कर्नाटक हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में माना है कि एक ही मकान के अलग-अलग कमरों में रहना अपने आप में वैवाहिक क्रूरता नहीं माना जा सकता है। हाई कोर्ट ने यह टिप्पणी एक पति द्वारा दायर अपील को खारिज करते हुए कही। दरअसल, इससे पहले फैमिली कोर्ट ने क्रूरता के आधार पर शादी को भंग कर दिया था और रति को अपनी पत्नी को हर महीने भरण पोषण के लिए 25,000 रुपये देने का निर्देश दिया था।

 

हाई कोर्ट के जस्टिस डीके सिंह और जस्टिस एच शांति भूषण ने सुनवाई के दौरान कहा, 'पति-पत्नी अलग-अलग कमरों में रहते हैं। केवल परिस्थिति के आधार पर क्रूरता के निष्कर्ष को सही नहीं ठहराया जा सकता है।'

 

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पति-पत्नी के आरोप

 

इस मामले में पत्नी ने आरोप लगाया था कि उसका पति उसके साथ शारीरिक, मौखिक और भावनात्मक क्रूरता की। साथ कहा कि पति ने बच्चों की उपेक्षा की और इसके व्यवहार मालिकाना हक जताने वाला था।

 

हालांकि, दोनों कुछ समय तक ही एक दूसरे के साथ एक ही मकान में रहे, लेकिन दोनों अलग-अलग कमरों में रहते थे। दोनों व्यावहारिक तौर से अलग-अलग जीवन जी रहे थे। दोनों की शादी साल 2001 में हुई था, दोनों को दो बच्चे भी हैं। 

 

ससुराल छोड़कर चली गई पत्नी

 

बाद में पत्नी अपने बच्चों को लेकर ससुराल छोड़कर चली गई। पति ने सभी आरोपों का खंडन किया और दावा किया कि पत्नी अपने मायके वालों के बहकावे में थी और रिश्तों में खटास के लिए वह खुद जिम्मेदार थी। 

 

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हाई कोर्ट ने क्या कहा?

 

हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए कानूनी और वैवाहिक संबंधों को लेकर की अहम बातें कीं। कोर्ट ने कहा कि अलग-अलग कमरों में रहने की घना को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता है। बार-बार के झगड़े, मौखिक गाली-गलौज, भावानात्क उपेक्षा, खराब व्यवहार और सुलह की असफल कोशिशों के प्रभाव को देखते हुए हिंदू विवाद अधिनियम की धारा 13 (1)(ia) तहत मानसिक क्रूरता को सिद्ध किया है।

 

कर्माचक हाई कोर्ट ने कहा, 'किसी जीवनसाधी से यह उम्मीद नहीं की जा सकती है कि वह अनिश्चित काल तर ऐसे व्यवहार को सहन करे जो लगातार मानसिक पीड़ा की वजह बनती हो और वैवाहिक सुरक्षा के बुनियादी तत्वों को नष्ट करती हो।'