ और संबंधित कंपनियों व व्यक्तियों की वास्तविक भूमिका क्या रही। पुलिस को यह भी पता लगाना होगा कि दस्तावेजों का इस्तेमाल जानबूझकर किया गया था या नहीं और इस कथित प्रक्रिया से किसी को आर्थिक लाभ पहुंचा अथवा सरकारी राजस्व को नुकसान हुआ।

 

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खनन विभाग की जांच प्रक्रिया भी सवालों के घेरे में

इस मामले में केवल कथित फर्जी दस्तावेजों के इस्तेमाल का सवाल नहीं है, बल्कि निर्माण स्थलों पर खनन सामग्री से जुड़े दस्तावेजों के सत्यापन की व्यवस्था पर भी सवाल उठे हैं। जांच में खनन विभाग के स्तर पर दस्तावेजों की जांच और सत्यापन प्रक्रिया में कमियां सामने आने की बात कही गई है। जानकारी के अनुसार, निर्माण स्थल पर खनिज सामग्री प्राप्त होने के दौरान ट्रांजिट पास का सत्यापन करने के लिए निर्धारित प्रक्रिया मौजूद होने के बावजूद जांच काफी हद तक रैंडम तरीके से की जाती थी।

सत्यापन से संबंधित समुचित समकालीन रिकॉर्ड नहीं रखे जाने की बात भी सामने आई है। जिन दस्तावेजों को बाद में कथित तौर पर फर्जी पाया गया, उनके पहले स्वीकार किए जाने से सत्यापन व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े हुए हैं। अब जांच का दायरा इस बात तक भी पहुंच सकता है कि संबंधित अधिकारियों ने निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया या नहीं और किसी स्तर पर जानबूझकर अनियमितता की गई थी या नहीं। हालांकि, किसी अधिकारी की संलिप्तता को लेकर भी अंतिम निष्कर्ष जांच के बाद ही निकाला जा सकेगा।

केएल ठाकुर बोले- परिवार को निशाना बनाया जा रहा

पूर्व विधायक केएल ठाकुर ने एफआईआर को राजनीतिक षड्यंत्र करार दिया है। उनका कहना है कि उनके परिवार के खिलाफ राजनीतिक दुर्भावना से कार्रवाई की जा रही है। उन्होंने कहा कि इस मामले के संबंध में वह पहले ही पुलिस को जानकारी दे चुके हैं। उनके मुताबिक, उनके परिवार को निशाना बनाया जा रहा है और आरोपों के पीछे राजनीतिक मंशा है। केएल ठाकुर ने मामले में लगाए गए आरोपों को गलत बताते हुए अपना पक्ष रखा है। उनकी इस प्रतिक्रिया के बाद प्रकरण में राजनीतिक टकराव और बढ़ने के आसार हैं। हालांकि, राजनीतिक षड्यंत्र के उनके आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

हरदीप बावा बोले- जांच जारी, आरोपी नहीं बचेंगे

नालागढ़ के विधायक हरदीप बावा ने मामले को गंभीर बताते हुए कहा कि सरकार और पुलिस इसकी जांच कर रही हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि जांच में दोषी पाए जाने वाले लोगों को बख्शा नहीं जाएगा। इस प्रकरण को लेकर सामने आए आरोपों ने निर्माण सामग्री की आपूर्ति, खनन नियमों के अनुपालन और सरकारी राजस्व की निगरानी से जुड़े सवालों को भी चर्चा में ला दिया है। एक ओर पूर्व विधायक केएल ठाकुर इसे राजनीतिक षड्यंत्र बता रहे हैं, तो दूसरी ओर सत्तापक्ष की ओर से मामले की जांच और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की बात कही जा रही है।

इन धाराओं में दर्ज हुआ मामला

पुलिस के अनुसार, एफआईआर भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 318(2), 336(3), 338, 340(2) और 61(2) के तहत दर्ज की गई है। ये धाराएं मामले के आरोपों के संदर्भ में धोखाधड़ी, जालसाजी, कथित जाली दस्तावेजों के बेईमानी से इस्तेमाल और आपराधिक षड्यंत्र जैसे पहलुओं से संबंधित हैं। एफआईआर में अंचित ठाकुर, गणपति भारत प्राइवेट लिमिटेड और अन्य अज्ञात व्यक्तियों को नामजद किया गया है। पुलिस अब कथित फर्जी दस्तावेजों के स्रोत, उनके इस्तेमाल, सामग्री की आपूर्ति और इसमें शामिल व्यक्तियों की भूमिका की जांच कर रही है।

 

अब जांच के प्रमुख सवाल: क्या वास्तव में 2418 फॉर्म फर्जी थे? कितनी खनन सामग्री की आपूर्ति इन दस्तावेजों के आधार पर हुई? सरकारी खजाने को वास्तविक नुकसान कितना हुआ? और दस्तावेजों के सत्यापन में किन लोगों की जिम्मेदारी थी? इन सवालों के जवाब जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट हो पाएंगे। एफआईआर दर्ज होना आरोपों का अंतिम प्रमाण नहीं है और आरोपितों की दोषसिद्धि अभी स्थापित नहीं हुई है।