हिमाचल की पारंपरिक थाली अब केवल खानपान और संस्कृति तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि कुपोषण से लड़ने और जनस्वास्थ्य सुधारने की सरकारी रणनीति का भी हिस्सा बनेगी। प्रदेश सरकार ने हिमाचल प्रदेश पोषण नीति, 2026 को स्वीकृति प्रदान कर दी है। नीति में पारंपरिक हिमाचली खानपान, स्थानीय स्तर पर उपलब्ध पौष्टिक खाद्य पदार्थों और संतुलित आहार को बढ़ावा देने के साथ खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता जांचने की व्यवस्था मजबूत करने पर जोर दिया गया है।

 

नीति का उद्देश्य कुपोषण, एनीमिया, सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी और खानपान में विविधता के अभाव जैसी चुनौतियों से निपटना है। इसके साथ ही खानपान से जुड़ी उभरती बीमारियों को लेकर भी व्यापक रणनीति तैयार करने की बात कही गई है। हालांकि, नीति को मंजूरी मिलने के साथ अब इसके वास्तविक असर का दारोमदार इसके क्रियान्वयन, बजट और जमीनी निगरानी पर रहेगा।

थाली में स्थानीय उत्पाद, पोषण में विविधता पर जोर

हिमाचल के पारंपरिक खानपान में शामिल दालें, मोटे अनाज, हरी पत्तेदार सब्जियां, मौसमी फल और दुग्ध उत्पाद पोषण नीति के प्रमुख घटकों में शामिल होंगे। स्थानीय स्तर पर उपलब्ध पौष्टिक खाद्य पदार्थों के इस्तेमाल को प्रोत्साहित कर परिवारों तक संतुलित आहार पहुंचाने की दिशा में काम किया जाएगा। इस पहल का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि पोषण को केवल भोजन की उपलब्धता तक सीमित नहीं रखा गया है।

 

नीति में इस बात पर भी जोर है कि लोगों को ऐसा आहार मिले, जो पौष्टिक होने के साथ किफायती और उनकी स्थानीय खानपान की परंपराओं के अनुरूप हो। स्थानीय खाद्य पदार्थों को प्रोत्साहन मिलने से कृषि और बागवानी से जुड़े उत्पादों की मांग बढ़ाने की संभावनाएं भी बन सकती हैं। हालांकि, इसका वास्तविक लाभ स्थानीय उत्पादकों तक कितना पहुंचेगा, यह आगे तय होने वाली योजनाओं और उनके क्रियान्वयन पर निर्भर करेगा।

बच्चे के शुरुआती 1000 दिन से किशोरों तक नजर

पोषण नीति में जीवन-चक्र आधारित दृष्टिकोण अपनाया गया है। इसमें जीवन के पहले 1,000 दिनों, मातृ एवं शिशु पोषण, किशोरों और समाज के कमजोर वर्गों की जरूरतों पर विशेष ध्यान देने की बात कही गई है। बच्चे के जीवन के शुरुआती दौर में पोषण की कमी उसके शारीरिक विकास और स्वास्थ्य पर दीर्घकालिक असर डाल सकती है। ऐसे में गर्भावस्था से लेकर शिशु के शुरुआती विकास तक पोषण संबंधी सेवाओं को मजबूत करना नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा।

 

किशोरों में एनीमिया और पोषण संबंधी कमियों से निपटने के लिए भी समन्वित प्रयासों पर जोर दिया गया है। दूरदराज और जनजातीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों तक पोषण एवं स्वास्थ्य सेवाओं की बेहतर पहुंच सुनिश्चित करने का लक्ष्य रखा गया है।

 

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खाने में पोषण के साथ गुणवत्ता की जांच भी

नीति का एक अहम पक्ष खाद्य सुरक्षा से जुड़ा है। सरकार ने खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता की निगरानी मजबूत करने के लिए कंडाघाट स्थित संयुक्त परीक्षण प्रयोगशाला के उन्नयन और प्रदेश में चार नई प्रयोगशालाएं स्थापित करने की परिकल्पना की है। धर्मशाला में नई प्रयोगशाला स्थापित करने की प्रक्रिया पहले ही शुरू की जा चुकी है। इन प्रयोगशालाओं के माध्यम से खाद्य पदार्थों में मिलावट और दूषित खाद्य सामग्री की पहचान करने तथा निर्धारित खाद्य सुरक्षा मानकों के अनुपालन की निगरानी को बेहतर बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है।

 

