केरल हाई कोर्ट ने चार साल पुराने दुष्कर्म और यौन उत्पीड़न के मामले में निचली अदालत की सजा बरकरार रखी है। इससे पहले त्रिशूर की एक विशेष अदालत ने आरोपी को 10 साल की कठोर कैद और एक लाख रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। आरोपी ने इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। सुनवाई के दौरान आरोपी के वकील ने घटना की तारीख में अंतर, शिकायत दर्ज कराने में देरी और महिला के शरीर पर चोट के निशान न होने की दलील दी। हाई कोर्ट ने इन दलीलों पर विचार किया, लेकिन सजा में बदलाव नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि इन कमियों के आधार पर महिला की गवाही को खारिज नहीं किया जा सकता।

 

यह मामला अक्टूबर 2022 का है। उस महीने 73 वर्षीय महिला अपने बेटे की सलाह पर एक व्यक्ति से मिली थी। 61 वर्षीय यह व्यक्ति खुद को आध्यात्मिक सलाहकार बताता था। उसने महिला से कहा कि उसके शरीर में मूर्तियां और बुरी आत्माएं मौजूद हैं। व्यक्ति ने दावा किया कि वह उन्हें बाहर निकाल सकता है। महिला ने आरोप लगाया कि इलाज के दौरान व्यक्ति ने उसके साथ दुष्कर्म और यौन उत्पीड़न किया।

निचली अदालत की सजा बरकरार

जस्टिस ए. बदरूद्दीन की पीठ ने दुष्कर्म के मामले में आरोपी को 10 साल की कठोर कैद और एक लाख रुपये जुर्माने की सजा सुनाने के निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा। वहीं, यौन उत्पीड़न के मामले में तीन साल की कैद और 25 हजार रुपये जुर्माने की सजा भी बरकरार रखी गई। दोनों सजाएं साथ-साथ चलनी थीं। हाई कोर्ट ने कहा कि अपराध की प्रकृति को देखते हुए निचली अदालत की ओर से सुनाई गई सजा में बदलाव करने का कोई आधार नहीं है।

 

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'घटना की तारीख में अंतर'

आरोपी के वकील ने दलील दी कि महिला ने घटना की दो अलग-अलग तारीखें बताई थीं। शुरुआत में घटना की तारीख 7 अक्टूबर 2022 बताई गई थी, लेकिन बाद में महिला ने इसे बदलकर 8 अक्टूबर कर दिया। वकील ने कहा कि तारीखों में इस अंतर से मामले की विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं।

 

इस पर अभियोजन पक्ष ने कहा कि महिला ने अपने शुरुआती बयान में तारीख बताने में गलती की थी। 8 अक्टूबर को आरोपी और महिला के बीच फोन पर तीन बार बातचीत हुई थी। हाई कोर्ट ने कॉल रिकॉर्ड को ध्यान में रखते हुए कहा कि तारीख में अंतर होने के आधार पर महिला की गवाही को खारिज नहीं किया जा सकता।

 

आरोपी के वकील ने यह भी सवाल उठाया कि घटना के 19 दिन बाद शिकायत क्यों दर्ज कराई गई। इस पर अभियोजन पक्ष ने बताया कि शिकायत दर्ज कराने से पहले महिला ने अपने बेटे और बेटियों से बात की थी। हाई कोर्ट ने इस स्पष्टीकरण को स्वीकार किया।

 

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‘शरीर पर चोट के निशान नहीं’

आरोपी के वकील की तीसरी मुख्य दलील महिला के शरीर पर चोट के निशान नहीं होने को लेकर थी। महिला की मेडिकल जांच घटना के करीब 20 दिन बाद हुई थी। जांच में उसके शरीर पर कोई बाहरी चोट नहीं मिली थी। इसके जवाब में अभियोजन पक्ष ने कहा कि घटना के 20 दिन बाद तक चोट के निशान ठीक हो सकते हैं। हाई कोर्ट ने इस दलील पर भी विचार कर इसे स्पष्ट माना।

 

आरोपी पक्ष ने यह दावा भी किया कि उसका महिला के बेटे के साथ संपत्ति को लेकर पुराना विवाद था। इसी वजह से उसे झूठे मामले में फंसाया गया। हालांकि, हाई कोर्ट ने इन दलीलों को आरोपी को बरी करने या निचली अदालत की सजा में बदलाव करने के लिए पर्याप्त नहीं माना।