पहाड़ों की गुलाबी ठंड, देवभूमि का खुशनुमा माहौल और पंजाबी सूफियाना संगीत की मिठास। अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा की छठी सांस्कृतिक संध्या में कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला, जब मशहूर सूफी गायक डॉ. सतिंदर सरताज ने अपनी दिलकश आवाज और शायरी से संगीत प्रेमियों को मंत्रमुग्ध कर दिया। ठंडी हवाओं के बीच सरताज की गायकी ने ऐसा रंग जमाया कि पूरा पंडाल सुरों और तालियों से गूंज उठा।

 

26 अक्तूबर की शाम लाल चंद प्रार्थी कला केंद्र में आयोजित सांस्कृतिक संध्या में मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू बतौर मुख्यातिथि पहुंचे। सरताज की प्रस्तुति इस शाम का प्रमुख आकर्षण रही। उनके प्रशंसकों में कार्यक्रम को लेकर खासा उत्साह नजर आया। उन्हें सुनने के लिए बड़ी संख्या में दर्शक पहुंचे। भीड़ का आलम यह रहा कि कार्यक्रम स्थल के बाहर भी लोगों की भारी मौजूदगी रही और प्रवेश को लेकर भी परेशानी सामने आई। हजारों दर्शकों को मुख्य गेट पर ही इंतजार करना पड़ा।

'उड़ारियां' की मिठास से सूफियाना रंग तक, सरताज की गायकी का जादू

सतिंदर सरताज का संगीत महज मनोरंजन नहीं, बल्कि शब्दों, भावनाओं और दर्शन का ऐसा मेल है, जिसमें प्रेम, विरह, जीवन और रूहानियत के अलग-अलग रंग महसूस होते हैं। उनकी गायकी की खासियत है कि वह पंजाबी भाषा की मिठास को सूफियाना अंदाज और शायरी की गहराई के साथ श्रोताओं तक पहुंचाते हैं। 'उड़ारियां' का नाम आते ही प्रेम और एहसासों से जुड़ी एक अलग दुनिया याद आने लगती है। वहीं, 'सज्जन राजी' और 'साईं' जैसे उनके लोकप्रिय गीतों ने उन्हें संगीत प्रेमियों के बीच खास पहचान दिलाई है। उनकी संगीत यात्रा में 'दिल ये पुकारे' जैसे गीत भी श्रोताओं की पसंद का हिस्सा रहे हैं।

सरताज की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनकी गायकी से परिचित दर्शकों के लिए उनके गीतों के मुखड़े ही भावनाओं को जगाने के लिए काफी हैं। उनके संगीत में कहीं मोहब्बत की नरमी है तो कहीं जिंदगी को समझने का फलसफा। उनकी आवाज की खनक और शायरी का ठहराव ऐसा अहसास पैदा करता है, जिसमें श्रोता सिर्फ गीत नहीं सुनते, बल्कि उसके शब्दों में अपने अनुभव भी तलाशने लगते हैं।

 

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जब संगीत ने भुला दी पहाड़ों की ठंड

अक्तूबर के अंतिम सप्ताह में कुल्लू की शामें धीरे-धीरे सर्द होने लगती हैं। लेकिन दशहरा की इस सांस्कृतिक संध्या में संगीत का उत्साह मौसम की ठंडक पर भारी नजर आया। मंच पर सूफियाना संगीत और सामने अपने पसंदीदा कलाकार को सुनने के लिए बेताब दर्शक। तालियों की गूंज और श्रोताओं का उत्साह कार्यक्रम के माहौल को लगातार जीवंत बनाए हुए था। सतिंदर सरताज की प्रस्तुति का आकर्षण उनकी आवाज के साथ-साथ उनकी शख्सियत और मंच पर संवाद करने के अंदाज में भी दिखाई देता है। उनके गीतों में पंजाबी मिट्टी की खुशबू, लोक परंपरा की झलक और सूफी विचारधारा का प्रभाव महसूस होता है। यही वजह है कि उनकी गायकी का दायरा किसी एक उम्र या क्षेत्र के श्रोताओं तक सीमित नहीं रहता। युवा पीढ़ी के बीच लोकप्रियता के साथ ही उनके गीतों को परिवारों और संगीत के पारखी श्रोताओं के बीच भी पसंद किया जाता है।

देव महाकुंभ के बीच संगीत का वैश्विक आकर्षण

अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा अपनी पहचान भगवान रघुनाथ की रथयात्रा, सैकड़ों देवी-देवताओं के समागम और सदियों पुरानी देव परंपराओं के लिए रखता है। समय के साथ इसकी सांस्कृतिक संध्याएं भी देश-दुनिया के दर्शकों के लिए बड़ा आकर्षण बन गई हैं। इस बार उत्सव में देश के लोकप्रिय कलाकारों के साथ अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक प्रस्तुतियों को भी मंच मिला। ऐसे में सतिंदर सरताज की सूफियाना प्रस्तुति ने संगीत के जरिए सांस्कृतिक विविधता की एक और तस्वीर पेश की।

 

कुल्लू दशहरा की इस शाम ने यह भी दिखाया कि लोक संस्कृति और आधुनिक संगीत के बीच कोई दीवार नहीं है। देवभूमि के पारंपरिक उत्सव में पंजाबी सूफी संगीत का रंग दर्शकों को एक साझा सांस्कृतिक अनुभव से जोड़ता नजर आया। सतिंदर सरताज की प्रस्तुति के साथ छठी सांस्कृतिक संध्या संगीत प्रेमियों के लिए यादगार बनी। गुलाबी ठंड में उनकी आवाज की गर्माहट और सूफियाना तरानों की गूंज ने दशहरा की इस शाम को खास बना दिया।