प्रयोगशालाओं के प्रभावी संचालन के लिए आवश्यक पदों के सृजन और उन्हें भरने का प्रावधान भी नीति में किया गया है। यह व्यवस्था इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि केवल प्रयोगशालाओं की स्थापना से खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होगी। नियमित सैंपलिंग, समयबद्ध जांच, पर्याप्त स्टाफ और नियमों के उल्लंघन पर प्रभावी कार्रवाई भी उतनी ही जरूरी होगी।

मोबाइल जांच से डिजिटल पोषण निगरानी तक

खाद्य सुरक्षा और पोषण संबंधी निगरानी को आधुनिक बनाने के लिए नीति में मोबाइल खाद्य परीक्षण सुविधाओं, जल गुणवत्ता की निगरानी और प्रस्तावित राज्य पोषण पोर्टल के माध्यम से आंकड़ों के डिजिटल एकीकरण की परिकल्पना की गई है। इससे विभिन्न क्षेत्रों में पोषण संबंधी जरूरतों और समस्याओं की पहचान करने तथा योजनाओं की निगरानी में सहायता मिलने की उम्मीद है।

 

डिजिटल आंकड़ों के आधार पर जरूरतमंद क्षेत्रों तक संसाधन पहुंचाने और समय पर सुधारात्मक कदम उठाने की दिशा में भी मदद मिल सकती है। हालांकि, इस व्यवस्था की उपयोगिता आंकड़ों की नियमित उपलब्धता, उनकी विश्वसनीयता और विभागीय स्तर पर उनके प्रभावी इस्तेमाल से तय होगी।

 

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कई विभाग मिलकर संभालेंगे पोषण की जिम्मेदारी

पोषण को केवल स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी मानने के बजाय नीति में बहु-विभागीय समन्वय पर जोर दिया गया है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, महिला एवं बाल विकास, शिक्षा, कृषि, बागवानी, खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति, जल शक्ति, ग्रामीण विकास और पंचायती राज विभाग मिलकर इस दिशा में काम करेंगे। विभागों के बीच योजना निर्माण, क्रियान्वयन और निगरानी को मजबूत करने के लिए राज्य पोषण समन्वय प्रकोष्ठ और जिला पोषण समन्वय प्रकोष्ठ स्थापित करने का प्रस्ताव है। इसके साथ ही एकीकृत बाल विकास सेवा, पीएम पोषण योजना और सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत संचालित पोषण संबंधी कार्यक्रमों को मजबूत बनाने पर भी बल दिया गया है। नीति में सामुदायिक सहभागिता और व्यवहार परिवर्तन संचार को भी महत्व दिया गया है, ताकि स्वस्थ खानपान की आदतों को केवल सरकारी कार्यक्रमों तक सीमित रखने के बजाय परिवारों और समुदायों के दैनिक जीवन का हिस्सा बनाया जा सके।

घोषणा से आगे अब जमीन पर असर की चुनौती

मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविन्द्र सिंह सुक्खू ने कहा कि पोषण मानव विकास की आधारशिला है और प्रत्येक बच्चे, महिला तथा नागरिक को सुरक्षित, पौष्टिक एवं किफायती भोजन उपलब्ध होना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि सरकार स्वस्थ, सुपोषित और सशक्त हिमाचल के निर्माण के लिए प्रतिबद्ध है। मुख्यमंत्री के अनुसार, नीति में कमजोर और दूरदराज के क्षेत्रों की पोषण संबंधी जरूरतों को प्राथमिकता दी गई है। खाद्य परीक्षण प्रयोगशालाओं को सुदृढ़ करने, गुणवत्ता निगरानी में सुधार और पारंपरिक हिमाचली आहार को बढ़ावा देने से जनस्वास्थ्य की रक्षा में मदद मिलेगी।

 

नीति की असली परीक्षा अब इसके धरातल पर उतरने में होगी। स्थानीय स्तर पर पौष्टिक खाद्य पदार्थों की उपलब्धता, बच्चों और महिलाओं तक पोषण सेवाओं की पहुंच, खाद्य पदार्थों की नियमित जांच और विभागीय जवाबदेही जैसे पहलू इसकी सफलता तय करेंगे। पारंपरिक हिमाचली थाली को पोषण अभियान से जोड़ने की यह पहल तभी सार्थक होगी, जब इसका लाभ शहरों के साथ ग्रामीण, दुर्गम और जनजातीय क्षेत्रों में रहने वाले परिवारों तक भी पहुंचे।