झारखंड हाई कोर्ट ने मंगलवार को यौन हिंसा और पॉक्सो मामलों में पीड़िताओं के अधिकारों को लेकर राज्य सरकार को कई निर्देश दिए। इस अहम फैसले में कोर्ट ने पीड़िताओं की बेहतर सुरक्षा, त्वरित न्याय और पुनर्वास के लिए राज्य सरकार, पुलिस और संबंधित विभागों को 19 सख्त और तत्काल लागू करने वाले निर्देश जारी किए हैं।

 

हाई कोर्ट का कहना है कि इसका मकसद रेप सर्वाइवर्स के लिए कानूनी और सामाजिक माहौल को बेहतर बनाना और समाज को यह उम्मीद दिलाना है कि वह धीरे-धीरे पीड़ित को दोषी ठहराने का रवैया बदलेगा। इसमें जीरो FIR रजिस्ट्रेशन को जरूरी करने से लेकर 'टू-फिंगर टेस्ट' पर पूरी तरह रोक लगाने तक शामिल है।

 

चीफ जस्टिस एम एस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की बेंच ने रेप सर्वाइवर्स की सुरक्षा और पुनर्वास के बारे में स्वतः संज्ञान लेते हुए PIL पर सुनवाई की।

 

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समाज में मजाक उड़ाया जाता है- कोर्ट

हाई कोर्ट ने अपने अहम फैसले में कहा, 'हमें यह देखकर दुख हो रहा है कि कुछ मामलों में, रेप पीड़ितों का समाज में ऐसे मजाक उड़ाया जाता है जैसे वे आरोपी हों। कुछ मामलों में पीड़ितों को समाज से अलग-थलग कर दिया जाता है, जिससे पीड़ितों और उनके परिवारों को बहुत मुश्किलें होती हैं, जिसमें मानसिक परेशानी भी शामिल है।'

पीड़ितों को घर पर रहने में मुश्किल

ऑर्डर में कहा गया कि ऐसे भी मामले हैं जहां पीड़ितों और उनके परिवार वालों को पड़ोसियों के बेपरवाह रवैये की वजह से अपने असली घर पर रहने में मुश्किल होती है, जिससे उन्हें वह जगह छोड़ने पर मजबूर होना पड़ता है। बेंच ने कहा, 'इसके लिए समाज में जागरूकता की जरूरत है। हमें उम्मीद है कि पीड़ितों को दोषी ठहराने वाला लोगों का रवैया धीरे-धीरे बदलेगा।'

महिलाओं को खुद की सुरक्षा के लिए ट्रेनिंग

  • समग्र शिक्षा स्कीम के तहत रेप सर्वाइवर्स को 'रानी लक्ष्मी बाई आत्म रक्षा प्रशिक्षण' (RAKSHA) में 'इंडिया के फ्लैगशिप इंटीग्रेटेड स्कूल एजुकेशन प्रोग्राम' के तहत सेल्फ-डिफेंस ट्रेनिंग का हिस्सा दिया गया है।
  • इस स्कीम के तहत, सरकारी स्कूलों/कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों में छठी से बारहवीं क्लास की छात्राओं को सेल्फ-डिफेंस ट्रेनिंग दी जाती है ताकि उनकी सुरक्षा, सिक्योरिटी और एम्पावरमेंट पक्का हो सके।
  • इन क्लास की छात्राओं को तीन महीने के लिए सेल्फ-डिफेंस ट्रेनिंग दी जाती है और इसके लिए फंड दिया जाता है। इसे हर स्कूल के लिए हर महीने 3,000 रुपये से बढ़ाकर 5,000 रुपये कर दिया गया है।
  • लड़कियों को अपनी सेफ्टी के लिए मौके के हथियार/इम्प्रोवाइज्ड सेल्फ-डिफेंस हथियार के तौर पर कीचेन, दुपट्टा, स्टोल, मफलर, बैग, पेन/पेंसिल, नोटबुक वगैरह जैसी रोजमर्रा की चीजों का इस्तेमाल करना सिखाया जाता है।

सब-इंस्पेक्टर रैंक से नीचे की अधिकारी ही बयान ले

कोर्ट ने कहा कि रेप पीड़ितों के साथ पूरी संवेदनशीलता से पेश आना संबंधित पुलिस अधिकारियों की जिम्मेदारी है। कोर्ट ने यह भी कहा कि पीड़ितों का बयान सब-इंस्पेक्टर रैंक से नीचे की महिला पुलिस अधिकारी ही रिकॉर्ड करे।

 

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कोर्ट ने जोर देकर कहा, 'इस तरह के मामलों से निपटने वाले पुलिस कर्मचारियों को सही ट्रेनिंग दी जानी चाहिए और उनकी सही ट्रेनिंग के लिए समय-समय पर सेंसिटाइजेशन प्रोग्राम चलाया जाना चाहिए। पुलिस को यह पक्का करना चाहिए कि रेप पीड़ितों को उनके बयान रिकॉर्ड करते समय एक दोस्ताना माहौल दिया जाए ताकि वे बिना किसी झिझक के सही बातें बता सकें। उनके बयान रिकॉर्ड करते समय उन पर कोई ज़ोर या दबाव नहीं डाला जाना चाहिए।'

रेप से पैदा हुए बच्चों के रिहैबिलिटेशन और शिक्षा

फैसले में बचाव के लिए मदद पर जोर दिया गया है, जिसमें कमजोर परिवारों को स्पॉन्सरशिप देना शामिल है, ताकि बच्चे स्कूल में रहें और उन्हें बाल मजदूरी, शादी या शोषण से बचाया जा सके। इसलिए राज्य सरकार को हर जिले में नोडल ऑफिसर नियुक्त करने का निर्देश दिया गया है ताकि यह पक्का किया जा सके कि रेप की घटनाओं से पैदा हुए बच्चों को 8वीं कक्षा तक मुफ्त और जरूरी शिक्षा दी जाए।

 

नोडल ऑफिसर यह भी पक्का करेंगे कि जो काबिल छात्र बाद में IITs, NITs, AIIMs या IIMs जैसे बड़े सरकारी इंस्टिट्यूट में चुने जाते हैं, उन्हें राज्य सरकार स्कॉलरशिप दे।

 

समय पर ट्रायल के लिए निर्देश के लिए कोर्ट ने कहा कि पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिया जाता है कि वे रेप के मामलों की शुरुआती जांच पंद्रह दिनों के अंदर पूरी करें।

कोर्ट का राज्य को निर्देश

झारखंड के DGP को निर्देश दिया गया है कि वे BNSS, 2023 के सेक्शन 173 के नियमों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करें और इसके लिए सभी पुलिस स्टेशनों को जरूरी निर्देश जारी करें और पालन देखने के लिए समय-समय पर मॉनिटरिंग करें।